मोदीजी हिन्दू छात्र भी गरीब हैं.. उन्हें छात्रवृत्ति क्यों नहीं?

Written by गुरुवार, 23 मार्च 2017 08:30

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दो वर्ष पहले “केवल अल्पसंख्यक छात्रों” के लिए लिए आरम्भ की गई “नई उड़ान” छात्रवृत्ति योजना में लाभार्थियों की संख्या दो साल में ही दोगुनी हो गई है.

इस योजना के तहत केन्द्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय अपने शहर से बाहर रहने वाले “अल्पसंख्यक” छात्रों को 3000 रूपए की छात्रवृत्ति देता है. राज्यसभा में दिए गए गए जवाब में मुख्तार अब्बास नकवी ने बताया कि मोदी सरकार द्वारा विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण के लिए कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं और इसके लाभार्थियों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है.

भारत सरकार के सूचना विभाग द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार 2015-16 में 606 मुस्लिमों, 341 ईसाईयों, तथा 28 सिखों ने इस योजना का लाभ लिया था, जबकि इस वर्ष अभी तक केवल तीन माह (मार्च तक) में ही 564 मुस्लिमों, 185 ईसाईयों और 12 सिख बच्चों ने इस छात्रवृत्ति का लाभ ले लिया है... अर्थात इस वर्ष के ख़त्म होने तक यह संख्या पिछले वर्ष से तीन गुना से भी अधिक हो जाएगी. “सबका साथ, सबका विकास” के नारे में “हिन्दू बच्चों” को शामिल नहीं किया गया है, जो कि साफ़-साफ़ शिक्षा के क्षेत्र में धर्म के आधार पर भेदभाव करते हुए संविधान का उल्लंघन है.

मुख्तार अब्बास नकवी ने “गर्व” के साथ यह घोषणा भी की कि बेगम हज़रत महल राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना में अभी तक 48000 मुस्लिम लड़कियों ने लाभ उठाया है. (क्योंकि हिन्दू लडकियाँ तो आर्थिक रूप से समृद्ध होती ही हैं). यह छात्रवृत्ति भी अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा मौलाना आज़ाद एजुकेशन फौंडेशन के जरिये दी जाती है. एक और योजना है, जिसका नाम है “नई रोशनी”, इसमें भी NGOs के माध्यम से “केवल अल्पसंख्यक महिलाओं” को ही 1500 रूपए प्रतिमाह की मदद की जाती है, ताकि वे कोई छोटे-मोटे काम धंधे कर सकें.

स्वाभाविक रूप से कुछ सवाल उठते हैं जैसे, क्या शहर से बाहर रहकर पढाई करने वाले हिन्दू लड़के गरीब नहीं होते? क्या हिन्दू लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहन राशि अथवा साईकल इत्यादि की जरूरत नहीं है? क्या गरीबी केवल हिन्दू-मुस्लिम देखकर आती है, फिर केवल अल्पसंख्यक महिलाओं को ऋण देना कहाँ तक उचित कहा जा सकता है? दूसरा सवाल यह है कि ऐसी सभी योजनाओं का लाभ उठाने में हमेशा मुसलमान ही क्यों आगे रहते हैं, सिख कैसे पिछड़ जाते हैं? और अंत में सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल -- बीस करोड़ से अधिक (अनुमानतः इससे भी अधिक) की मुस्लिम आबादी “अल्पसंख्यक”(?) बनकर कब तक देश के संसाधनों पर बोझ बनी रहेगी, चट करती रहेगी? अल्पसंख्यक की परिभाषा क्या होनी चाहिए?

कहाँ गया सबका साथ, सबका विकास...??? 

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