दारू के मामले में सभी राजनैतिक पार्टियाँ एकजुट हैं

Written by सोमवार, 10 अप्रैल 2017 08:19

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक निर्णय दिया है कि नेशनल हाईवे अथवा स्टेट हाईवे (राजमार्गों) के आसपास 500 मीटर के दायरे में कोई शराब दूकान नहीं होनी चाहिए, सभी को तत्काल बंद किया जाए.

यह निर्णय इसलिए दिया गया क्योंकि ऐश-मौज-हुडदंग करने वाले अमीरज़ादे अक्सर हाईवे पर आते-जाते रास्ते में ही मौजूद शराब दुकानों से दारू पीकर न केवल हंगामा करते हैं, बल्कि राजमार्ग पर विभिन्न दुर्घटनाओं का कारण भी बनते हैं. खुद तो मरते ही हैं, दूसरों को भी साथ ले मरते हैं. सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय देश की एक शक्तिशाली लॉबी अर्थात “दारू लॉबी” को कतई पसंद नहीं आया, और ना ही शराब बेचकर मोटी “कमाई” करने वाली राज्य सरकारों को. राज्यों को देश में सर्वाधिक राजस्व पेट्रोल और शराब इन दोनों द्रव्यों से ही मिलता है. पेट्रोल के बारे में आप पिछली पोस्ट में पढ़ चुके हैं कि क्यों इसे “आब-ए-शैतान” कहा जाता है (यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है). शराब भी उसी श्रेणी में आती है और यह न केवल पीने वाले के, बल्कि पिलाने वाले (यानी राज्य सरकारों) के दिमाग पर पर्दा डाल देती है. 

हम भारतवासी क़ानून बनाने में जितने माहिर होते हैं, उससे ज्यादा माहिर क़ानून तोड़ने के रास्ते खोजने में होते हैं. क़ानून बनने से पहले ही उसमें कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे छेड़ छोड़े जाने हैं, इसकी पड़ताल कर ली जाती है. ऐसा ही कुछ सुप्रीम कोर्ट के इस शराब दूकान की दूरी वाले निर्णय में भी हुआ. चूंकि यह निर्णय अचानक आया है, इसलिए “उर्वर और चालाक भारतीय दिमागों” को इसका तोड़ खोजने में चौबीस से अडतालीस घंटे से अधिक का समय लग गया. देखते ही देखते भारत के कई राज्यों की कई नगरपालिकाओं एवं खुद राज्य सरकारों ने राजमार्गों को “डी-नोटिफाय” (निरूपित यानी अमान्य) कर दिया... यानी “तुम (सुप्रीम कोर्ट) डाल-डाल तो हम (दारू पिलाने वाले) पात-पात”. पिछले सप्ताह तक महाराष्ट्र, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल सहित लगभग बारह राज्यों ने तत्काल प्रभाव से उनके राज्यों से गुजरने वाले कुछ राजमार्गों को “अमान्य और निरूपित” घोषित कर दिया. बताओ, अब क्या कर लोगे? जब हाईवे, हाईवे ही न रहा... तो शराब की दुकानों को 500 मीटर पीछे करने की जरूरत भी ख़त्म हो गई.

शराब के लिए सुप्रीम कोर्ट को अंगूठा दिखाने के मामले में भाजपा-कांग्रेस-तृणमूल सहित लगभग सभी पार्टियाँ “एकमत” हैं. महाराष्ट्र सरकार के मंत्री चंद्रकांत पाटिल बड़ी मासूमियत से कहते हैं कि राज्य सरकार को जलगाँव, लातूर, यवतमाल नगर निगमों से यह प्रस्ताव मिला था कि वहां से गुजरने वाले राजमार्गों को “अमान्य” घोषित किया जाए, इसलिए हमने यह किया (लेकिन वे यह बताना भूल गए, कि इन नगर निगमों ने जिस ताबड़तोड़ तरीके से प्रस्ताव पास किया, और उसी ताबड़तोड़ गति से राज्य सरकार ने मंजूरी दी... वह एक “अदभुत कार्यक्षमता” दर्शाता है). पश्चिम बंगाल सरकार ने पिछले एक सप्ताह में 275 किमी हाईवे को अमान्य घोषित कर दिया है. उत्तराखंड कैबिनेट ने फुर्ती दिखाते हुए बहुत से राजमार्गों को “जिला-मार्ग” घोषित कर दिया है, बहाना यह बनाया गया है कि इन राजमार्गों की देखरेख और विस्तार किया जाना है.

सुप्रीम कोर्ट को अंगूठा कैसे दिखाया जाए, इसकी राह पंजाब ने पूरे देश को दिखाई (कांग्रेस को शासन करना आता है, और उसे अपने तरीके से क़ानून को मोड़ना भी आता है). जी हाँ!!! सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लागू होने के दिनांक करीब आने से पहले सर्वप्रथम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब के कई राजमार्गों को “अमान्य और विलोपित” घोषित कर दिया... (स्थानीय निकाय, निगम, परिषद्, पंचायत ऐसा कर सकती है). बस फिर क्या था... कांग्रेस से “प्रेरणा” लेकर बाकी के सभी राज्य उसके पीछे चल पड़े हैं. धर्मसंकट में फँसे हैं, गोवा के नए-नए मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर... चूंकि फिलहाल आम आदमी पार्टी कहीं भी सत्ता में नहीं है और उसकी कोई जिम्मेदारी भी नहीं है इसलिए वह गोवा में पर्रीकर को घेरने के चक्कर में उन्हें चुनौती दे रही है. लेकिन मनोहर पर्रीकर फिलहाल “रुको और देखो” की नीति पर चल रहे हैं, क्योंकि गोवा की मुख्य आय पर्यटन, जुआघर और शराब ही हैं (इसी के बलबूते पर पर्रीकर ने पेट्रोल से कुछ टैक्स हटा रखे हैं, तो सबसे सस्ता पेट्रोल गोवा में मिलता है).

केंद्र सरकार की जान भी साँसत में है. कई राज्यों ने उनके राज्यों से गुजरने वाले राजमार्गों को “डी-नोटिफाय” करने के बाद वहां से आने वाले राजस्व में भी तो कमी आएगी. शराब की आय तो राज्य सरकार ले उड़ेगी, लेकिन फिलहाल एक लाख किमी के नेशनल हाईवे को अगले तीन वर्षों में दो लाख किमी करने का जो लक्ष्य नितिन गड़करी ने रखा है, उसे पलीता लग जाएगा. गुजरात के पियक्कड़ केन्द्रशासित प्रदेश दमन-दीव में जाकर दारू पीते हैं, अब वहां का प्रशासन भी सोच में पड़ा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा कैसे दिखाया जाए...

सभी राजनैतिक दलों में “अदभुत एकता” देखनी हो, तो दारू के इस मामले में देखी जा सकती है... हरिवंशराय बच्चन यूँ ही नहीं कह गए कि, “मंदिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला”... सभी राज्य सरकारें और सभी राजनैतिक दल चाहते हैं कि आप हाईवे पर खूब दारू पीकर गाड़ी चलाएँ, खुद भी मरें और दूसरों को भी कुचलें... जय हो.

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