सामाजिक सुरक्षा कोष में तेजी लाने की आवश्यकता है ताकि देश के सबसे गरीब और कमजोर तबके को यह वित्तीय सुरक्षा की भावना प्रदान कर सके. एक मजदूर देश के निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है। किसी भी समाज, देश संस्था और उद्योग में काम करने वाले श्रमिकों की अहमियत किसी से भी कम नहीं आंकी जा सकती। इनके श्रम के बिना औद्योगिक ढांचे के खड़े होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

देश में जब भी चुनावी मौसम आता है तो हमारे नेताओं की जुबान फिसलने में देर नहीं लगती । वह एक दूसरे पर हमला करते हुए कितने असंवैधानिक और निम्न स्तर पर उतर आते हैं ,इसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता । इतना ही नहीं ,महिलाओं को लेकर भी इनकी जुबान इस स्तर तक फिसल जाती है कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता ।

फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की 14 जून 2020 को संदिग्ध परिस्थितियों में हुई अफ़सोसनाक मौत के बाद एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने,एक दूसरे को लांछित करने, मीडिया द्वारा इस मुद्दे पर 'नागिन डांस' करते हुए ख़ुद को 'मुंसिफ़' के रूप में पेश करने और इस विषय को झूठ-सच के घालमेल से अनावश्यक रूप से लंबे समय तक खींचने का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा।

बिहार का चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि इसके जरिए इस बात का भी फैसला होगा कि राज्य में अलग-अलग जमातों की नुमाइंदगी करने वाले दो बड़े नेताओं- लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने-अपने बेटे को सौंपने का जो काम किया है, उस पर जनता अपनी मुहर लगाती है या नहीं?

चीन की विस्तारवादी नीतियों के कारण जहां एलएसी पर अप्रैल माह से ही तनावपूर्ण हालात हैं, वहीं चीन की गोद में खेल रहा नेपाल भी अब चीन की इन्हीं नीतियों का शिकार हो रहा है। हाल ही में यह खुलासा होने के बाद कि चीनी सैनिकों ने नेपाल के हुम्ला जिले में सीमा स्तंभ से दो किलोमीटर अंदर तक कब्जा कर लिया है, चीन में हंगामा मचा है।

बिहार की सियासत में कभी धमक रखने वाली या यों कहें की विपक्षी की भूमिका निभाने वाली वामपंथ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जहां महागठबंधन का हिस्सा बनकर 29 सीटों पर अपनी जोर आजमाइश कर रही है। वहीं एनडीए जो कि शुरुआती दौर से वामपंथ की नीतियों से दूरी बनाकर रखने वाली ने बिहार में वोटरों को ‘लाल झंडा’ का भय से अवगत कराना शुरु कर दिया है।

हमारे देश की पाठ्य-पुस्तकों में जवाहरलाल नेहरू का गुण-गान होते रहना कम्युनिस्ट देशों वाली परंपरा की नकल है। अन्य देशों में किसी की ऐसी पूजा नहीं होती जैसी यहाँ गाँधी-नेहरू की होती है। अतः जैसे रूसियों, चीनियों ने वह बंद किया, हमें भी कर लेना चाहिए। वस्तुतः खुद नेहरू ने जीवन-भर जिन बातों को सब से अधिक दुहराया था, उसमें यह भी एक था – ‘हमें रूस से सीखना चाहिए’।

हाल ही में दो महिला वैज्ञानिकों इमैनुएल शारपेंतिए और जेनिफर डाउड़ना को रसायन विज्ञाने में नोबेल पुरकार मिला। यकीनन यह महिला वैज्ञानिकों के लिए राहत का विषय है, क्योंकि वर्ष 1903 में मैरी क्यूरी के नोबेल जीतने से लेकर अब तक महिलाओं ने विज्ञान में बेशक लंबा सफर तय किया है, लेकिन नोबेल पुरस्कार में उनकी भागीदारी तुलनात्मक रूप से कम ही है।

दरअसल महाकुंभ और मदरसों की तुलना नहीं की जा सकती। महाकुंभ हमारी प्राचीन, सनातन संस्कृति, आस्था और श्रद्धा के प्रतीक हैं। ये आयोजन सिर्फ हिंदुओं तक ही सीमित नहीं हैं। महाकुंभ में तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा भी पधार चुके हैं और वहां ‘बुद्ध विहार’ की स्थापना में उनका विशेष योगदान रहा है। महाकुंभ में दलित व्यक्ति को भी ‘महामंडलेश्वर’ के पद पर विभूषित किया जा चुका है और पुजारी भी नियुक्त किए गए हैं।

बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बनने जा रहा है जहाँ कोरोना महामारी के बीच चुनाव होने जा रहे हैं और भारत शायद विश्व का ऐसा पहला देश। आम आदमी कोरोना से लड़ेगा और राजनैतिक दल चुनाव। खास बात यह है कि चुनाव के दौरान सभी राजनैतिक दल एक दूसरे के खिलाफ लड़ेंगे लेकिन चुनाव के बाद अपनी अपनी सुविधानुसार एक भी हो सकते हैं।