न्यूटन, आंईस्टीन, आर्कमिडीज को चुनौती देने वाले अजय शर्मा

Written by सोमवार, 25 सितम्बर 2017 20:54

सन् 1982 में अजय शर्मा की आयु 19 वर्ष थी और वे बी.एससी. (द्वितीय वर्ष) के छात्र थे. उस समय अजय शर्मा ने प्रोफैसर से क्लास में कहा कि 2266 वर्ष पुराने आर्किमिडीज के सिद्वान्त, 311 वर्ष पुराने न्यूटन के नियमों और 112 वर्ष पुराने आइस्टीन के सिद्धांतों और सूत्रों में संशोधन होना चाहिए.

उस समय सभी ने अजय शर्मा की बात को हंसी मजाक में टाल दिया, परन्तु 35 वर्ष बाद स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. अजय शर्मा का जन्म 2 मार्च 1963 को हिमाचल के जिला हमीरपुर के गांव चकमोह में हुआ था. उनके पिता श्री देवदत्त शर्मा अध्यापक एंव कवि थे. उनकी माता श्रीमति कला रानी शर्मा गृहणी थी उन्होंने बचपन से ही अजय को आशावाद और निडरता की शिक्षा दी. यही कारण है कि वे विज्ञान के भगवानों अर्थात न्यूटन, आर्किमिडीज और आईस्टीन के सामने दृढ़ता से खड़े हो गए. इन वैज्ञानिकों के आगे 7.4 बिलियन लोग झुकते हैं.

शोधकार्य को मान्यता

पिछले 35 वर्षों के अंधकारमय संघर्ष में अजय शर्मा के 60 शोधलेख प्रकाशित हो चुके है. ये शोध लेख अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिकों ने पूरी छानबीन के बाद शोध पत्रिकाओं और कॉन्फ्रेंस के प्रकाशनों में प्रकाशित किये हैं. उन्हें अमेरिका टैक्सास में 10-12 सितम्बर 2017 को होने वाली कॉन्फ्रेंस में भी आमन्त्रित किया गया. वे इस कॉन्फ्रेंस 2266 वर्ष पुराने आर्किमिडीज सिद्वान्त के संशोधन पर व्याख्यान देगें. इससे पहले वे दो बार अमेरिका में, दो बार इंग्लैंड में, एक बार रूस, जर्मनी, ताईवान और यूक्रेन में वैज्ञानिक कॉन्फ्रेंसों में व्याख्यान दे चुके हैं. उनकी दो पुस्तकें आर्किमिडीज (2013) में, बियोंड आइंस्टीन एंड E=mc2 (2015) कैम्ब्रिज से प्रकाशित हो चुकी है. पिछले दो वर्षों से इन पुस्तकों का मुल्यांकन ‘द नैशनल अकादमी ऑफ सांइसिस इंडिया’ के विशेषज्ञ वैज्ञानिक कर रहे हैं. इसका आदेश माननीय विज्ञान एंड टैक्नोलोजी मंत्री डा0 हर्ष वर्धन ने जून 2015 में दिया था.

2266 वर्ष पुराने आर्किमिडीज सिद्वांत में संशोधन

इस सिद्वान्त का अनुप्रयोग यह जानने के लिए होता है, कि वस्तु द्रव (पानी) में कब तैरेगी डूबेगी या ऊपर उठेगी? आर्किमिडीज सिद्वान्त की मुख्य खामी यह है कि इसके अनुसार सिर्फ वस्तु का घनत्व (हल्कापन या भारीपन) ही महत्वपूर्ण है, वस्तुओं का आकार कतई नहीं। यदि स्टील की वस्तु गोलकार, छतरीनुमा, लम्बी पाइप, सूई की तरह या प्लेट की तरह स्पाट हो तो सभी वस्तुओं का घनत्व बराबर होता है. सिद्वान्त के अनुसार स्टील की हर वस्तु को पानी के टैंक में समान समय में समान दूरियां तय करनी चाहिए. परन्तु प्रयोग में ऐसा होता नहीं है. स्टील की सूई के आकार की वस्तु तेजी से नीचे गिरती है और छतरीनुमा वस्तु धीरे-धीरे गिरती है. आर्किमिडीज सिद्वान्त का संशोधन इसलिए किया गया है, कि इसमें वस्तु के आकार को समायोजित किया जा सके. 1993 में अजय शर्मा ने अपना शोधपत्र इंग्लैंड के एक रिसर्च जरनल को भेजा. उस समय बनारस हिन्दु युनिवर्सिटी वाराणसी के प्रोफेसर प्रसाद खास्तगिर सम्पादक मंडल के सदस्य थे. प्रोफैसर खास्तिगिर ने लिखा कि वस्तु का आकार एक महत्वपूर्ण घटक है, जिसकी आर्कमिडीज सिद्वान्त अनदेखी करता है. इसको प्रयोगों द्वारा दर्शाने के लिए कुछ प्रयोग किये जाने चाहिए. प्रोफेसर खास्तगिर की सिफारिश पर शोधपत्र प्रकाशित हो गया. इस में 2266 वर्ष पुराने आर्किमिडीज सिद्वांत में संशोधन क़िया गया था. दिसम्बर 1998 में वैज्ञानिक एंव औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (CSIR) नई दिल्ली ने इन प्रयोगों की अनुमति दे दी ये प्रयोग परिषद की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (NPL) में होने थे. हिमाचल प्रदेश सरकार ने आर्थिक सहायता भी दे दी थी. हालाँकि किसी तकनीकी कारण से ये प्रयोग नहीं हो सके.

 

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न्यूटन की गति का दूसरा नियम (F=ma), न्यूटन ने नहीं दिया था

न्यूटन ने 1686 में प्रिसीपियां नाम की पुस्तक लिखी। इसके पृष्ठ संख्या 19 पर गति का दूसरा नियम दिया है. न्यूटन का नियम है बल या फ़ोर्स (F) वस्तु के वेग के अन्तर (V2-V1) के बराबर होता है, अर्थात F=dV दुनिया में कहीं भी इस नियम को न तो पढ़ाया जाता है, और न ही इसकी चर्चा की जाती है. मानो यह नियम अनचाहा बच्चा हो. इसके विपरीत न्यूटन के नियम के स्थान पर जो नियम पढ़ाया जाता है वह स्विटजरलैंड के वैज्ञानिक लियोन हार्ड यूलर ने दिया था. यह नियम है F=ma ( F = mass x acceleration ) . यूलर ने यह नियम न्यूटन की मृत्यु के 48 वर्ष बाद अर्थात 1775 में दिया था.
इस बात के स्पष्ट प्रमाण मैथेमैटिकल एसोसिएशन ऑफ अमेरिका, वाशिंगटन की वैबसाइट पर मिलते है. यहाँ पर यूलर की पुस्तकें और 900 शोध लेख ऑनलाइन उपलब्ध है. यूलर के शोध लेख संख्या E479 के पृष्ठ 223 पर F=ma स्पष्ट दिया गया है. इसको गलती से न्यूटन की गति के दूसरे नियम के नाम से पढ़ाया जाता है. यह सरासर गलत है. इस तरह राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) की नवीं क्लास की विज्ञान की पुस्तक में संशोधन की जरूरत है, ताकि बच्चों को गलत विज्ञान न पढ़ाया जाए.

न्यूटन के तीसरे नियम का संशोधन

न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है. न्यूटन ने न तो इस पर कोई समीकरण या इक्वेसन लिखी, न ही इसकी परिमाणात्मक तौर पर व्याख्या दी. इस तरह यह नियम विज्ञान के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता है. न्यूटन ने इस नियम को समझाने के लिए परिमाणात्मक तौर पर तीन उदाहरण दिये. जब हम अंगुली से पत्थर को दवाते हैं तो पत्थर भी अंगुली को दवाता है. जब कोई घोड़ा रस्से से बंधे पत्थर को खींचता है, तो पत्थर भी घोडे़ को खीचंता है. तीसरे उदाहरण में न्यूटन ने दो वस्तुओं के टकराव की स्थिति को दर्शाया है. न्यूटन ने कहा इस तरह क्रिया और प्रतिक्रिया बराबर और विपरीत होते हैं, पर यहां और भी असंख्य उदाहरण है. संक्षेप में न्यूटन की गति के तीसरे नियम की खामी यह है कि, यह वस्तु की अर्तनिहित प्रकृति, संरचना, विशिष्ठता, कठोरता, नर्मता, लचीलापन, आकार, और बनावट की पूरी तरह अनदेखी करता है. वस्तु कोई भी हो सकती है जैसे स्टील, लकड़ी, ऊन, हवा भरा गुब्बारा या गेंद, गुंधा हुआ आटा च्युगम, स्प्रिंग, स्पंज या कपडे़ की वस्तु आदि-2. न्यूटन के तीसरे नियम के मुताबिक हर अवस्था में क्रिया और प्रतिक्रिया बराबर होने चाहिए, लेकिन यह पूरी तरह गलत है.

उदाहरण के तौर पर हम समान भार की कील और स्प्रिंग को जमीन पर गिरायें तो स्प्रिंग तेजी से ऊपर उठता है पर कील नहीं इस तरह दोनों में क्रिया तो बराबर है, पर प्रतिक्रिया नहीं. इसी तरह हम कुछ दूरी से चुम्बक के विपरीत ध्रुवों (नार्थ पोल, साऊथ पोल) को एक दूसरे की तरफ धकेलें तो दोनों टकरा का विपरीत दिशा में वापिस नहीं आते हैं. दोनों एक दूसरे से चिपक जाते है. इस तरह क्रिया तो है पर प्रतिक्रिया नहीं. इसलिए न्यूटन के तीसरे नियम को संशोधित किया है जिसके अनुसार क्रिया और प्रतिक्रिया समानुपात में होते है. अर्थात कुछ अवस्थाओं में क्रिया प्रतिक्रिया के बराबर कम या ज्यादा भी हो सकती है. गणित के समीकरणों में एक नया घटक आ जाता है. वह वस्तु की प्रकृति, संरचना विशिष्ठता आदि का सम़ायोजन करता है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से प्रार्थना

अजय शर्मा ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से प्रार्थना की है कि वे उनके शोधकार्य पर सेमिनार करवाये. वे दो घंटे में सिद्व कर देगें कि न्यूटन की गति का दूसरा नियम, न्यूटन ने नहीं यूलर ने दिया था. शर्मा ने कहा कि उन्हें 2014 में अमेरिका से न्यूटन की गति के दूसरे नियम पर, 2015 में रूस से आइस्टीन की E=mc2 पर, 2017 में अमेरिका में 2266 साल पुराने आर्किमिडीज के सिद्वान्त पर व्याख्यान हेतु बुलाया गया है, पर पिछले 35 वर्षों से भारत सरकार ने एक बार भी सेमिनार नहीं रखा. शर्मा ने भारत शिक्षण मंच का धन्यवाद किया, कि उन्हें भारत बोध नामक, अन्र्तराष्ट्रीय संगोष्ठी में फरवरी 2017 में न्यूटन के तीसरे नियम पर बोलने के लिए 7 मिनट का समय दिया गया. यह संगोष्ठी इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय में नई दिल्ली में हुई थी. शर्मा ने कहा कि सेमिनार के दौरान हुए विचार विमर्श को यू-टयूव पर डाला जाए, ताकि दुनिया भर के लोग इस पर कंमैट कर सके। जबकि भारत में विज्ञान की स्थिति ये है कि भारत सरकार (Hon’ble Minister of Science & Technology, Dr Harsh Vardhan) ने वैज्ञानिक अजय शर्मा की दो पुस्तकें ‘द नैशनल अकादमी ऑफ साईंसेस इडिया” को मूल्यांकन हेतु भेजी हैं, लेकिन ढाई साल के बाद भी इन पुस्तकों पर कोई रिपोर्ट नहीं आई.

वैज्ञानिक अजय शर्मा जी से संपर्क हेतु उनका पता :- 

Ajay Sharma, Assistant Director Education Shimla -4 Mob. :- 94184 50899
Flat No 4, Assistant Surgeon Block , opp. RAM TEMPLE. DDU Zonal Hospital Shimla 171001 HP

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