संविधान के संरक्षक के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों ने वर्ष 1973 में एक ऐसा फैसला दिया था, जिसकी वजह से केशवानंद भारती मृत्यु के बाद भी देश के सांविधानिक इतिहास में अमर हो गए हैं। कांग्रेस की आंतरिक कलह और पाकिस्तान से युद्ध के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स खत्म करने और राज्यों में भूमि अधिग्रहण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने जैसे कई कानून बनाए और संसद के माध्यम से संविधान में 24वां, 25वां और 29वां संशोधन कर दिया। 

विशेष सीमा बल के तिब्बती मूल के एक युद्धरत सिपाही नाइमा तेनजिन की पूर्वी लद्दाख की पहरेदारी करते वक्त गत सप्ताह अचानक हुई मौत से एक चिंगारी उठी है। वह मुक्त तिब्बत के अभियान के लिए कारक, विस्फोटक भी बन सकती है। कारण है कि भाजपा के शीर्ष पधाधिकारी और कश्मीर मसलों के प्रभारी राम माधव ने शहीद सैनिक की शवयात्रा के समय दो सूत्र उच्चारे थे: 'भारत माता की जय' और 'जय तिब्बत देश।'

अपने देश में राम को राष्ट्रीय महापुरुष कहने में राजनीतिज्ञों को हीनता का बोध होता है और उनको राम तथा रामायण में साम्प्रदायिकता दिखाई पड़ती है। किन्तु दक्षिण-पूर्व एशिया-स्थित थाईलैण्ड (Thailand) में न केवल राम को एक सुप्रतिष्ठित स्थान दिया गया है, अपितु थाई-रामायण को थाईलैण्ड के राष्ट्रीय ग्रंथ का सम्मान दिया गया है।

चकित हूँ यह देखकर कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 में संघ की राजभाषा या राष्ट्रभाषा का कहीं कोई जिक्र तक नहीं है. पिछली सरकारों द्वारा हिन्दी की लगातार की जा रही उपेक्षा के बावजूद 2011 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार आज भी देश की 53 करोड़ आबादी हिन्दी भाषी है. दूसरी ओर अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या दो लाख साठ हजार, यानी मात्र .02 प्रतिशत है.

कोरोना महामारी के कारण न केवल भारत बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गयी है। भारत में लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था की स्थिति न केवल बिगड़ी है, बल्कि रसातल में चली गयी है। हालही में जारी मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों ने किसी खुशफहमी के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ी है। सबको पता था कि आंकड़े गिरावट वाले होंगे लेकिन गिरावट 23.9 फीसदी की हो जाएगी, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा।

शिवसेना को उसी की भाषा में पहली बार किसी फिल्मी सितारे ने कड़ी चुनौती दी है। शिवसेना सन्न है। क्योंकि उसकी ताकतवर छवि को कंगना की तरफ से जबरदस्त झटका मिला है। लेकिन कंगना न केवल उद्धव ठाकरे, बल्कि शरद पवार और यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी निशाने पर रखे हुए हैं। इसी से सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कंगना किसके बूते पर हर किसी से भिड़ने पर उतारू है।

बेल्जियम में जन्मे फादर कामिल बुल्के की जीवनभर कर्मभूमि हिंदुस्तान की माटी रही। हिंदी के पुजारी बुल्के मृत्युपर्यंत हिंदी, तुलसीदास और वाल्मीकि के अनन्य भक्त रहे। ‘कामिल’ शब्द के दो अर्थ हैं। एक- वेदी-सेवक जबकि दूसरा अर्थ है- एक पुष्प का नाम। फ़ादर कामिल बुल्के ने दोनों ही अर्थों को जीवन में चरितार्थ किया। वह जेसुइट संघ में दीक्षित संन्यासी के रूप में ‘वेदी-संन्यासी’ थे और एक व्यक्ति के रुप में महकते हुए पुष्प। फादर बुल्के का हिंदी प्रेम जगजाहिर रहा।

देश में दलित विमर्श करने वाले बुद्धिजीवियों द्वारा सनातन धर्म पर शुद्रों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया जाता है। इसके लिए अक्सर श्रीराम द्वारा शम्बुक का वध किए जाने जैसी घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। यदि हम शम्बुक की पूरी कथा और वेदादि शास्त्रों में शुद्रों के लिए दी गई व्यवस्थाओं को देखें तो यह कथा विश्वसनीय नहीं लगती।

अभिनेत्री कंगना रनोट ने मुंबई में रहने को लेकर एक प्रश्‍न खड़ा किया था कि अब मुंबई सेफ नहीं है। कंगना के ट्वीट में सवाल किया था कि मुंबई धीरे धीरे ‘पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर’ क्यों लगने लगी है, यह प्रश्‍न कितना सही है अथवा नहीं, इस पर चर्चा होनी ही चाहिए थी, इससे किसी को कोई परहेज भी नहीं होगा, कई फिल्मी हस्तियों की ओर से कंगना रनौत की आलोचना की गई.

किसान हलाकान रहे, बेरोजगारों को रोजगार की तलाश में खाक छाननी पड़ती रही, शिक्षा का स्तर बहुत निम्न पर पहुंच गया, स्वास्थ्य सुविधाएं वेंटीलेटर पर दिखाई देने लगीं, उद्योग जगत की सांसें फूलती रहीं, न जाने क्या क्या चलता रहा देश के हृदय प्रदेश में, पर इनकी चिंता करने के बजाए कांग्रेस सरकार के द्वारा जिलों के प्रशासनिक मुखिया कलेक्टर का पदनाम बदलने की कवायद की गई, इसके लिए समिति का गठन भी कर दिया गया।