मंदिरों की दुर्लभ मूर्तियाँ गायब :- मोदीजी HRCE क़ानून बदलें

Written by सोमवार, 07 मई 2018 20:23

आपको केरल के पद्मनाभ स्वामी के मंदिर का स्मरण तो होगा ही... किस तरह से वहाँ के अकूत खजाने को लेकर जाँच हुई.

सोनिया सरकार ने संपत्ति को अपने कब्जे में लेने के भरपूर प्रयास किये, फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले में दखल दी और अंततः त्रावनकोर के महाराजाओं द्वारा वर्षों से पद्मनाभ स्वामी के जिस मंदिर के खजाने की रक्षा की और उसे समृद्ध किया, वह दुनिया के सामने उजागर हो गया. मंदिर के छहों तहखाने खोलकर भगवान् के चरणों में अर्पित भक्तों की भावना को “लूटने” का कुत्सित प्रयास किया गया (जानने के लिए यहाँ क्लिक करें). आज की तारीख में वास्तव में किसी को भी नहीं पता कि पद्मनाभ मंदिर से कितनी संपत्ति निकली थी? उस संपत्ति की “वर्तमान स्थिति” क्या है? अंतिम तहखाने (जिसे खोलने में बड़े-बड़े इंजीनियरों को पसीने छूट गए थे) से क्या निकला? सरकार इस संपत्ति का क्या करने जा रही है? (अब चार वर्षों से सरकार बदल चुकी है). इत्यादि-इत्यादि-इत्यादि... ऐसे कई सवाल हैं जो एक सनातन धर्मी हिन्दू को लगातार सताते हैं, क्योंकि मंदिरों की संपत्ति “लूटने” के मामले में सभी सरकारों का रिकॉर्ड रहा है.

बहरहाल लेख की इस प्रस्तावना का उद्देश्य यह है कि हाल ही में तंजावूर के प्रसिद्ध Big Temple यानी वृहदीश्वर मंदिर (इस अदभुत मंदिर के बारे में जानें क्लिक करें) की जाँच में यह सामने आया है कि कम से कम ग्यारह अनमोल मूर्तियाँ इस मंदिर के खजाने से गायब हैं. ये बात भी तब पता चली, जब एक गुप्त सूचना के आधार पर जाँच अधिकारीयों ने राजराजा चोल और रानी लोगम्मा देवी की मूर्तियों की चोरी की खबर पर कार्यवाही शुरू की. जैसा कि सभी जानते हैं, तंजावूर का वृहदीश्वर मंदिर एक विशालतम मंदिर है, जिसे चोल राजाओं द्वारा निर्मित किया गया था. इस मंदिर के खजाने में कई दुर्लभ मूर्तियाँ शामिल हैं. पुलिस अधिकारियों ने संदेह व्यक्त किया है कि मंदिर से मूर्तियों की यह चोरी-तस्करी पिछले कम से कम पन्द्रह-बीस वर्षों से जारी है, और इसमें निश्चित रूप से मंदिर अधिकारियों, नेताओं और तस्करों की मिलीभगत है.

सूत्रों के अनुसार पुरातात्विक रजिस्टर की छानबीन तथा मंदिर के उत्तर-पश्चिम में स्थित मंडपम से निकले एक पत्थर पर खुदी पंक्तियों में इस खजाने का विस्तार से ज़िक्र है. दक्षिण भारत के अभिलेखों की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार राजराजा चोल ने इस वृहदीश्वर मंदिर में 66 धातु की मूर्तियाँ दान में दी थीं, इनमें से कुछ मूर्तियाँ सोने की भी थीं. स्वर्ण से बनी मूर्तियों में कोल्काई थेवर और शेथिरा बालर की मूर्ती थी जो आधा-आधा किलो सोने की थीं. इसी प्रकार वासुदेव की चार चाँदी की मूर्तियाँ, तथा पंचधातु की आराधनेश्वर मूर्ती भी शामिल हैं. CID अधिकारियों के अनुसार इन 66 मूर्तियों में से कुछ मूर्तियाँ गायब हैं, जिनका मूल्य भारतीय रुपयों में करोड़ों तथा उनकी ऐतिहासिकता को देखते हुए विदेशी डॉलर में और भी अधिक है. पुलिस के अनुसार पंचधातु की चारों मूर्तियों में से एक भी वहाँ नहीं है. इसी प्रकार उमा-महेश की संयुक्त मूर्ती तथा महादेवी मल्लगी की मूर्ती भी गायब है. पुलिस की पूछताछ में मंदिर के कुछ कर्मचारियों ने सरकारी गवाह बनने की शर्त पर डरते-डरते बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मंदिर की कई मूर्तियों को उनके हू-ब-हू प्रतिरूप से बदला भी गया है, ताकि शक की कोई गुंजाईश न रहे.

पुलिस महानिदेशक एजी मानिकवेल ने कहा है कि आरंभिक जाँच के अनुसार हम पक्के तौर पर कह सकते हैं कि कम से कम 13 मूर्तियाँ जिनकी कीमत करोड़ों रूपए में है, मंदिर परिसर से गायब हैं, अभी जाँच जारी है लेकिन मंदिर के अधिकारी-कर्मचारी जाँच में ठीक सहयोग नहीं करते हुए टालमटोल कर रहे हैं, या तो वे खुद भ्रष्टाचार में लिप्त हैं या फिर उन्हें तस्करों का भय है. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ राजराजा चोला और लोगाम्मा देवी की मूर्ति की कीमत सौ करोड़ रूपए से अधिक है और जाँच में पता चला है कि यह मूर्तियां लगभग पचास वर्ष पहले ही गायब हो गई थीं. फिलहाल यह मूर्तियाँ अहमदाबाद (गुजरात) के साराभाई फाउन्डेशन म्यूजियम में रखी हुई पाई गई हैं.

पाठकों को यह भी स्मरण होगा कि कुछ वर्ष पहले जम्मू के वैष्णो देवी संस्थान ट्रस्ट की भी गहन जाँच हुई थी तब यह पाया गया था कि श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए स्वर्ण जड़ित गहनों के वजन में हेराफेरी और असली के स्थान पर नकली गहने मंदिर के खजाने में पाए गए थे. उसके बाद क्या कार्यवाही हुई और कितने ट्रस्टी बर्खास्त हुए अथवा सरकार ने अपना नियंत्रण कितना मजबूत किया, इसकी जानकारी नहीं है. इसी प्रकार तमिलनाडु के मम्मालापुरम स्थित प्रसिद्ध पेरूमल मंदिर में लकड़ी की बनी कम से कम दस दुर्लभ मूर्तियाँ गायब पाई गई हैं. इस मंदिर में वार्षिक एक विशाल रथयात्रा निकलती है. उस रथ में सात फुट ऊँची लकड़ी की कुछ प्रतिमाएँ रखी जाती हैं, जो कि सौ वर्ष से अधिक पुरानी हैं और इनकी कीमत लाखों रूपए में है. एक शिकायत के बाद जाँच में पाया गया है कि “रिपेयरिंग और रेनोवेशन” के नाम पर उस रथ से कुछ मूर्तियाँ हटाई गई थीं, लेकिन अब वो कहीं मिल नहीं रहीं हैं. मंदिर के सामने लगा हुआ पाँच किलो शुद्ध कांसे का घंटा भी गायब है, जबकि वहाँ CCTV कैमरे लगे हुए हैं जो हमेशा खराब ही रहते हैं. जब कुछ श्रद्धालुओं ने मूर्तियों की चोरी की शिकायत ट्रस्टी बोर्ड और HRCE विभाग से की, तो उन्होंने इसके हल में कोई रूचि नहीं दिखाई न ही अपनी तरफ से पुलिस में कोई FIR की... मजबूरन लोगों को स्वतः ही पुलिस के पास जाना पड़ा. दानदाताओं को शक है कि कुछ मूर्तियाँ विदेशों में भेजी जा चुकी हैं, और सम्बन्धित देशों से उन्हें मँगाने के लिए भारत सरकार के विदेश एवं संस्कृति मंत्रालय को ठोस पहल करनी होगी.

संक्षेप में कहें तो देश के तमाम महत्त्वपूर्ण मंदिरों की संपत्ति, जमीन, मूर्तियाँ जो कि सरकार के अधीन है सब कुछ गंभीर खतरे में है (HRCE क़ानून और मंदिरों की लूट के बारे में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें). किसी को नहीं पता कि केरल के पद्मनाभ मंदिर की अकूत धन-सम्पदा कितनी है, कितनी चोरी हो गई, कितनी बदल दी गई अथवा कितनी सुरक्षित है. इसी प्रकार देश के अनेक मंदिर सरकार की उपेक्षा और सरकारी ट्रस्टियों के भ्रष्टाचार एवं उदासीनता का शिकार हैं (सिद्धिविनायक मंदिर की लूट के बारे में यहाँ पढ़ें). HRCE Act में तत्काल बदलाव की आवश्यकता है, जिसके द्वारा मंदिरों से सरकारी नियंत्रण समाप्त करके एक राष्ट्रीय स्तर का स्वायत्त बोर्ड बनाया जाए और वह मंदिरों का सारा आर्थिक प्रबंधन करे, ताकि चोरी-चकारी और भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सके, लेकिन सरकार इस दिशा में कतई गंभीर नहीं है.

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