पुलिस क़ानून सुधार :- सरकार, समय निकला जा रहा है

Written by शनिवार, 21 अक्टूबर 2017 19:56

दीपावली के दिन मैंने एक फेसबुक पोस्ट की थी, जिसमें मैंने उस त्यौहार के दौरान अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे, विभिन्न चौराहों पर खड़े पुलिसकर्मियों को दीपावली की बधाई प्रेषित की थी.

अधिकाँश पाठकों का यह मत रहा कि वास्तव में भारत के राज्यों की पुलिस फ़ोर्स के कार्य दिवस, उनकी कार्य करने की परिस्थितियों, उनके मानसिक तनाव, उनके सीमित संसाधन, उनकी वेतन विसंगतियाँ तथा पुलिसवालों की घटती फिटनेस को लेकर “तत्काल” कुछ किया जाना बेहद जरूरी हो गया है. 

उसी फेसबुक पोस्ट को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए इस लेख में कुछ आँकड़ों एवं तथ्यों को खंगालने का प्रयास किया है, ताकि स्थिति की गंभीरता को समझा जा सके एवं सरकारों से आग्रह किया जा सके कि अब समय निकलता जा रहा है.... पानी सिर के ऊपर आने लगा है.... जल्दी से जल्दी पुलिस सुधार क़ानून लाया जाए ताकि देश भर के पुलिसकर्मियों को कुछ राहत मिल सके.

आज की तारीख में पूरे भारत में आधिकारिक रूप से लगभग ग्यारह लाख पुलिसकर्मी नौकरी पर हैं, जबकि इस पूरी संख्या का लगभग एक चौथाई अर्थात तीन लाख पद खाली पड़े हैं. सोचिये, देश के गंभीर हालातों, नित नए होने वाले विवादों, बढ़ते अपराधों के बावजूद तीन लाख पुलिसकर्मियों की कमी से क़ानून-व्यवस्था का क्या हाल होता होगा. अभी-अभी टीवी पर एक विज्ञापन आने लगा है, जिसमें एक पुलिस वाले को लेकर एक व्यक्ति के मन में उसकी छवि को दर्शाया गया है. परन्तु सोचने वाली बात यह है कि आखिर पुलिस की ऐसी नकारात्मक छवि क्यों बनी?? ऐसा क्यों है कि आज भी भारत की जनता पुलिस थाने में जाने से डरती है?? निम्न एवं मध्यमवर्गीय लोग पुलिस से इतना घबराते क्यों हैं?? पुलिस के प्रति जनता के मन में विश्वास जगाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर है अंग्रेजों के जमाने से लगातार जारी पुलिस क़ानून में बदलाव.

असल में अंग्रेज हमें स्वतंत्रता तो देकर चले गए, लेकिन हमने उनका बनाया हुआ संविधान “कॉपी-पेस्ट” करके लगभग हू-ब-हू लागू कर दिया. अंग्रेजों के जमाने के विभिन्न क़ानून आज भी उसी अवस्था में जारी हैं. जैसा कि सभी जानते हैं, पुलिस व्यवस्था अंगरेजी राज को मजबूत करने का उपक्रम थी, जिसमें “भारतीयों” के प्रति पुलिस की सोच एवं उसके प्रशिक्षण का हिस्सा अंग्रेजों की मर्जी के हिसाब से तय किया गया था. दूसरी गलती हमने यह की, कि स्वतंत्रता के पश्चात पुलिस बल को संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार “राज्य का विषय” बना दिया, जबकि सभी प्रकार पुलिस, अर्धसैनिक एवं सैन्य बल केंद्र के अधीन होने चाहिए थे. पुलिस और क़ानून-व्यवस्था “राज्यों का मामला” होने के कारण कई विसंगतियाँ पैदा हुईं और राज्यों की सरकारों ने अपने-अपने राजनैतिक एजेंडे एवं चरम भ्रष्टाचार की आदत व नीयत के चलते पुलिस बल का लगातार क्षरण किया. राज्यों ने अपने मनमाने तरीके पुलिस पर थोपे, विभिन्न प्रयोग किये, पुलिस को मानवीय एवं मददगार बनाने की बजाय इसे अपने विरोधियों की जासूसी करने अथवा जनता का दमन करने हेतु उपयोग किया (बिलकुल अंग्रेजों की तरह).

ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च के अनुसार इस समय भारत में 15,268 पुलिस थाने हैं. इन पुलिस थानों की प्रशासनिक व्यवस्था सर्कल, उप-सर्कल, जिला, रेंज एवं ज़ोन के आधार पर विकेन्द्रित की गयी है. कुछ प्रमुख महानगरों में “पुलिस कमिश्नर” की भी व्यवस्था है. पुलिस की रैंक DGP (डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस) से लेकर SP (पुलिस अधीक्षक) से होते हुए हवलदार तक बंटी हुई है. इसमें भी IPS/IAS की परीक्षा पास करके अधिकारी बने पुलिस की संख्या भी काफी तादाद में है. उल्लेखनीय है कि पुलिस अफसर सामान्यतः धरातल पर सीधे जनता के संपर्क में नहीं आते हैं. उनका काम नीतियाँ बनाना, लागू करवाना एवं पुलिस बल का मनोबल बढाए रखने का होता है. रोज़मर्रा के जीवन में एक हवलदार या सब-इन्स्पेक्टर ही जनता के सीधे संपर्क में आता है, और वास्तव में जनता के मन में इन्हीं लोगों की छवि सबसे खराब है, जिसका प्रमुख कारण दुष्प्रचार और हिन्दी फ़िल्में भी हैं. वस्तुतः आज की तारीख में तीन लाख पुलिस के पदों के खाली रहने के कारण, एक लाख भारतीयों की जनसँख्या पर केवल 200 पुलिसकर्मी का अनुपात चल रहा है, और यह भी अलग-अलग राज्यों में कम-ज्यादा है. उदाहरणार्थ सबसे खराब स्थिति बिहार की है जहां एक लाख बिहारियों पर मात्र 76 पुलिसकर्मी हैं, जबकि दिल्ली (चूंकि राष्ट्रीय राजधानी है) में एक लाख निवासियों पर 700 पुलिसकर्मी हैं (अर्थात बिहार और दिल्ली के बीच पुलिस कर्मियों की नियुक्ति में लगभग दस गुना का अंतर है). अब आप खुद ही सोचिये कि एक लाख लोगों को कंट्रोल करने के लिए केवल 200 पुलिसकर्मी?? अब कैसे क़ानून-व्यवस्था बनेगी? इतने कम पुलिस वालों में अपराधों की विवेचना कैसे होगी?? इतने कम पुलिसबल में गुप्तचरों की व्यवस्था ठीक से कैसे चलेगी?? इतने कम पुलिस बल के रहते हुए दंगों जैसी आपातकालीन व्यवस्था को नियंत्रित कैसे किया जाएगा?? इतने कम पुलिस वालों के रहते इन हवलदारों को अपने परिवार के साथ समय बिताने, छुट्टी लेने की समस्या पर विचार कैसे होगा?? पुलिसबल की कमी के कारण न्यायालयीन प्रक्रिया को चलताऊ ढंग से लेने के कारण संदेह का लाभ पाकर अपराधी क़ानून के चंगुल से निकले जा रहे हैं, उसका दोषी कौन है?? ऐसे कई चुभते हुए सवाल हैं... लेकिन दिक्कत यह है कि किसी भी सरकार ने इस समस्या की तरफ गंभीरता से ध्यान दिया ही नहीं है.

पुलिस की समस्याओं को लेकर समय-समय पर विभिन्न समितियां, आयोग और रिसर्च हुए, लेकिन उन सभी की रिपोर्ट आज भी ठन्डे बस्ते में पड़ी है. नतीजा वही ढाक के तीन पात.... पुलिस बल पर दबाव बढ़ता जा रहा है और व्यवस्था चरमराने लगी है. सन 1861 का पुलिस एक्ट आज भी लागू है, यह कितने आश्चर्य और शर्म की बात है. हाल ही में किए गए एक व्यापक सर्वे के अनुसार सामान्य पुलिसकर्मियों में रक्तचाप, ह्रदय संबंधी बीमारियाँ, लगातार खड़े रहने से पैरों की समस्याएँ, छुट्टी नहीं मिलने से होने वाला मानसिक तनाव तथा शरीर पर ध्यान देने के लिए समय नहीं मिलने से मोटापा जैसी बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं. पुलिस की दूसरी सबसे बड़ी समस्या उसका “राजनीतिकरण” है. जैसा कि ऊपर बताया, राज्यों के अधिकार क्षेत्र में होने के कारण पुलिसबलों का दुरुपयोग ज्यादा हुआ है. “अब तक छप्पन” अथवा अर्धसत्य” जैसी फिल्मों में इस सड़ांध को अच्छे से उजागर किया गया है. पुलिस सुधार को लेकर बने दूसरे कमीशन की अनुशंसाओं के मुताबिक़ अपराधों की जाँच करने वाला तथा रोज़मर्रा के क़ानून-व्यवस्था को बनाए रखने वाला... ये दोनों पुलिस बल अलग-अलग होने चाहिए. जबकि वास्तव में अभी हो ये रहा है कि एक ही पुलिस वाला अपने साहब की सब्जी लेने भी जा रहा है, वही पुलिसवाला किसी हत्या का विवेचन भी कर रहा है, वही पुलिसवाला शाम को किसी बार पर छापे की टीम में शामिल है, वही पुलिसवाला अगली सुबह न्यायालय के कागज़ अपने झोले में उठाए घूम रहा है... इसका कारण एकमात्र वही है “पुलिसबल में कमी”. देश भर में कम से कम तीन लाख पुलिसकर्मियों की तत्काल नियुक्ति समय की माँग है, ताकि काम का दबाव घटे. निचले स्तर के पुलिसबल का वेतनमान भी सम्मानित बनाया जाना चाहिए. काम के घंटों और तनाव में कमी तभी आएगी, जब नई नियुक्तियाँ होंगी.

अंत में सारा मामला घूम-फिरकर पैसों पर आ जाता है. तीन लाख पुलिसबल की नई नियुक्ति को वित्त मंत्रालय अपनी स्वीकृति नहीं देता. राज्यों के भी अपने-अपने राजनैतिक स्वार्थ होते हैं. संसद एकमत हो नहीं पाती है.... नतीजतन वही का वही चरमराता हुआ ढाँचा बना हुआ है, जो किसी भी वक्त ढह सकता है. हम आए दिन देख ही रहे हैं कि जनता के मन में बढ़ता आक्रोश, राजनीति करने वालों के मुद्दों, बढ़ता अपराधीकरण और तकनीकी धोखाधड़ी तथा पुलिसबल के प्रशिक्षण एवं उसकी फिटनेस में कमी के कारण कभी पुलिसकर्मी सरेआम पिटते हुए दिख रहे हैं, तो कभी रिश्वत लेते हुए कैमरों में कैद हो रहे हैं, तो कभी इन्हीं पुलिसवालों द्वारा आत्महत्याओं की ख़बरें भी आ रही हैं.... काम का दबाव बढ़ता ही जा रहा है, और इसमें कमी लाने अथवा सुधार करने के कोई प्रयास दिखाई नहीं दे रहे हैं. समय की माँग है कि अब पानी सिर के ऊपर निकल रहा है, जल्दी से जल्दी उस “प्राचीन” पुलिस एक्ट को बदलकर उसे जनता के सहयोगी के रूप में पेश करने तथा दैनंदिन क़ानून पालन करवाने वाले इस सबसे महत्त्वपूर्ण तबके को दबाव से राहत देना चाहिए. 

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