भारत में कैथोलिक चर्च के अनुयायियों का आधिकारिक आंकड़ा लगभग दाे कराेड़ है। कैथाेलिक चर्च ने अपने प्रशासनिक ढांचे काे 200 के लगभग डायसिस और 29 धार्मिक – प्रांतों में बांट रखा है। अगर सरकारी जनगणना काे ही सही माने, तो दाे करोड़ कैथोलिक हैं, बाकी प्रोटोस्टेंट या दूसरे डिनोमिनेशन, स्वतंत्र कलीसिया केवल 30 लाख ही हैं, जबकि इससे ज्यादा संख्या तो उसमें कार्य करने वाले और धर्म प्रचारकाें की ही हाेगी। प्रोटोस्टेंट या दूसरे डिनोमिनेशन, स्वतंत्र कलीसिया से जुड़े अनुयायियों की संख्या कैथोलिक से दोगुनी-तिगुनी होगी।

चौबीस घंटे सबकी खबरें देने वाले टीवी न्यूज़ चैनल अगर खुद ही ख़बरों में आ जाए, तो इससे बड़ी हैरानी व अचंभित करने वाली ख़बर क्या होगी। परंतु पिछले कुछ घंटो में ऐसा ही नज़ारा टीवी पर हम सब देख रहे है। पर ये तो सीधा-सीधा उन करोड़ों दर्शकों की आस्था के साथ धोखा है, जो टीवी मीडिया पर विश्वास करते हैं।

हाल ही में संसद ने तीन प्रमुख श्रम सुधार विधेयक- इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड 2020, ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडिशंस कोड 2020 और कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020 पारित किए, जो राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून बन गए। कोविड-19 की चुनौतियों और भारत के लिए वैश्विक उद्योग-कारोबार के बढ़ते मौकों को ध्यान में रखते हुए नए श्रम कानून नियोक्ता, कर्मचारी तथा सरकार, तीनों के लिए फायदेमंद सिद्ध हो सकते हैं।

आधुनिक जीवन शैली में अवसाद यानी डिप्रेशन आम बात हो गईं है। वालीवुड में अवसाद की बीमारी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को कहाँ तक ले जा सकती है इसका ताजातरीन उदारहण अभिनेता सुशांत सिंह की मौत है। सुशांत की मौत से सिने दुनिया और राजनीति में बवाल मचा है। अवसाद की बीमारी जीवन को बर्बाद कर देती है।

संसार के किसी भी देश में पन्थ, मजहब के आधार पर पृथक- पृथक कानून नहीं होते, बल्कि सभी नागरिकों के लिए एक समान व्यवस्था व कानून होते हैं। सिर्फ भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसमें अल्पसंख्यक वर्गों के लिए वैयक्तिक अर्थात पर्सनल कानून बने हुए हैं, जबकि देश का संविधान अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, लिंग, क्षेत्र व भाषा आदि के आधार पर समाज में भेदभाव नहीं करता और सभी के लिए एक समान व्यवस्था व कानून सुनिश्चित करने की बात करता है।

सर्वगुण संपन्न होना भले ही मुहावरा हो, मगर सुरेश प्रभु जैसे व्यक्तित्व पर ये मुहावरा शत-प्रतिशत सच बैठता है। भारतीय राजनीति एक ऐसा दलदल या यूं कहें कि काजल की कोठरी है कि जो भी इसमें आता है उसके साथ आरोप-प्रत्यारोप की कालिख और कीचड़ लग ही जाती है। लेकिन इस मायने में सुरेश प्रभु एक अलग ही व्यक्तित्व सिद्ध हुए हैं।

बिहार की सियासत पल-पल बदल रही है। महागठबंधन में जहां कल तक जीच जारी थी और वीआईपी और रालोसपा ने मर्यादित सीटों के नहीं मिलने से किनारा कर लिया। वहीं एनडीए में भाजपा-जदयू के रिश्तों के बीच लोजपा के लाल चिराग की सियासत ने दोयम दर्जे की स्थिति पैदा कर रखी है।

बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियां एवं सरगर्मियां चरम पर हैं, वहां चुनावी चैसर अब लगभग बिछ चुकी है। कुल मिलाकर इस बार मुकाबला जेडीयू-बीजेपी बनाम आरजेडी-कांग्रेस-कम्युनिस्ट का बनता दिख रहा है। एनडीए में दरार पड़ चुकी है और लोजपा ने स्वतंत्र चुनाव लड़ने का फैसला किया है। यह चुनाव अनेक दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है।

कोविड-19 महामारी के कारण हमारा समाज और समय दो हिस्सों में बंट गया है। एक कोविड-19 से पहले का और दूसरा कोविड-19 के बाद का। इस महामारी का असर पूरी दुनिया पर पड़ा है और हर व्यक्ति इससे किसी न किसी रूप में प्रभावित हुआ है। हमारी जिंदगी, हमारा रहन-सहन, दूसरों से बात करने और खाने-पीने का तरीका- सब कुछ पूरी तरह बदल चुका है।

राम लला को सर्वोच्च न्यायालय से न्याय मिलने और अयोध्या में श्रीराम मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने के पश्चात श्रीकृष्ण विराजमान भी न्याय के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए पहुंच गए हैं। श्रीकृष्ण विराजमान और स्थान श्रीकृष्ण जन्मभूमि के नाम से मथुरा के सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में1968 के श्रीकृष्ण जन्मभूमि व मस्जिद के बीच समझौते को अमान्य करार देने की मांग करते हुए 13.37 एकड़ की श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मस्जिद सहित) पर मालिकाना हक मांगते हुए याचिका दायर की गई है।