सरकारी लूट से मंदिरों को मुक्त करो – (भाग १)

Written by रविवार, 10 दिसम्बर 2017 12:00

तमिलनाडु के तंजावूर में 1000 वर्ष पुराना मंदिर (जिसका निर्माण चोल राजा राजेन्द्र ने करवाया था) अप्रैल 2016 में राज्य सरकार द्वारा ढहा दिया गया, इसके पीछे कारण यह बताया गया कि मंदिर का “नवीनीकरण और विस्तार” किया जाना है.

आश्वासन दिया गया है कि यह मंदिर दोबारा बना दिया जाएगा (जबकि सभी जानते हैं कि वैसा मंदिर दोबारा बनाना संभव ही नहीं है). मई 2010 में आंधप्रदेश में विजयनगरम साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय द्वारा निर्मित 500 वर्ष पुराना कलहस्ती मंदिर (Temples in South India) अचानक ढह गया, क्योंकि वर्षों से इस मंदिर की देखरेख में कोताही बरती गयी थी. अभी-अभी अगस्त 2017 में ही विश्व की धरोहरों पर निगाह रखने वाली विश्वव्यापी संस्था UNESCO ने तमिलनाडु सरकार को चेतावनी जारी करते हुए लिखा है कि राज्य में कम से कम 36,000 मंदिर ऐसे हैं जिनमें तत्काल पुरातात्विक-विशेषज्ञों और कुशल इंजीनियरों द्वारा मेंटेनेंस की सख्त आवश्यकता है. यूनेस्को ने आगे लिखा है कि ये दुर्लभ मंदिर, इनकी कलाकारी एवं वास्तु डिजाईन को देखते हुए यह एक प्रकार से “प्राचीन मंदिरों का सामूहिक हत्याकाण्ड” ही है... लेकिन इस रिपोर्ट को तमिलनाडु सरकार ने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया. तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंधप्रदेश के कई विशाल मंदिर विश्व की धरोहर हैं, संस्कृति के वाहक हैं... तमिलनाडु में कम से कम दो दर्जन मंदिर ऐसे हैं जो 1000 वर्ष पुराने हैं और अभी भी “चालू हालत” में हैं, इन्हें बचाने और समुचित रखरखाव करने की आवश्यकता है, परन्तु शासन की अनदेखी और जड़ में है “Hindu Religious and Charitable Endowment Act 1951” (HRCE Act 1951). यही काला क़ानून राज्यों की सरकारों को “केवल मंदिरों पर नियंत्रण” करने के लिए असीमित अधिकार देता है. इसका नतीजा यह होता है कि मंदिरों पर सरकार का पूरा नियंत्रण होता है, मंदिर में आने वाले धन, इसकी जमीन और अन्य सामग्री के बारे में केवल शासन ही निर्णय ले सकता है.... कोई शंकराचार्य अथवा कोई हिन्दू संगठन नहीं. स्वाभाविक है कि मंदिरों से होने वाली अकूत कमाई में नेताओं का, विधर्मियों का, इस लूट में शामिल NGOs गिरोहों का तथा हिन्दू विरोधी स्वार्थी तत्त्वों का बड़ा हिस्सा होता है. यह एक तरह से “लोमड़ी को मुर्गी के पिंजरे की रखवाली” सौंपने जैसा काम है.

इस HRCE क़ानून के तहत राज्य सरकारें मंदिरों के प्रबंधन(??) हेतु ट्रस्ट अथवा स्वतंत्र बोर्ड बनाने का अधिकार देता है. ज़ाहिर है कि ऐसे प्रबंधन ट्रस्टों में लगभग सभी निर्णायक पदों पर सरकारों के कैबिनट मंत्री, (खुद को जमीन से दो इंच ऊपर समझने वाले) IAS अधिकारी तथा चमचों की भरमार होती है, जिन्हें धर्म, धार्मिक गतिविधियों, मंदिरों की पवित्रता, रखरखाव इत्यादि से कोई मतलब नहीं होता... उन्हें तो इस ट्रस्ट के माध्यम से मिलने वाले रुतबे और सुविधाओं से मतलब होता है. सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के अनुसार राज्य सरकारें ऐसे ट्रस्टों अथवा बोर्ड में “किसी की भी” नियुक्ति कर सकती है... जी हाँ!!! किसी की भी... यानी मंदिर प्रबंधन के ऐसे ट्रस्टों कथित रूप से नास्तिक माने जाने वाले वामपंथी भी हो सकते हैं, नास्तिक भी हो सकते हैं... मुस्लिम भी हो सकते हैं. इस बारे में किसी भी हिन्दू संगठन अथवा धार्मिक गुरु को कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं है.

 

tara tarini shakti peetha

 

1951 में जिस समय तमिलनाडु में यह “काला क़ानून” पेश किया गया था, उस समय विधानसभा में बोलते हुए तत्कालीन मद्रास के मंत्री ओपी रामास्वामी रेड्डीयार ने बड़े उच्च आदर्श वाक्य कहे थे... कि – “....यह क़ानून पेश करते समय मैं यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि मेरे दिल में अपने धार्मिक विश्वास के प्रति दिल से सम्मान है.... हिन्दू मंदिरों और मठों का नियमन और प्रबंधन करना आवश्यक है, ताकि इनकी भव्य पुनर्स्थापना की जा सके... समाज के, हिन्दुओं के और धार्मिक विकास के उत्थान हेतु यह जरूरी है...”. उस समय भी हिन्दुओं ने संगठित रूप से इस बात का विरोध दर्ज नहीं किया कि “केवल मंदिरों और मठों” को ही सरकार अपने अधीन क्यों ले रही है, मस्जिदों, मदरसों, वक्फ बोर्ड, चर्च, मिशनरी ट्रस्टों के कब्रिस्तान से लेकर अस्पतालों का नियंत्रण सरकार अपने हाथ में क्यों नहीं लेती?? लेकिन दुर्भाग्य देखिये, जैसा कि ऊपर लिखा गया है, “लोमड़ी को, मुर्गी के पिंजरे की देखभाल हेतु नियुक्त करना”... ठीक वैसा ही हाल इस हिन्दू विरोधी काले क़ानून के कारण विभिन्न राज्य सरकारों में हिन्दू मंदिरों का हो रहा है.

केरल में हिन्दू धर्म के धुर विरोधी वामपंथी... तमिलनाडु में राम के अस्तित्व को नकारने वाली और खुद को नास्तिक कहने वाली द्रविड़ पार्टियों तथा आंध्रप्रदेश में राजशेखर रेड्डी जैसे “क्रिप्टो ईसाई” (जिन्होंने तिरुपति मंदिर के पास चर्च बनाने के लिए जोर-आजमाईश की थी) के हाथों में हजारों मंदिरों की आर्थिक देखभाल का जिम्मा है. आप खुद ही सोच सकते हैं कि इन राज्यों में इन लोमड़ियों ने अभी तक पिछले साठ वर्षों में मंदिरों की कितनी हिन्दू सम्पत्ति बाँट कर खाई होगी. 1951 में तमिलनाडु सरकार द्वारा इस काले क़ानून को पास करने के बाद ताबड़तोड़ लगभग सभी राज्यों ने अपने-अपने विधानसभाओं में इसी से मिलता-जुलता क़ानून बना लिया और मंदिरों की संपत्ति, दान में आने वाले करोड़ों रूपए पर कब्ज़ा करने की कवायद शुरू कर दी. आए दिन बड़े और धनी मंदिरों जैसे तिरुपति, गुरुवायूर तथा मुम्बई के सिद्धिविनायक मंदिरों से राज्य सरकारें “जनता की भलाई और विकास कार्यों” के नाम पर पैसा निकालती रही हैं, जो कि अंततः नेताओं और IAS अफसरों की जेब में ही जाता है. यह “होलसेल लूट” वर्षों से जारी है, अब तो कोई धर्माचार्य, कोई हिन्दू संगठन अथवा प्रवचनकार इसके खिलाफ आवाज़ तक नहीं उठाते.

तमिलनाडु का HRCE विभाग इस समय हिन्दू मंदिरों की चार लाख एकड़ की कृषि भूमि, दो करोड़ स्क्वेयर फुट की आवासीय/व्यावसायिक इमारतों, तथा उनतीस करोड़ स्क्वेयर फुट की शहरी भूमि का प्रबंधन करता है... कहने को तो इसके द्वारा सरकार की 36 करोड़ रूपए प्रतिवर्ष की आमदनी होती है, लेकिन एक गिरे से गिरे हुए सामान्य ज्ञान वाले व्यक्ति को भी समझ में आ सकता है कि इतनी कृषि भूमि और इतनी जमीन से होने वाली आमदनी 36 करोड़ से कई गुना हो सकती है (होती भी है).... लेकिन तथाकथित “प्रबंधन” के नाम पर रेवड़ियां बाँटने और हिन्दू विरोधी बाहरी तत्वों की मुफ्तखोरी जारी रहने के कारण जो कमाई कम से कम एक हजार करोड़ होनी चाहिए, वह केवल छत्तीस करोड़ ही है.... और इस छत्तीस करोड़ वार्षिक की रकम में से भी कितनी रकम केवल मंदिरों के रखरखाव, निर्माण पर खर्च होती है और कितनी रकम फालतू के कामों में खर्च होती है, यह कोई भी एक सामान्य सी RTI लगाकर जान सकता है.

यह आर्थिक कुप्रबंधन जानबूझकर किया जाता है, ताकि मंदिरों पर पैसा कम खर्च करना पड़े और हिन्दुओं की जेब से दानपेटी में पड़ने वाला लाखों रुपया दूसरे फालतू कामों में लगाकर भ्रष्टाचार करके खुद की जेब में ट्रांसफर किया जा सके. जैसा कि पहले कहा गया, चूँकि मंदिरों के ट्रस्टों अथवा बोर्ड में हिन्दुओं के वास्तविक प्रतिनिधि तो होते नहीं हैं, जानकार लोग तो कतई नहीं रखे जाते... इसलिए होता यह है कि मंदिरों के रखरखाव और निर्माण कार्यों के दौरान मनमाने तरीके से ऊटपटांग काम करवाए जाते हैं. इस कथित रखरखाव कार्य के दौरान उस मंदिर की संस्कृति, इतिहास अथवा पुरातत्व के बचाव एवं उत्थान की इन ट्रस्टियों के पास कोई योजना अथवा इच्छा तक नहीं होती है. नतीजे में तमिलनाडु के कई मंदिरों की बेशकीमती वॉल पेंटिंग्स बर्बाद हो गईं... कई प्राचीन महत्त्व के तथा उच्च मूर्तिकला वाले मंडपम या तो ध्वस्त हो गए अथवा उन पत्थरों पर सफेदी अथवा ऑइल पेंट पोत दिया गया... निर्माण कार्यों के दौरान कई महत्त्वपूर्ण मूर्तियाँ तो रातोंरात गायब भी हो गईं, जो कि ज़ाहिर है मूर्ति तस्करों के माध्यम से विदेश भेजकर करोड़ों रूपए के वारे-न्यारे किए गए होंगे. जब इन बातों का पता जनता को चलता है, विरोध के स्वर उठने शुरू होते हैं... अखबार वाले “ब्लैकमेलरों” को इसकी जानकारी मिलती है तब तक तो हिन्दुओं के इन मंदिरों का भारी नुक्सान हो चुका होता है, क्योंकि मंदिरों के बोर्ड में स्थापित नेताओं-अफसरों को न तो भारतीय व हिन्दू संस्कृति से कोई लेना-देना है, न वास्तुकला से और ना ही पुरातत्व के संरक्षण से.

भारत के नेताओं और अफसरों ने मंदिरों की संपत्ति की यह “संगठित और होलसेल लूट” अंग्रेजों से सीखी है. तमिलनाडु स्थित चेंगलपट्टू के पहले कलेक्टर ने 1799 में पेश की गई अपनी “जागीर रिपोर्ट” में इसका उल्लेख किया है कि किस तरह से उसने मंदिरों की आय और प्रबंधन को अपने हाथ में लिया. फिर दो ही वर्ष में अर्थात 1801 आते-आते यह अंग्रेज सरकार की परंपरा ही बन गई और उन्होंने अलग-अलग मंदिरों से एक स्थायी समझौते के तहत “फिक्स्ड मनी अलाउंस” नोचना शुरू कर दिया. उत्तरी आर्कोट जिले के तत्कालीन कलेक्टर ने 1831 में एशियाटिक सोसायटी जर्नल में तिरुपति मंदिर की आय को किस तरह कब्जे में लिया जाए, यह लिखा है.

दुःख की बात यह है कि हिन्दू मंदिरों की इस लूट के बारे में हिन्दू संतों अथवा हिन्दू संगठनों की बजाय एक अत्यंत शोधपरक और तथ्यात्मक पुस्तक एक विदेशी लेखक श्री स्टीफन नैप ने लिखी है जिसका नाम है “Crimes Against India and the Need to Protect Ancient Vedic Tradition” जो अमेरिका से प्रकाशित हुई है. इसे पढ़ने पर आप चौंक जाएंगे (http://www.stephen-knapp.com/crimes_against_india.htm). स्टीफन नैप लिखते हैं कि जिन भक्त राजाओं ने ये मन्दिर बनवाए, उनमें से किसी ने भी उन मन्दिरों पर अपना या अपने परिवार का कोई अधिकार नहीं जताया. कई राजाओं ने तो अपना नाम तक नहीं छोड़ा है, सदियों पुराने मंदिरों का पता ही नहीं चलता कि किसने करोड़ों रूपए खर्च करके वे बनाए होंगे. मन्दिरों और उनके धन पर नियंत्रण की तो बात ही छोड़िये, इन राजाओं ने भूमि तथा अन्य संपत्तियों को भी इन मन्दिरों के नाम कर दिया, जिनमें इनके आभूषण भी शामिल हैं. इन हिन्दू राजाओं ने मंदिरों की सिर्फ सहायता की, उनपर किसी प्रकार का दावा नहीं ठोका.... और होना भी यही चाहिये.

आज की सरकारों ने कोई भी बड़ा मन्दिर नहीं बनवाया (कुछेक को छोड़कर) और उन्हें इनमें से किसी भी मन्दिर -- उनके धन, प्रशासन अथवा पूजा पद्धति पर कोई अधिकार नहीं है. इन मंदिरों का धन सिर्फ इन मन्दिरों के प्रशासन, उनके रखरखाव, पारिश्रमिक, उनसे जुड़ी आधारभूत संरचनाओं तथा सुविधाओं पर खर्च होना चाहिये तथा इसके अलावा जो धन बच जाय वह अन्य गौण मन्दिरों, खासकर पुराने मन्दिरों की मरम्मत पर खर्च होना चाहिये. Temple Endowment Act के तहत, आंध्रप्रदेश में 43000 मंदिर सरकार के नियंत्रण में आ गए हैं, और इन मंदिरों का सिर्फ 18% राजस्व इन मंदिरों को लौटाया गया है, शेष 82% को “अज्ञात कार्यों” (आप जानते ही हैं कि ये पैसा कहाँ गया होगा) में लगाया गया है. यहाँ तक कि विश्व प्रसिद्ध तिरुमाला तिरुपति मंदिर को भी नहीं बख्शा गया. स्टीफन के अनुसार, इस मंदिर में प्रतिवर्ष 3100 करोड़ से भी अधिक रूपये जमा होते हैं, और राज्य सरकार ने इस आरोप का खण्डन नहीं किया है कि इस राशि का 85% राजकोष में जमा हो जाता है, और इसमें से अधिकतर उन मदों में व्यय होता है जो हिन्दू समुदाय से संबद्ध नहीं हैं.

एक और आरोप जो लगाया गया है वो ये कि आंध्र सरकार ने कम से कम 10 मंदिरों को गोल्फ कोर्स बनाने के लिये तोड़ने की अनुमति दी है। स्टीफन नैप लिखते हैं, कल्पना कीजिये अगर इनकी बजाय 10 मस्जिद तोड़ दिये जाते तो कितना सेकुलर बवेला मचता? कर्नाटक में लगभग 2 लाख छोटे मंदिरों से 79 करोड़ वसूले गए, उनमें से मंदिरों को सिर्फ 7 करोड़ मिले, मुस्लिम मदरसों और हज सब्सिडी में 59 करोड़ दिये गए और चर्चों को लगभग 13 करोड़ दिये गए. Stephen Knapp लिखते हैं कि इसके कारण 2 लाख मंदिरों में से 25% यानि लगभग 50,000 मंदिर संसाधनों के अभाव में कर्नाटक में बंद कर दिये जाएंगे, और उनके अनुसार सरकार के इस कृत्य के लिये सिर्फ हिंदुओं की लापरवाही और सहिष्णुता ही जिम्मेदार है.

अपनी पुस्तक में वे केरल का भी उल्लेख करते हैं जहाँ, गुरुवयूर मंदिर के फण्ड को दूसरी सरकारी योजनाओं में लगा दिया गया है जिससे 45 हिन्दू मंदिरों का विकास रुक गया है. अयप्पा मन्दिर की भूमि पर कब्ज़ा कर लिया गया है तथा चर्च, विस्तृत वन क्षेत्र को -- सबरीमाला के निकट हजारों एकड़ भूमि को -- अतिक्रमण से दबाकर बैठी है. केरल की कम्युनिस्ट राज्य सरकार एक अध्यादेश पारित करना चाहती है ताकि वह Travancore & Cochin Autonomous Devaswam Boards (TCDBs) को समाप्त कर दे तथा 1800 हिन्दू मंदिरों पर उनके सीमित स्वतंत्र अधिकारों को हथिया ले. महाराष्ट्र सरकार भी राज्य में 45,000 मन्दिरों पर कब्ज़ा करना चाहती है, जो राज्य के दिवालियेपन को हटाने के लिये विशाल राजस्व जुटाएंगे.

इसी प्रकार उड़ीसा में राज्य सरकार जगन्नाथ मन्दिर की 70,000 एकड़ से भी अधिक दान में मिली भूमि को बेचना चाहती है, जिसकी राशि से इसके अपने ही मन्दिर कुप्रबंधन से उपजे वित्तीय घाटे को पूरा किया जाएगा. किताब के अनुसार, इन बातों की जानकारी इसलिये नहीं हो पाती क्योंकि भारतीय मीडिया, खासकर इंग्लिश टेलीविज़न और प्रेस, हिन्दू विरोधी हैं और हिन्दू समुदाय को प्रभावित करनेवाली किसी भी बात को न तो कवरेज देना चाहती हैं, और न ही उनसे कोई सहानुभूति रखती हैं. अतः, सरकार के सभी हिन्दू विरोधी कार्य बिना किसी का ध्यान खींचे चलते रहते हैं.

संभव है कि कुछ घटिया और नीच लोगों ने पैसे कमाने के लिये मन्दिर खड़े कर लिये हों. परन्तु सरकार को भला इससे क्या सरोकार होना चाहिये? सारी आमदनी को हड़प लेने की बजाय, सरकार मंदिरों को फण्ड के प्रति जवाबदेह बनाने के लिये कमिटियों की स्थापना कर सकती है -- ताकि उस धन का “सिर्फ और सिर्फ मन्दिर के उद्देश्य से” समुचित उपयोग हो सके. स्वतंत्र लोकतान्त्रिक देशों में कहीं भी धार्मिक संस्थाओं को सरकार द्वारा नियंत्रित नहीं किया जाता, और देश के लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाता, पर भारत में ये हो रहा है. सरकारी अधिकारियों ने हिन्दू मंदिरों का नियंत्रण अपने हाथों में ले रखा है, क्योंकि उन्हें इसमें पैसों की गंध लगती है, वे हिंदुओं की लापरवाही से परिचित हैं, वे जानते हैं कि हिन्दू हद दर्जे के सहिष्णु और धैर्यवान हैं. वे ये भी जानते हैं कि सड़कों पर प्रदर्शन करना, संपत्ति का नुकसान करना, धमकी, लूट, हत्या, ये सब हिंदुओं के खून में नहीं है. हिन्दू चुपचाप बैठे अपनी संस्कृति की हत्या देख रहे हैं. उन्हें अपने विचार स्पष्ट और बुलंद आवाज में व्यक्त करने चाहिये. समय आ गया है कि कोई सरकार से कहे कि सभी तथ्यों को सामने रखे ताकि जनता को पता चले कि उसकी पीठ पीछे क्या हो रहा है. “पीटर को लूट कर पॉल का पेट भरना”, धर्मनिरपेक्षता नहीं है, और मंदिर लूटने के लिये नहीं बने हैं. हम तो समझ रहे थे कि महमूद ग़ज़नवी मर चुका है, लेकिन नहीं... वह लोकतंत्र में भी रूप बदलकर मौजूद है...

मंदिरों की इस “सरकारी संगठित लूट” के बारे में इस साईट पर इसके आगे एक या दो भाग और आएँगे... कृपया पढ़ते रहिये... आपका अपना desicnn.com     (अगले भाग में जारी.......) 

desicnn.com पर मंदिरों की लूट से सम्बंधित कुछ अन्य लेखों की लिंक इस प्रकार है... 

मंदिरों पर GST लेकिन चर्च और मस्जिदों को छूट :- http://desicnn.com/news/gst-imposed-on-tirupati-tirumala-devasthanam-and-church-mosque-exempted-is-opposed 

मंदिरों की प्राचीन व्यवस्था और वर्तमान लूट :- http://desicnn.com/news/ancient-hindu-temples-managed-by-priests-and-king-now-mandir-board-is-a-demand-of-time 

पद्मनाभ मंदिर में बार लगने वाली आग का रहस्य क्या है? :- http://desicnn.com/news/padmanabh-temple-suspicious-fire-broke-out 

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