हमारे भारत के “तथाकथित मेनस्ट्रीम” मीडिया में कभीकभार भूले-भटके महानगरों में काम करने वाले घरेलू नौकरों अथवा नौकरानियों पर होने वाले अत्याचारों एवं शोषण की दहला देने वाली कथाएँ प्रस्तुत होती हैं. परन्तु चैनलों अथवा अखबारों से जिस खोजी पत्रकारिता की अपेक्षा की जाती है वह इस मामले में बिलकुल नदारद पाई जाती है. आदिवासी इलाके से फुसलाकर लाए गए गरीब नौकरों-नौकरानियों की दर्दनाक दास्तान बड़ी मुश्किल से ही “हेडलाइन”, “ब्रेकिंग न्यूज़” या किसी “स्टिंग स्टोरी” में स्थान पाती हैं. ऐसा क्यों होता है?

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आजकल पश्चिमी शिक्षा एवं वामपंथी दुष्प्रचार तथा सेकुलर ब्रेनवॉश के कारण हिन्दू धर्म, संस्कृति एवं संतों के खिलाफ बोलना व उनकी खिल्ली उड़ाना आम बात हो गई है. सामान्यतः कोई भी हिन्दू ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों पर जल्दी उत्तेजित नहीं होता, परन्तु धीरे-धीरे यह प्रमाण बढ़ता ही जा रहा है.

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हिंदुओं के मामले में सेकुलरिज़्म" किस तरह सुविधाजनक चुप्पी ओढ़ लेता है यह देखना बेहद दुखदायी होता है. उड़ीसा में नवीन पटनायक साहब काफी वर्षों से मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में धर्मांतरण को रोकना तो दूर, उस पर थोड़ी लगाम कसने में भी वे नितान्त असमर्थ सिद्ध हुए हैं.

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जिस समय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने IIT मद्रास के एक छात्र समूह “अम्बेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल” (APSC) के बारे में एक गुमनाम शिकायत मिलने पर IIT मद्रास के निदेशक को इसकी जाँच करने का पत्र लिखा, उस समय शायद उन्हें भी यह भान नहीं होगा कि वे साँपों के पिटारे में हाथ डालने जा रही हैं

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जब आपदाएं आती हैं तो सब लोग मदद के लिए आगे आते हैं | गुरूद्वारे से चंदा आ जाता है, चर्च फ़ौरन धर्म परिवर्तन के लिए दौड़ पड़ते हैं, आपदा ग्रस्त इलाकों में | ऐसे में मंदिर और मठ क्यों पीछे रह जाते हैं ? दरअसल इसके पीछे 1757 में बंगाल को जीतने वाले रोबर्ट क्लाइव का कारनामा है |

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"सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है..." का घोषवाक्य मानने वाले वामपंथी भारत में अक्सर मानवाधिकार और बराबरी वगैरह के नारे देते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में इनका तीस वर्ष का शासनकाल गुंडागर्दी, हत्याओं और अपहरण के कारोबार का जीता-जागता सबूत है... वामपंथ का यही जमीनी कैडर अब तृणमूल काँग्रेस में शिफ्ट हो गया है... फिलहाल पढ़िए मनीष कुमार द्वारा वामपंथ पर लिखित एक लेख...

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देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले क्रांतिकारियों का जब जब जिक्र होगा, 1911 से 1945 तक अनवरत अपने आपको भारत की आज़ादी की लड़ाई के लिए तिल तिल गलाने वाले महान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस (Ras Bihari Bose) का नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाता रहेगा, जिनका 25 मई को जन्मदिवस है।

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