भाजपा राज्य सरकारों को ममता बनर्जी से सीखना चाहिए

Written by बुधवार, 21 फरवरी 2018 20:20

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने RSS से संबद्ध संस्थाओं (RSS and its Organizations) द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों पर कड़ा रुख अपना लिया है. राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थो चटर्जी ने विधानसभा में लिखित बयान में कहा है कि राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संस्थाओं से संबद्ध 493 स्कूल हैं, इनमें से 125 स्कूल राज्य सरकार से “नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट” प्राप्त किए बिना अपना स्कूल (Saraswati Shishu Mandir) संचालित कर रहे हैं.

हमने उन्हें स्पष्ट कर दिया है कि अगले सत्र से वे स्कूल नहीं चला सकेंगे. बचे हुए अन्य स्कूलों के समस्त दस्तावेजों की भी जाँच की जा रही है, यदि कुछ भी अनियमित पाया गया तो उन्हें भी बन्द करने का नोटिस भेजा जाएगा.

जैसा कि अब सभी को ज्ञात है, पिछले कुछ वर्षों में भाजपा और संघ ने बंगाल में तेजी से अपनी पैठ बढ़ाई है. बंगाले की पूर्ववर्ती वामपंथी सरकारों तथा लगातार दो बार से जीत रही ममता बनर्जी सरकार ने राज्य के 34% मुस्लिमों का तुष्टिकरण (Muslim Appeasement in India) करने के चक्कर में हिंदुओं की जमकर उपेक्षा की है. इसलिए धीरे-धीरे हिंदुओं का वोट शेयर भाजपा की तरफ खिसक रहा है. हालाँकि बंगाल में 30 वर्षों से अधिक लगातार वामपंथी शासन ने वहाँ की जनता का पूर्ण ब्रेनवॉश किया हुआ है, इसलिए संघ-भाजपा को वहाँ पैर जमाने में दिक्कतें आ रही हैं, परन्तु जिस तरह से पिछले दिनों ममता बनर्जी हिंदुओं की रथयात्रा में शामिल हुईं और अब सरस्वती शिशु मंदिरों के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोला है, उससे पता चलता है कि वे थोड़ी भयभीत तो हैं ही.

 

RSS Schools

राज्य विधानसभा के बाहर प्रेस कांफ्रेंस में ममता बनर्जी ने कहा कि, “..स्कूल में लाठियों की शिक्षा देने का कोई काम नहीं है, हम यह सुनिश्चित करेंगे कि स्कूलों में कोई अवैध गतिविधि न हो और बच्चों के मनोमस्तिष्क पर गलत प्रभाव और हिंसात्मक छवि न उभरे...”. इसके जवाब में दक्षिण बंगाल प्रांत के RSS अधिकारी जिश्नू बासु ने कहा कि स्कूलों को बन्द करने अथवा उन्हें मानसिक रूप से परेशान करने से पहले ममता सरकार के अधिकारियों को इन स्कूलों का निरीक्षण करना चाहिए. हम अपनी शालाओं में बच्चों को एक उन्मुक्त और स्वच्छ वातावरण में उच्च नैतिक शिक्षा प्रदान करते हैं. जबकि उधर बंगाल के शिक्षा मंत्री ने आरोप लगाया कि इन स्कूलों में से अधिकाँश स्कूल उत्तरी बंगाल के कूचबिहार और अलीपुरद्वार जैसे जिलों में हैं और इन्हें वामपंथी शासनकाल में अनुमति मिली थी.

संक्षेप में बात ये है कि ममता सरकार अब पूरी तरह से “इस्लामिक तुष्टिकरण” पर उतर आई है और बंगाल में सरस्वती शिशु मंदिरों को खासा परेशान किया जाने वाला है. इस पूरे प्रकरण से भाजपा की विभिन्न राज्य सरकारों को यह सबक लेना चाहिए कि यदि सरकार चाहे तो वह चाहे जिसकी, चाहे जब और चाहे जैसे बाँह मरोड़ सकती है, क्योंकि संविधान में “शिक्षा” राज्य का मामला है.

 

Carmel

लेख खत्म होने आया और आप सोच रहे होंगे कि इसमें भाजपा को सबक लेने वाली कौन सी बात है?? तो सबक ये है कि जिस तरह से ईसाई धर्मान्तरण के अड्डों के रूप में मिशनरी स्कूल भाजपा के राज्यों में कुकुरमुत्ते की तरह गाँव-गाँव में उगे चले जा रहे हैं उन्हें रोकने, परेशान करने, शासकीय प्रक्रियाओं में उलझाकर, नोटिस देकर, धमकाकर बड़े आराम से बन्द किया जा सकता है. कई-कई राज्यों में तो भाजपा को शासन करते हुए 15-20 साल तक हो चुके हैं, लेकिन इन राज्यों में न मिशनरी प्रोपोगंडा पर कोई लगाम कसी गई, न कान्वेंट स्कूलों की कोई गंभीर जाँच हुई और ना ही इन के पाठ्यक्रम पर सरकार का कोई नियंत्रण है जिससे हिन्दू बच्चों को ब्रेनवॉश से बचाया जा सके. क्या हिन्दूवाद की विचारधारा के लिए भाजपा सरकारें इतना मामूली काम भी नहीं कर सकतीं?? ऐसा क्यों हो रहा है कि भाजपा शासित राज्यों में मिशनरी स्कूल अपने पैर पसारते जा रहे हैं?? जबकि उधर ममता बनर्जी सरेआम सरस्वती शिशु मंदिरों को बन्द करने पर तुली हैं... क्या भाजपा की सरकारों में “नैतिकता का ओवरडोज़” है, या सेकुलरिज़्म का कीड़ा है?? या फिर धर्मान्तरण के खेल में लगे मिशनरी स्कूलों पर डंडा चलाने का दम नहीं है?? ममता बनर्जी से कुछ तो सीखें.... 

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