कृषि क्षेत्र का एक ऋषि : पद्मश्री सुभाष पालेकर

Written by रविवार, 26 मार्च 2017 07:59

इस वर्ष नरेंद्र मोदी सरकार ने जो पद्म पुरस्कार वितरित किए हैं, उन नामों को देखकर अधिकाँश लोग हैरान हैं, क्योंकि बहुत से लोगों को इन नामों के बारे में जरा भी जानकारी नहीं थी, न तो ये फिल्म स्टार हैं, ना ही राजनेता के पुत्र अथवा बड़े उद्योगपति या कोई शायर/लेखक.

ऐसा ही एक नाम है सुभाष पालेकर का... पद्मश्री पुरस्कार के लिए घोषित इस नाम ने कई लोगों को गूगल सर्च करने पर मजबूर कर दिया. लेकिन जमीन से जुड़े और किसानों के भले के लिए काम करने वाले इस व्यक्ति के लिए गूगल प्रोफ़ाईल अधिक मायने नहीं रखता. इस तपस्वी के लिए मायने रखता है, केवल किसान का हित और स्वदेशी तकनीक से लैस कम से कम खर्चे वाली भारतीय कृषि. 

वर्षों पहले जब एक बार सुभाष पालेकर जंगलों में निकले, तो उन्होंने देखा कि वहां के पेड़-पौधे हरे-भरे और घने थे। उनकी शाखाओं पर फल और फूल लगे थे। ये देख उनके मन में एक विचार कौंधा। तब उन्होंने सोचा भी नहीं था कि उस विचार की परिणति, आज लाखों लोगों के खेतों में नई जान ला देगी, हां, एक प्रयास जरूर किया। और यह प्रयास थमा नहीं, लंबा अनुसंधान चला। आखिरकार पालेकर ने वन वनस्पतियों की तरह ही बिना खाद-पानी और कीटनाशकों के खेतों में फसल उगाने का फॉर्मूला खोज निकाला। आज की तारीख में उस फॉर्मूले से देश के करीब 40 लाख किसान लाभान्वित हो रहे हैं। वे अपने खेतों को रासायनिक खाद और कीटनाशकों के जहर से बचा रहे हैं। आप भी ये सब कर सकते हैं। बस, थोड़ी सी अक्लमंदी, और थोड़ी सी सजगता की जरूरत है।

महाराष्ट्र के बेलोरा गांव के मूल निवासी सुभाष पालेकर को ‘कृषि का ऋषि’ कहा जाता है। ये तमगा हमने नहीं, देश में खेती-किसानी के लिए काम कर रही तमाम संस्थाओं ने दिया है। 67 वर्षीय पालेकर को कृषि क्षेत्र में किए गए उत्कृष्ट कार्यों के लिए भारत सरकार ने हाल ही में पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। इस सम्मान के पीछे सबसे बड़ी वजह है उनका फॉर्मूला। ये फॉर्मूला है ‘जीरो बजट नैचुरल फार्मिंग’ का। पालेकर एग्रीकल्चर से बीएससी है। स्नातक की पढ़ाई करने के बाद साल 1972 में पालेकर जब अपने गृहनगर लौटे, तो उनके पास कृषि क्षेत्र को देने के लिए काफी कुछ था। उन्होंने अपने पिता को आधुनिक तरीके से की जाने वाली खेती के बारे में बताया। उन्होंने पिता से कहा कि वे खेतों में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करें। ऐसी करने से उनकी फसल की पैदावार में जबरदस्त इजाफा हुआ जो बीते दस वर्षों से ज्यादा था। लेकिन वर्ष 1985 आने तक पालेकर ने गौर किया कि खेती में पैदावार कम होने लगी थी। खेतों की हालत बिगड़ती जा रही थी। अचानक हुए इस बदलाव ने पालेकर को सोचने पर मजबूर कर दिया। तीन साल की रिसर्च के बाद पालेकर को पता चला कि कम होती फसल की असली वजह रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक ही थे। पालेकर ने अपने शोध में पाया कि रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को नुकसान पहुंचा रहे थे। वैज्ञानिक अनुसंधानों के मुताबिक पौधे डेढ़ से दो प्रतिशत पोषक तत्व मिट्टी से लेते हैं, जबकि 98 प्रतिशत पोषक तत्वों की पूर्ति हवा और पानी से हो जाती है। मिट्टी से मिलने वाले दो फीसदी पर लोग तमाम तरह के रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का प्रयोग कर डालते हैं। इससे वातावरण को नुकसान तो पहुंचता ही है, उन उवर्रकों और कीटनाशकों के प्रयोग से उगाई गई चीजें (अनाज, फल और सब्जियां ) खाकर लोग बीमार पड़ते हैं सो अलग। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के प्रयोग से सामने आए परिणामों ने पालेकर को भारी सदमा दिया। उन्होंने सोच लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, देश के अन्नदाता और फसलों के लिए कुछ जरूर करेंगें। इस प्रकार उन्होंने शुरू की "जीरो बजट नैचुरल फार्मिंग" मुहिम।

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साल 1986 से 1989 तक पालेकर ने वन वनस्पति की पढ़ाई की। उन्होंने जंगलों की तरह प्रकृतिक फसल उगाने के लिए नैचुरल ईकोसिम्टम की खोज की। शुरूआत पालेकर ने अपने ही खेत से की। साल 1985 से लेकर 1989 तक जीरो बजट नैचुरल फार्मिंग के लिए पालेकर ने कई तकनीकी पर काम किया। छह वर्ष की रिसर्च के बाद पालेकर ने पाया कि देसी गायों के गोबर की खाद जर्सी या होल्स्टेन गाय के गोबर के मुकाबले बेहतर होती है। अगर किसी को गाय का गोबर नहीं मिल रहा है तो वो बैल या भैंस का गोबर इस्तेमाल कर सकते हैं। काले रंग की कपिला गाय का गोबर और मूत्र मिले तो और भी बेहतर खाद तैयार होती है। एक बात ध्यान देने वाली ये हैं कि गाय का गोबर जितना ताजा होगा उतना ठीक है और गौमूत्र जितना पुराना होगा, उतनी अच्छी रहता है।

एक एकड़ जमीन के लिए महीने में दस किलोग्राम गोबर की खाद की जरूरत पड़ती है। जबकि एक दिन में एक गाय औसतन ग्यारह किलोग्रम गोबर देती है। एक गाय से मिले गोबर से तीस एकड़ जमीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है। गाय का पेशाब, गुड़, खराब हुआ आटा गोबर की खाद को और अच्छा बना सकते हैं। अक्सर गांवों में वे गायें उदासीनता की शिकार हो जाती हैं जो दूध कम देती हैं या नहीं देती हैं। याद रखिए ऐसी गायों का गोबर खेती के लिए सबसे अच्छी खाद साबित होता है। जो मिट्टी को पुनर्जीवित कर देता है। आज पद्मश्री मिलने के बाद सुभाष पालेकर को हर कोई जानने लगा है और दूर-दूर से किसान उनके पास जीरो बजट की खेती के बारे में सीखने और टिप्स लेने आने लगे हैं. सुभाष पालेकर की इस पद्धति के कारण बूढ़ी हो चुकी गायों को भी कसाईयों से बचाया जाता है, क्योंकि गाय गोबर तो देगी ही. वह गोबर और गौमूत्र उत्तम खाद बनाने के काम आ जाता है. 40 लाख से अधिक किसान इस तकनीक का फायदा उठा रहे हैं और रासायनिक उर्वरकों से अपनी जमीन बंजर और जहरीली होने से बचा रहे हैं. 

पद्मश्री के वास्तविक हकदार श्री सुभाष पालेकर को नमन... 

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साभार : भारतीय धरोहर

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