क्या “शिक्षा का अधिकार”(RTE) हिन्दुओं के लिए जज़िया है?

Written by शनिवार, 04 मार्च 2017 21:41

ज़ाहिर है कि शीर्षक पढ़कर आप चौंक गए होंगे. स्वाभाविक सी बात है, क्योंकि आपके दिमाग में यह बैठा दिया गया है कि शिक्षा का अधिकार क़ानून यानी राईट टू एजूकेशन (RTE) एक गरीब समर्थक और समाज की भलाई के लिए बनाया क़ानून है.

जिसके जरिये समाज के वंचित बच्चों को अच्छे स्कूलों में मुफ्त शिक्षा मिलती है. असल में होता यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जब भी कोई स्वार्थी मुहीम चलानी होती है तो उसे ऐसे ही मधुर शब्दों के पीछे छिपाया जाता है, फिर सम्बंधित देश की सरकारों को झाँसे में लेकर ऐसे कानूनों की रचना की जाती है, जिसके द्वारा लूट संभव हो सके. इसके लिए भारीभरकम फण्ड जुटाया जाता है और सरकारों पर विभिन्न NGOs और आन्दोलनों के जरिये दबाव बनाया जाता है. मधुर शब्दजाल बुना जाता है और क़ानून की महीन परतों के पीछे लूट का कार्यक्रम बनाया जाता है.

जब आप यह लेख पूरा पढेंगे तो आप समझ जाएँगे कि कहाँ-कहाँ पर, कैसा-कैसा खेल किया गया है. शिक्षा का अधिकार क़ानून UPA-2 सरकार की देन है, और यह क़ानून भाजपा के समर्थन के कारण ही 2009 में संसद से पास हो सका था. आश्चर्य तो यह होता है कि अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद जैसे महान वकीलों और कानूनी दिग्गजों के रहते यह क़ानून बन कैसे गया? “केवल हिन्दू स्कूलों” पर लगाए जाने वाले इस “इस्लामी जज़िया टैक्स” को भाजपा ने पास कैसे होने दिया गया? भाजपा में बैठे बड़े-बड़े वकीलों और नेताओं की फ़ौज को यह बात समझ में क्यों नहीं आई कि शिक्षा का अधिकार क़ानून वास्तव में, “हिन्दू शैक्षणिक संस्थाओं” का एक हाथ और एक पैर बाँधकर मिशनरी और मदरसों से मुकाबला करने के लिए मैदान में छोड़ देने जैसा है. आईये देखते हैं कैसे...

चूंकि यह क़ानून अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों पर लागू नहीं है, इसलिए यह क़ानून हिन्दुओं द्वारा संचालित संस्थाओं को गरीबों में बाँटी जाने वाली मुफ्त सीटों के कारण दुसरे बच्चों की फीस बढ़ाने पर मजबूर करता है. इस कारण हिन्दू निम्न-मध्यम वर्गीय माता-पिता अपने बच्चे को सस्ते मिशनरी स्कूलों में ले जाने के लिए बाध्य हो जाते हैं और इस कारण मिशनरी स्कूलों को उनके “उद्देश्य” की पूर्ति में सहारा भी मिलता है. ईसाई संस्थाओं को ऐसी कोई बाध्यता नहीं है, इसलिए उन पर प्रतिस्पर्धा का कोई दबाव नहीं होता. उल्लेखनीय है कि RTE केवल और केवल हिन्दुओं द्वारा संचालित स्कूलों (निजी अथवा संस्थान) पर ही लागू होता है, अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों पर नहीं. साथ ही अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं में क्या और कैसा पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा है, अथवा पढ़ाया जाएगा इस पर भी शासन का कोई नियंत्रण नहीं रहता है. हाल ही में केरल के एक मिशनरी स्कूल में नर्सरी की पुस्तक में जीसस क्राईस्ट को भगवान कृष्ण के मालिक और उनसे श्रेष्ठ बताया जा चुका है, और इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है. ऐसे में सवाल उठता है कि हिन्दू शिक्षा संस्थाओं के हाथ “25% गरीब बच्चों को एडमिशन देना अनिवार्य है” जैसे क़ानून से क्यों बांधे गए हैं? इन 25% बच्चों की पढाई के खर्च, संसाधनों और श्रम का बोझ बाकी के 75% बच्चों पर ही पड़ रहा है (जो कि स्वाभाविक रूप से हिन्दू परिवारों के ही हैं). ऐसे में “तथाकथित गरीब” (जो वास्तव में फीस दे सकता है, लेकिन देता नहीं है), वह धीरे से किसी सस्ते वाले मिशनरी स्कूल में एडमिशन ले लेता है, जहां उसके दिमाग में हिन्दू विरोधी अथवा नास्तिकता का ज़हर घोलने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. दुःख की बात यह है कि NDA की सरकार RTE क़ानून को सख्ती से लागू करने पर उतारू भी है. NISA (राष्ट्रीय स्वतन्त्र शालेय गठबंधन) के आँकड़ों पर भरोसा करें तो केवल 2014 में ही 4327 स्कूल बंद किए जा चुके हैं. 2015-16 में 3332 स्कूलों को पहले नोटिस थमाया गया और फिर बंद कर दिया गया. गरीब बच्चों को एडमिशन नहीं देने के जुर्म(??) में मध्प्रदेश की शिवराज सरकार ने लगभग 30% निजी स्कूलों को बंद करने का फरमान सुना दिया है. जबकि उधर महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस ने पिछले तीन वर्ष में अभी तक 7000 “हिन्दू शिक्षण संस्थाओं” पर ताले लगवा दिए हैं.

2009 में बने इस काले क़ानून के बाद स्कूल संचालकों ने सोचा था कि 2014 में नरेंद्र मोदी के आने के बाद स्थिति में परिवर्तन आएगा, परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. “हिंदूवादी”(??) मानी जाने वाली इस सरकार में न तो स्मृति ईरानी और ना ही प्रकाश जावडेकर ने इस समस्या की तरफ ध्यान दिया. जिन्हें पता नहीं हो उन्हें यह बताना जरूरी है कि शिक्षा का अधिकार क़ानून के तहत जिन 25% गरीब या अल्पसंख्यक बच्चों को निजी शालाओं में प्रवेश दिया जाता है, उनकी फीस सब्सिडी के रूप में सरकार इन स्कूलों को वापस करती है. कागज़ पर तो यह सही दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में कई स्कूलों को तीन-चार वर्ष से इस फंड की फूटी कौड़ी भी नहीं मिली है और वे मजबूर हैं कि अपने स्कूल की 25% सीटें इन मुफ्त बच्चों के नाम करें. स्वाभाविक है कि निजी स्कूल धीरे-धीरे मरते ही जाएँगे और शासकीय स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है. अब जो निजी स्कूल इस “लंगड़ी दौड़” में बचे रह जाएँगे, वह केवल इसीलिए बचेंगे क्योंकि वे फीस बढाने में सक्षम हैं और वहां आने वाले पालक बढ़ी हुई फीस देने में भी सक्षम हैं, लेकिन ऐसा प्रत्येक स्कूल के साथ नहीं होता. नतीजा यह होगा कि बंद होने वाले स्कूल के बच्चे “अपेक्षाकृत सस्ते मिशनरी स्कूल अथवा मदरसे” में चले जाएँगे. शिक्षा का मामला “राज्य सरकारों” के हाथ में होता है, इसलिए गैर-भाजपा शासित राज्यों में तो यह “मिशनरी कारोबार” खूब फल-फूल रहा है, लेकिन कम से कम भाजपा शासित राज्य इतना तो कर ही सकते हैं कि शिक्षा का अधिकार क़ानून सख्ती से लागू न करवाएँ, अथवा स्कूलों को मिलने वाली सब्सिडी और मुआवज़े की राशि बढ़ा दें. उदाहरण के लिए पंजाब सरकार ने 2014-15 में RTE के तहत स्कूलों को प्रति गरीब बच्चा एडमिशन पर “केवल 1370/- रूपए प्रतिवर्ष” का अनुदान (सब्सिडी) निश्चित की है, और यह राशि भी उस स्कूल को पता नहीं कब मिलेगी? अब सोच लीजिए कि कहाँ तो 1370/- रूपए और कहाँ सामान्य वर्ग के बच्चे की फीस लगभग 20,000/- रूपए सालाना. तो क्या भाजपा की राज्य सरकारें RTE में संशोधन करके उन 25% गरीब बच्चों की सब्सिडी प्रति बालक 20,000/- नहीं कर सकतीं? बिलकुल कर सकती हैं, लेकिन इसके लिए इच्छाशक्ति भी तो चाहिए. सबसे बड़ी बात तो यह है कि सबसे पहले भाजपा की राज्य सरकारें और ऊपर बैठे “कथित थिंक टैंक” यह तो मानें कि RTE क़ानून वास्तव में “हिन्दू शिक्षण संस्थाओं” पर एक जज़िया समान है, इन्हें बंद करने अथवा इन्हें लूटने का षड्यंत्र हैं और मिशनरी-मदरसों को इस क़ानून से छूट देना एक साज़िश का हिस्सा है.

काश मानव संसाधन मंत्रालय की नींद टूटे... काश भाजपा शासित राज्य सरकारों की RTE के बारे में समझ बढे... काश कि कोई सरकार “वास्तव” में हिन्दुओं के बारे में सोचे...

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