राममंदिर और गंगा नदी पर सुप्रीम कोर्ट :- सुझाव या शरारत

Written by बुधवार, 22 मार्च 2017 14:27

आपने सुना होगा उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने गंगा एवं यमुना नदियों को "जीवित अस्तित्व" अर्थात् "व्यक्ति" का स्थान दिया है. इसका अर्थ है अब नदियों के "मानवाधिकार" होंगे. नदियों को किसी प्रकार की क्षति पहुँचाना, प्रदूषण करना अब भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत एक दण्डनीय अपराध माना जाएगा.

अधिकांश हिन्दू राष्ट्रवादी यह मानते हुए कि अब नदियों में प्रदूषण के विरुद्ध ठोस कार्रवाई सम्भव हो सकेगी, इस निर्णय की प्रशंसा कर रहे होंगे, करनी भी चाहिए क्योंकि नदियों एवं  पर्यावरण के संरक्षण में यह एक ठोस ऐतिहासिक निर्णय भी माना जाएगा. किन्तु शीघ्रता मत कीजिए, न्यायाधीशों का उद्देश्य अथवा विचार कुछ भी रहे हों पर विचार कीजिए, यह निर्णय 20 मार्च को दिया गया... नोट कीजिए 20 मार्च.

क्या आपने एक अन्य समाचार सुना था कि एक छोटे से राष्ट्र न्यूज़ीलैण्ड जो कि एक हिन्दू राष्ट्र नहीं है, साम्प्रदायिक भी नहीं है उस राष्ट्र के द्वारा वहाँ की एक नदी "व्हाँगानुई" को विधिक रूप से एक "व्यक्ति" का स्थान दिया. ध्यान देने योग्य है कि उस नदी के आसपास के क्षेत्र में बसने वाली एक जनजाति "माओरी" जिनके लिए इस नदी का आध्यातमिक महत्त्व है, के 160 वर्ष के लम्बे संघर्ष के बाद न्यूज़ीलैण्ड सरकार अथवा न्यायालय द्वारा यह नदी को यह सम्मान तथा अधिकार दिया गया. उनके अनुसार नदी के स्वास्थ्य का उन लोगों के स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है. अब नोट कीजिए कि न्यूज़ीलैण्ड द्वारा इस निर्णय का समाचार 16 मार्च को BBC द्वारा प्रकाशित हुआ जो भारत के किसी मीडिया संस्थान ने प्रकाशित नहीं किया होगा... तारीख ध्यान दीजिए, 16 मार्च. अब उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय द्वारा न्यूज़ीलैण्ड का अनुसरण करते हुए ठीक ऐसा ही निर्णय दे दिया गया 20 मार्च को, यानी केवल 4 दिन बाद... गंगा एवं यमुना नदियों को "जीवित अस्तित्व" अर्थात् "व्यक्ति" का स्थान दिया. आप पूछेंगे, इसमें बुरा क्या है?

शताब्दियों की पराधीनता के बाद हमारी परम्परा बन गई है, कि जब तक किसी  तकनीक, सिद्धान्त, विचारधारा अथवा धारणा को विदेशी लोग स्थापित न कर दें हम उसे "मान्यता" ही नहीं देते बल्कि उसका उपहास करते हैं. क्या उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के लिए यह एक लज्जा की स्थिति बन गई थी, जब एक छोटे से राष्ट्र न्यूज़ीलैण्ड जो कि एक हिन्दू राष्ट्र नहीं है, साम्प्रदायिक भी नहीं है उस राष्ट्र ने एक नदी को व्यक्ति का दर्जा दे दिया? और BBC द्वारा समाचार प्रकाशित हो गया. क्या उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की विवशता थी, कि जिस सनातन राष्ट्र भारत में आध्यात्मिक दृष्टि से नदियों को मात्र "व्यक्ति" नहीं बल्कि "माँ" का स्थान प्राप्त है, "देवी" का स्थान प्राप्त है, जिनकी "आरती" की जाती है, उस राष्ट्र की नदियाँ विधिक रूप से व्यक्ति का स्थान पाने वाली विश्व की पहली नदी नहीं बन सकी? "विश्वगुरु भारत" ने एक छोटे से राष्ट्र जो सनातनी भी नहीं है, उसकी "नक़ल" करते हुए नदी को "व्यक्ति" का स्थान दिया. माननीय न्यायाधीश ने आज से पहले भारत की किसी नदी को "व्यक्ति" घोषित क्यों नहीं किया?? अचानक न्यूजीलैंड की खबर से वे जागृत हुए? 

इस मूल प्रश्न के अलावा अभी और बहुत से प्रश्न प्रस्तुत हैं :- जैसे यदि हम गंगा को माँ, देवी या पूजनीय नहीं मानकर एक व्यक्ति मानें... तो 

1. एक व्यक्ति तो भिक्षुक भी हो सकता है, चोर, लुटेरा, डकैत, हत्यारा, बलात्कारी, जिहादी भी हो सकता है... क्या एक नदी ऐसी हो सकती है?

2. एक व्यक्ति अधिवक्ता भी हो सकता है, न्यायाधीश भी हो सकता है... क्या एक नदी ऐसी हो सकती है?

3. एक व्यक्ति मोहग्रस्त हो सकता है, पक्षपात कर सकता है... क्या एक नदी ऐसा कर सकती है? कल्याणकारी हो तो भी और बाढ़ के समय विनाशकारी हो तो भी, क्या नदी मोह अथवा भेदभाव रखती है?

4. एक व्यक्ति किसी जाति से सम्बन्धित हो सकता है... क्या नदी की कोई जाति हो सकती है?

5. एक व्यक्ति की आयु कितनी हो सकती है, 70-100 वर्ष?.... क्या एक नदी का जीवनकाल इतना ही होता है?

6. एक व्यक्ति आपको कितनी बिजली का उत्पादन देता है... नदियों पर बाँध बनाकर कितनी बिजली बना रहे हैं?

7. एक व्यक्ति कितना कल्याणकारी हो सकता है और कितने समय तक... नदियाँ कितने हजारों वर्षों से मानव समुदाय को पोषित कर रही हैं? क्या नदी एक व्यक्ति के "समतुल्य" हो सकती है?

8. उत्तर भारत की 40% जनसंख्या एक नदी गंगा पर निर्भर है... यह एक व्यक्ति के "समतुल्य" है?

9. नदियों के बिना जीवन सम्भव है? नहीं... तो क्या नदी एक व्यक्ति के "समतुल्य" है?

10. भौतिक संसाधनों की पूर्त्ति तो एक तरफ, धारणा है कि "गंगा मैया" पाप की वृत्ति को कम करती है.. विचारों को ही पावन कर देती है... क्या यह एक व्यक्ति के "समतुल्य" हो सकता है?

अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं विचारणीय - यदि एक नदी को एक व्यक्ति के "समतुल्य" ही माना जाए तो, जिस प्रकार एक व्यक्ति द्वारा क्षति पहुँचाने की स्थिति में उस पर अभियोग चलाया जा सकता है तो फिर नदी में बाढ़ की स्थिति में जैसा कि 2013 में आपदा के समय हुआ, नदी पर भी अभियोग चला दिया जाएगा? जबकि बाढ़, तूफान, भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदाएँ हैं. एक नदी, एक माँ, एक देवता को "व्यक्ति" का स्थान देना, और वह भी विशेषत: राज्यों में चुनाव के बाद हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार शपथ ग्रहण के तुरन्त बाद, कुछ संदिग्ध प्रतीत होता है. कल हो सकता है आप पृथ्वी को भी "व्यक्ति" का स्थान देंगे? वायु को "व्यक्ति" का स्थान देंगे? सूर्य को "व्यक्ति" का स्थान देंगे? सनातन धर्म में इन्हें युगों युगों से देवताओं का स्थान प्राप्त हैं. यहाँ पीपल, वटवृक्ष, तुलसी, जल, पवन, आकाश, सूर्य आदि सबको देवताओं का स्थान प्राप्त है. इनके बिना जीवन सम्भव नहीं है. इन्हें व्यक्ति का स्थान देकर कौन सी बुद्धिमत्ता है, कौन सा उपकार है और किस पर उपकार है? यदि करना ही है तो गंगा-यमुना-नर्मदा नदी को "देवी" घोषित किया जाना चाहिए था, और उस देवी को अपवित्र करने वालों को भारी दण्ड का प्रावधान होना चाहिए था. केवल "व्यक्ति" घोषित करके वाहवाही लूटने से किसी का फायदा नहीं हुआ. बस न्यूजीलैंड की भौंडी नक़ल भर हो गई. 

अब एक और परिदृश्य:

उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय के अगले ही दिन 21 मार्च को, सर्वोच्च न्यायपालिका द्वारा सुझाव दिया गया है कि "राम मन्दिर जन्म भूमि" के मामले में परस्पर समाधान कर लिया जाए". इस निर्णय पर प्रश्न तो अनेकों प्रस्तुत किए जा सकते हैं, किन्तु लेख के आकार की सीमा को देखते हुए यथा सम्भव संक्षिप्त ही रखा जाएगा॥ इस विषय पर चर्चा आगे बढ़ाने से पूर्व एक महत्त्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देना चाहिए :

ये दोनों निर्णय / सुझाव जाने-अनजाने उत्तराखण्ड और उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों के बाद, और इन राज्यों में "भाजपा सरकार" के चयनित होने तथा शपथ ग्रहण करने के तुरन्त बाद आए हैं... ऐसा क्यों? मात्र संयोग है या कुछ और?

Ram

यह तो हम सब जानते समझते हैं कि अब तक सेकुलर हिन्दू विरोधी सरकारों के दबाव के कारण न्यायपालिका निष्पक्ष निर्णय नहीं दे सकी. स्वतन्त्र भारत के इतिहास में पहली बार केन्द्र के साथ-साथ उत्तरप्रदेश में भी पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार सत्ता में आई है. स्वाभाविक है कि न्यायपालिका दबावमुक्त होकर निष्पक्ष निर्णय दे सकती है. फिर क्या कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा परस्पर समाधान का सुझाव दिया गया? यह कहते हुए कि यह एक संवेदनशील मामला है. विचार कीजिए, जब कभी भारत पाकिस्तान के विरुद्ध सशक्त कार्रवाई करने की स्थिति में होता है तैयारी में होता है, संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका आदि राष्ट्र भारत को सुझाव देने लगते हैं कि भारत पाकिस्तान के बीच समस्या का समाधान वार्त्ता से ही सम्भव है. क्या हमारा सर्वोच्च न्यायालय संयुक्त राष्ट्र या अमेरिका बनने का प्रयास कर रहा है? एक सीधे सरल मामले को यानी एक Open & Shut केस को उलझा हुआ बनाया जा रहा है, कश्मीर की तरह. क्या सर्वोच्च न्यायालय यह सिद्ध करना चाहता है कि वह इस "संवेदनशील बना दिए गए" मामले का न्यायोचित समाधान करने में अक्षम है?

यदि इस मामले का न्यायपालिका से बाहर परस्पर समाधान हो भी गया तो क्या होगा? लम्बे समय के लिए यह धारणा बन जाएगी कि न्यायपालिका में इच्छाशक्ति का अभाव था. न्यायपालिका न्याय करने में अक्षम थी, न्यायपालिका भयभीत थी, न्यायपालिका ने तुष्टिकरण की नीति अपनाई. न्यायपालिका ने एक सबल सक्षम प्रभावशाली निर्णय स्थापित करने की अपेक्षा उससे बच निकलने का मार्ग चुना. एक आतंकवादी के लिए रात दो बजे सुनवाई की जा सकती है? क्यों? यह संवेदनशील मामला नहीं था? क्या अच्छा नहीं होता कि राम-जन्म भूमि के मामले पर भी रातोंरात काम करके त्वरित सुनवाई करके निर्णय दिया जाता? यदि ऐसा होता तो क्या होता? समस्त भारत की वह जनता जो भारतमाता की जय, वन्देमातरम् गाने और राष्ट्रगान के समय पूर्ण निष्ठा के साथ सम्मान में खड़े होने में आस्था रखती है, उस जनता की न्यायपालिका में अभूतपूर्व सुदृढ़ आस्था का निर्माण होता. क्या न्यायपालिका यह नहीं चाहती, कि गणतन्त्र भारत में न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और उसके प्रति विश्वास में वृद्धि हो?

यह भी हम जानते हैं कि जो सेकुलर हिन्दूविरोधी देशद्रोही शक्तियाँ सत्ता से बाहर हुई हैं उनसे सहानुभूति रखने वाले तथा उनसे "उत्पन्न" तत्त्व न्यायपालिका में भी हैं. ऐसे तत्त्व नहीं चाहेंगे कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और उसके प्रति विश्वास में वृद्धि हो. हो सकता है हमारा दृष्टिकोण गलत हो, और अच्छा होगा यदि गलत सिद्ध हो. विचार कीजिए, चोर, लुटेरों, डकैतों, बलात्कारियों, जिहादियों के साथ समझौता क्यों? किसलिए? जब भारत स्वतन्त्र हुआ था तो विभाजन भी हुआ था. विभाजन के बाद भी मुसलमानों को भारत के हृदय में स्थान दिया गया इसका सीधा अभिप्राय यही है कि भारत में उस समय जो मस्जिदें थी, भारत उनका अधिकार दे या न दे, यह भारत की इच्छा है. भविष्य में किसी मस्जिद या मदरसे के निर्माण की अनुमति देना न देना भारत की इच्छा पर निर्भर करता है. परस्पर समाधान यदि होता भी है तो, बाबरी मस्जिद के गिराने के बाद मुम्बई बम धमाके में जो हत्याएँ हुई उनकी क्षतिपूर्त्ति भी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए. मुम्बई बम धमाकों के सभी आरोपी, दाऊद इब्राहिम सहित, न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना भी अनिवार्य होना चाहिए.

राम-जन्म भूमि का मामला केवल भूमि का सम्पत्ति का मामला नहीं है. सम्बन्धों का मामला नहीं है. फिर परस्पर समाधान का प्रश्न ही कहाँ है? बल्कि बार-बार "परस्पर समाधान के सुझाव" केवल न्यायपालिका को निर्बल सिद्ध करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है. दो टुकड़े करके पाकिस्तान देते हुए एक बार पहले ही "फुल एंड फाईनल समझौता" किया जा चुका है, लेकिन सामने वाली पार्टी समझौता तोड़कर कश्मीर-बंगाल पर अपनी नज़रें गड़ाए बैठी है, तो क्या गारंटी है कि ये समझौता भी कायम रहेगा?? जबकि मूल प्रश्न तो शुरू से यही है कि राम पहले आए थे कि बाबर? मीर बाकी ने मंदिर तोड़कर वहाँ अतिक्रमण किया था कि नहीं? फिर इसमें समझौते का सवाल ही कहाँ है, सीधी सी बात ये है कि "बाहरी आक्रान्ताओं" का अतिक्रमण हटाया जाए. 

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