क्या हिंदूवादी संगठन इससे कुछ सीखेंगे?

Written by शुक्रवार, 03 फरवरी 2017 08:13

सभाओं का शौक बचपन से है, जाते रहता हूँ. हाल ही में एक बार पता चला इंद्रेश कुमार जी मुंबई आनेवाले थे, मैं भी गया सभा में. अब बात उन्होने क्या कहा उसकी नहीं, अलग है. भाषणों के बाद कुछ मुस्लिम प्रश्न पूछने के लिए खड़े हुए. बात यहाँ उनके प्रश्नों की करूंगा, हिंदुओं के लिए उसमें सीख है.

हमें भी यह सब करना चाहिए. ज़्यादातर प्रश्न, मांगे थी, जिसका कोई आश्चर्य नहीं, लेकिन युवा जो प्रश्न पूछ रहे थे वो विचारणीय थे । उनकी सोच और अभ्यास हिन्दुओं के लिए मार्गदर्शक होने चाहिए. उन सभी को यह जानना था कि सरकार मुसलमानों के लिए क्या कर रही है (मुसलमान देश के लिए क्या कर रहे हैं, ये सवाल पूछने की इजाजत शायद पवित्र किताब में नहीं है, उनको जो करना होता है वो सिर्फ इस्लाम के लिए) । खैर, जो भी सवाल पूछ रहे थे वे सभी अभ्यासपूर्ण थे, अगर कोई सरकारी योजना विचाराधीन है (घोषित नहीं) तो उसका भी उन्हें पता था, और उसे कैसे होना चाहिए उसके बारे में भी वे अपनी बातों को ले कर आग्रही थे. 

एक बात और थी कि वे चाहते थे कि इंद्रेश जी का मंच वेब साइट, पोर्टल आदि बनाएँ और उस पर ऐसी सारी जानकारियाँ नित्य अपडेट देते रहें ताकि मुसलमान वहाँ आते रहे और हो सकता है संघ और भाजप को लेकर उनकी भावना में बदलाव आए, क्योंकि यह जानकारी उनकी तरफ से दी जाएगी. हर आदमी यह बात को ज़ोर दे कर बता रहा था कि, ओवैसी तथा और मुस्लिम राजनैतिक पार्टियां ऐसी जानकारी मुहैया कराती है, मुसलमानों का मार्गदर्शन करती है, तो संघ और भाजपा  को भी ऐसे करना चाहिए. वे इस बात को ले कर भी स्पष्ट थे कि इस से मुसलमानों को रोजगार भी मिलेगा जिस की शुरुवात वेब साइट से ही हो जाएगी, क्योंकि वो भी किसी मुसलमान को ही डेवलप करनी चाहिए, जिसके लिए या तो वे खुद या उनके कोई रिश्तेदार या दोस्त उपलब्ध थे (हलाला का मौलाना खुद को ही पेश करता है टाइप). 

उनकी मांगें पूरी की गई या नहीं यह मुझे पता नहीं लेकिन उनका अभ्यास और आग्रह दोनों जोरदार था, और भी एक बात जो उन्होने बताई कि अन्य मुस्लिम नेता और पार्टियाँ ऐसी जानकारी के लिए वैबसाइटस चलाती हैं, जहां फॉर्म्स ऑनलाइन या डाउन लोड के लिए उपलब्ध हैं, ऑनलाइन हेल्प उपलब्ध है आदि. मतलब उसका खर्चा कोई तो उठाता ही है. नेता खुद तो चला नहीं सकते, तो कोई लड़के रोजगार भी पाते होंगे. सरकारी सहायता की जानकारी के लिए भी तो कोई जानकार लोग बैठाने होंगे, यह सब खर्चे के ही काम हैं. आम मुसलमान के लिए ये सेवाएँ मुफ्त की हैं, लेकिन आप को जानकर हैरानी होगी कि वो दूसरे मुसलमान के साथ मुफ्तखोर नहीं होता, वो केवल हिन्दू सरकार को लेकर मुफ्तखोरी अपना हक समझता है. आम मुसलमान जानता है कि इस सब के लिए पैसे लगते हैं, और अपनी हैसियत से जितना भी बन सके, देता है क्योंकि इस से कौम तरक्की करती है, इस्लाम मजबूत होता है.

मस्जिदें देखी हैं आप ने ? उनके लोकेशन ? इसके लिए टाउन प्लानिंग की जानकारी जरूरी होती है जगहों पर कब्जा जमाने में । आदमी लगाने पड़ते हैं, यह कोई गैबी इल्म वाला काम नहीं होता. सरकारी दफ्तर में काम करने करवाने के लिए किस से मिलना है यह लोकल मस्जिद का मुल्ला जानता है या फिर ऐसे लोगों को जानता है जो काम के लोगों के साथ उठना बैठना रखते हैं. पूरा विकसित चैनल, आम मुसलमान को भी उपलब्ध है. ऐसे सभी कामों के लिए पूर्णकालिक समर्पित लोगों की सेवाओं की जरूरत आम मुसलमान समझता है, और यह जानता और मानता भी है कि यह सब फ्री में नहीं होता. दूसरे मुसलमान से बिलकुल फ्री में लेना भी नहीं चाहता, क्योंकि वो अल्लाह के सामने दूसरे मुसलमान का कर्जदार न बने.

(नोट :- यहाँ जो भी लिखा है उसमें मुसलमान की जगह ईसाई कर दें, तब भी वह उतना ही सत्य है) 

क्या आप को अब भी रोना है कि सरकार में उनके काम होते हैं, हमारे नहीं होते ? उनके काम क्यूँ और कैसे होते हैं उसका संक्षेप में वर्णन दे दिया अब तक. आदमी लगाए जाते हैं और उनके पीछे खर्चा किया जाता है । अब यह बताएं, हिन्दू के बारे में ये सभी बातें कहाँ तक लागू दिखती हैं? कौन से हिन्दू वादी पक्ष ने लाभप्रद सरकारी योजनाओं का ब्योरा दिया अपने साइट पर?? या उसके लिए अलग से साइट चलायी? नेताओं के व्यक्तिगत महिमामंडन के पेज, पोर्टल साइट, सब मिलेंगे, लेकिन बाकी क्या है ? ऊपर जो भी बातें लिखी हैं, वहाँ मुसलमान की जगह हिन्दू पढ़िये, देखिये क्या उत्तर मिलता है - शायद सन्नाटे में घंटे की गूंज ही सुनाई देगी. 

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