मोदी सरकार ने “मनरेगा” भ्रष्टाचार की गर्दन कैसे दबोची?

Written by बुधवार, 22 मार्च 2017 08:15

जैसा कि सभी जानते हैं, UPA-2 सरकार की एक बहुचर्चित और “बहु-राजनैतिक” योजना है मनरेगा, अर्थात महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना. इस योजना में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बेरोजगार परिवारों, गरीबों, दलितों, आदिवासियों को वर्ष में कम से कम सौ दिन तक गारंटीशुदा रोजगार दिया जाता है.

यह योजना शुरू से ही “कांग्रेसियों की फितरत” के कारण न सिर्फ विवादों में रही, बल्कि इस योजना को एक “संगठीत लूट” के रूप में लिया गया. 2009 से 2014 तक प्रतिवर्ष इस योजना में लगातार बजट बढ़ाया जाता रहा, धन का आवंटन किया जाता रहा, लेकिन वास्तविकता यह थी खर्च किए गए पाँच रूपए में से गरीब मजदूर के पास केवल एक रुपया ही पहुँच पाता था. लगभग सभी राज्यों में नौकरशाही, नेता और ठेठ ग्रामीण स्तर के ठेकेदारों-सरपंचों ने एक विशाल “भ्रष्ट नेटवर्क” बना लिया था जिसके जरिये प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रूपए लूटे जा रहे थे.

2014 में मोदी सरकार ने आते ही सबसे पहले इसी योजना के “छेद” बंद करने का फैसला किया. हालाँकि संसद में मोदीजी ने इस योजना को सफ़ेद हाथी और बकवास करार दिया, लेकिन यह बात वे भी जानते थे कि मनरेगा के कारण ही दूरदराज इलाकों में दलितों, गरीबों और आदिवासियों को रोजगार मिलता है, इसलिए उन्होंने इस योजना को बंद करने की बजाय इसमें सुधार करने का निर्णय लिया. कांग्रेसी भ्रष्टाचार की सजा दलित, महिलाएं और मजदूर क्यों भुगतें? मोदी सरकार ने सबसे पहले 200 जिलों में मनरेगा के खर्च की योजना में 60:40 के (सामग्री : मजदूरी) अनुपात को 51:49 (सामग्री : मजदूरी) कर दिया. इससे यह हुआ कि सामग्री खरीदी में जो ठेकेदार और अफसर माल कमाते थे, उसमें थोड़ी सी कमी आई. मोदीजी ने दूसरा महत्त्वपूर्ण कदम यह उठाया कि मनरेगा का सारा भुगतान आधार कार्ड से जोड़ दिया, चाहे मजदूरों का हो या ठेकेदारों का हो. इससे यह हुआ कि लगभग एक वर्ष में ही यह पहचान हो गई कि वास्तव में पैसा कहाँ जा रहा है, किसके खाते में जा रहा है. जब मनरेगा में काम करने वाले गरीब को मजदूरी उसके बैंक खाते में मिलने लगी, तो भ्रष्टाचार थोड़ा सा और कम हुआ. करोड़ों गरीबों के “जनधन खाते” खुलवाने के पीछे का मूल रहस्य यही मनरेगा भ्रष्टाचार ही था. इन दोनों क़दमों से भ्रष्टाचार में थोड़ी कमी तो आई लेकिन अभी तीसरा जरूरी कदम बाकी था, जिसे चुपचाप परदे के पीछे से अंजाम दिया जा रहा था.

यह तीसरा जरूरी कदम यानी बैंक खातों तथा मनरेगा जॉब कार्ड का सत्यापन करना. विगत दो वर्षों में धीरे-धीरे विभिन्न एजेंसियों की रिपोर्ट लेकर तथा बैंक खातों व आधार कार्ड का मिलान करके मोदी सरकार ने पाया कि लगभग 87 लाख मनरेगा कार्ड फर्जी हैं. जरा सोचिये, 2009-2014 के बीच कितने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार चल रहा होगा, यानी एक तरफ तो इतने सारे नकली जॉब कार्ड जिनका भुगतान नियमित होता रहा, दूसरी तरफ निर्माण सामग्री में ठेकेदारों-अफसरों-कांग्रेसियों की मिलीभगत, तीसरी तरफ गरीब और दलित मजदूरों को नकद भुगतान करते समय दबंगई से उन्हें कम पैसा देना... मनरेगा भ्रष्टाचार का तीन-तरफ़ा अड्डा बन चुकी थी. पिछले दो साल में मोदी सरकार ने इन तीनों रास्तों पर अवरोध खड़े करने शुरू किए और आज की तारीख में मनरेगा का आधे से अधिक भ्रष्टाचार, ऑनलाइन आधार कार्ड वेरिफिकेशन, जनधन खाते, और योजना में मजदूरी अनुपात बढ़ाने के कारण ख़त्म करने में सफलता प्राप्त की है. 

MNREGA

लोकसभा में एक जवाब में केन्द्रीय मंत्री ने बताया है कि 2015-16 में लगभग 4.36 करोड़ गरीब परिवारों को मनरेगा योजना में सीधा लाभ मिला है. स्वाभाविक सी बात है कि मनरेगा योजना में सब कुछ “बुरा ही बुरा” नहीं है. NCAER द्वारा किए गए एक रिसर्च के अनुसार इसका एक अच्छा पहलू यह है कि, ग्रामीण इलाकों में आर्थिक निर्भरता बढ़ी है, सूदखोरों से दलितों को मुक्ति मिली है, बाल-मजदूरी में कमी आई है और ख़ास बात यह है कि मनरेगा तथा मध्यान्ह भोजन के “कॉम्बिनेशन” की वजह से दूरदराज के स्कूलों में मजदूरों-दलितों-आदिवासियों के बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है.

कांग्रेस मोदी सरकार से खासी नाराज है... प्रगतिशील बुद्धिजीवी भी चिल्लाते रहते हैं कि “मोदी सरकार कुछ काम नहीं करती”... NGO छाप गिरोह भी चीखते रहते हैं कि मोदीजी तानाशाह हैं... लेकिन इनका चीखना-चिल्लाना-चिढ़ना स्वाभाविक सी बात है, जब एक बड़े वर्ग के भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जाएगी, जब तथाकथित बुद्धिजीवियों के भरे और फूले हुए पेट पर लात मारी जाएगी... तो मोदी से जलन तो होगी ही. 87 लाख “नकली मजदूरों” का करोड़ों रुपया जेब में आना बंद हो जाएगा, तो राहुल गांधी अपनी फटी हुई जेब तो दिखाएँगे ही...

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