श्रील प्रभुपाद, भगवद्गीता और इस्कॉन की संघर्षमयी यात्रा

Written by सोमवार, 20 नवम्बर 2017 07:56

Journey of Srila Prabhupada, ISKCON and Bhagvad Gita 

श्रील प्रभुपाद (Srila Prabhupada) पिछली शताब्दी के उन मुट्ठी भर आध्यात्मिक संतों में से एक हैं, जिनका जीवन और कर्तृत्व आगे आने वाले युगों-युगों तक युवाओं को प्रेरणा देता रहेगा।

यह कहानी है अन्तर्राष्ट्रीय श्री कृष्ण भावनामृत संघ (ISKCON ) International society for krishna consciousness के संस्थापकाचार्य अभयचरणाविंद भक्ति वेदान्त स्वामी श्रील प्रभुपाद की, जिनके दिग्विजयी और अनुकरणीय कार्यों के विषय में अत्यल्प लोगों को ही जानकारी है।

वास्तव में श्रील प्रभुपाद,पूज्यपाद स्वामी विवेकानन्द के समकक्ष स्तर के आध्यात्मिक पुरोधा हैं। वैसे तो दो श्रेष्ठ संतो के मध्य उनके कार्यों के आधार पर तुलना करना उचित नहीं है, फिर भी यदि देखा जाए तो इन दोनों संतो ने अमेरिका में जाकर सनातन धर्म ध्वजा को ऊंचा उठाया है। अतः इन दोनों संतों के पाश्चात्य देशों में किए गए कार्यों तथा उनके महत्व के मध्य तुलनात्मक रूप से चर्चा तो की ही जा सकती है। जहाँ सन् १८९३ में स्वामी विवेकानन्द के अमेरिका के शिकागो में दिए चमत्कारिक भाषण को अत्यन्त प्रसिद्धि मिलने के बाद स्वामी विवेकानन्द भारतवर्ष के घर घर में चर्चित हुए. वहीं तुलनात्मक रूप से श्रील प्रभुपाद के द्वारा सन् १९६५ के बाद के वर्षों में अमेरिका व विश्व भर में किए गए अतिमहत्वपूर्ण कार्य को भारत में उतनी प्रसिद्धि नहीं मिल पाई। यद्यपि श्रील प्रभुपाद की ख्याति अमेरिका के साथ साथ सम्पूर्ण विश्व में हुई लेकिन भारत में उनके कार्य का महत्व अपेक्षाकृत चर्चा न पा सका। किंतु श्रील प्रभुपाद तो वीतरागी संन्यासी थे, उन्हें सांसारिक आसक्तियों से घृणा थी, एकमात्र श्रीकृष्ण को ही वह अपने व समस्त जगत के जीवन का आधार मानते थे। आज यह समय की माँग है कि इस आध्यात्मिक पुरोधा के अतिमानवीय कार्यों का विश्लेषण किया जाए।

भगवान श्रीकृष्ण की विशुद्ध प्रेमाभक्ति द्वारा कैसे इस जीवन को "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं" के इस रिटर्न टिकट वाले चक्र से मुक्त किया जाए यह शिक्षा श्रील प्रभुपाद ने सम्पूर्ण विश्व को प्रदान की। श्रील प्रभुपाद ने ७० वर्ष की वृद्धावस्था में उस कार्य को शून्य से प्रारंभ करने और सफलतापूर्वक पूर्ण करने का साहस दिखाया, जिसे कोई भी व्यक्ति अपनी युवावस्था में भी कर पाने का साहस नहीं रखता। पाश्चात्य देशों के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व में सनातन वैदिक धर्म को, हमारे अनुपम शास्त्रों श्रीमद्भगवद्गीता (Bhagvadgita), श्रीमद्भागवतम,चैतन्य चरितामृत, नारद भक्ति सूत्र आदि की ठोस दार्शनिकता पूर्ण भक्ति केन्द्रित विचारधारा के आधार पर सफलतापूर्वक खड़ा करना और हिंदुत्व को सम्पूर्ण जगत में सम्मान दिलाने का महती कार्य श्रील प्रभुपाद ने कर दिखाया।

श्रील प्रभुपाद का जन्म १ सितंबर १८९६ को कलकत्ता नगर के एक वैष्णव बंगाली व्यापारी परिवार में हुआ था। उनका सन्यासी जीवन से पूर्व का नाम श्री अभय चरण डे था। बचपन में घर में श्री जगन्नाथ भगवान की रथयात्रा निकालते निकालते श्री कृष्ण की शुद्ध प्रेमाभक्ति का अंकुर उनके हृदय में पल्लवित हो चुका था। विद्यार्थी जीवन में वह महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित हुए और उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दी गयी डिग्री भरे समारोह में फाड़ दी। स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढने के दौरान सन १९२२ में श्रील प्रभुपाद का एक मित्र जो गौड़ीय वैष्णव आध्यात्मिक गुरू भक्ति सिद्धांत सरस्वती का शिष्य था उन्हें जबरदस्ती उनसे मिलाने ले गया। इस प्रथम मुलाकात के पश्चात ही उनके अंदर प्रेरणा का अंकुर फूटा और उनका जीवन भक्ति के श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रवृत्त हो गया।

श्री भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर भी उस ऊर्जावान युवा अभयचरण डे से अत्यन्त प्रभावित हुए। उन्होंने उसे अंग्रेजी भाषा के माध्यम से कृष्णभक्ति का प्रचार करने का आदेश दिया। श्रील प्रभुपाद का विवाह १९१८ में २२वर्ष की अवस्था में ही हो चुका था। अब वह पूरी तरह से गृहस्थ जीवन में भी आ चुके थे, परन्तु उन्होंने गृहस्थ जीवन के प्रति कभी आसक्ति नहीं रखी। बाल बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा के अपने गृहस्थ जीवन संबंधित दायित्वों को उन्होंने अपना लौकिक कर्तव्य मानकर पूरा किया। अपना गृहस्थ जीवन तो उन्होंने इस प्रकार जिया मानो जैसे कमल पत्र में पानी की बूँद।

१९२२ के बाद के वर्षों में श्रील प्रभुपाद जी ने ग्रंथ शिरोमणि श्रीमद्भगवद्गीता पर एक टीका लिखी। जो आजकल श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ के नाम से जानी जाती है और संपूर्ण विश्व में सर्वाधिक विक्रय होने वाली पुस्तकों में से एक है। १९६५ के बाद से अब तक इसकी लगभग ६० करोड़ से ज्यादा प्रतियाँ बिक चुकी हैं। १९३३ में श्रील प्रभुपाद ने अपने गुरू से दीक्षा ग्रहण की। १९३६ में उनके गुरु श्री भक्ति सिद्धांत सरस्वती का निधन हो गया। निधन से पूर्व उन्होंने श्रील प्रभुपाद जी को पाश्चात्य देशों में श्री कृष्ण भक्ति के अनुपम संदेश का प्रचार-प्रसार करने का निर्देश दिया। श्री भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी एक ब्रह्मनिष्ठ संत थे। उन्हें आगामी भविष्य की होने वाली घटनाओं के विषय में  पहले ही ज्ञान हो चुका था ।

भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी जानते थे कि सैकड़ो बरस पहले भक्ति कालीन मध्ययुग में भगवान श्री कृष्ण के अवतार श्री चैतन्य महाप्रभु की इस भविष्यवाणी को श्रील प्रभुपाद जी के द्वारा पूर्ण किया जाएगा। जिसमें श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा था कि "पृथ्वी ते आछे यत नगर आदि ग्राम सर्वत्र प्रचार हईब मोर नाम" अर्थात एक दिन सम्पूर्ण विश्व के प्रत्येक नगर और ग्राम में मेरे द्वारा प्रतिपादित इस गौड़ीय वैष्णव नाम संकीर्तन पद्धति द्वारा भगवान श्री कृष्ण की इस अनुपम दिव्य प्रेमाभक्ति का प्रचार होगा. गौड़ीय वैष्णव मत के प्रवर्तक श्री चैतन्य महाप्रभु ने तत्कालीन मुस्लिम कालखण्ड में बड़ी कठिन परिस्थितियों में सनातन धर्म का पुनरूत्थान किया था। और उस समय चल रही धर्मांतरण की आँधी से सनातन धर्म की रक्षा की। श्री चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी को श्रील प्रभुपाद ने सच कर दिखाया। आज पाश्चात्य देशों के लोग अपने अपने आसुरी मतों का त्याग कर सनातन वैदिक धर्म के शुद्धाभक्ति पर आधारित गूढ दार्शनिक तत्वज्ञान को, बड़े ही सहज व सरल ढंग से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना के द्वारा प्राप्त कर रहे हैं।

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सन् १९३६ से १९४७ तक श्रील प्रभुपाद ने ब्रह्म मध्व गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के कार्यों में हाथ बँटाया और सन् १९४४ में उन्होंने गुरू के आदेशानुसार श्री चैतन्य महाप्रभु के संदेशों को अपनी अंग्रेजी पत्रिका Back to godhead "बैक टू गौडहैड" के द्वारा पूर्ण करने का संकल्प किया। इस पत्रिका को उन्होंने बिना किसी की सहायता के कितनी विषम परिस्थितियों में चलाया यह प्रसंग भी अपने आप में बड़ा मार्मिक है। श्रील प्रभुपाद बताते थे कि किस तरह वह "बैक टू गौडहैड" पत्रिका को चलाये रखने के लिए खुद ही पूरी रात-रात जगकर लिखा करते थे, पैसों के अभाव में टाइपिंग, प्रिंटिंग, प्रूफ रीडिंग आदि सभी कार्य उन्होंने स्वयं ही किया। पैदल मीलों चलकर प्रकाशक के पास जाते, इस पत्रिका की एक-एक प्रति पढ़ने हेतु मार्ग में खड़े लोगों से विनम्र आग्रह करते थे। एक बार पत्रिका वितरण के समय, सड़क किनारे एक बैल ने उन्हें घायल कर दिया। भूख कमजोरी के कारण श्रील प्रभुपाद मूर्छित हो गये थे, दूसरी घटना में एक बार उन्हें किसी कार वाले ने टक्कर मारकर घायल कर दिया। फिर एक भले व्यक्ति ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया। इतने कष्ट और विपत्तियों में भी अविचल रहते हुए उन्होंने इसकी एक एक प्रतियों को निःशुल्क बाँटकर भी पत्रिका को चलाये रखने का प्रयास किया था। १९४७ में कृष्णभक्ति की प्राचीन अनुपम धारा को पुनः ठोस आधार प्रदान करने और ब्रह्म मध्व गौड़ीय मठ के कार्यों में सहयोग एवं विशिष्ट योगदान देने हेतु गौड़ीय वैष्णव मठ ने उन्हें भक्ति वेदान्त की उपाधि से अलंकृत किया।

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक समृद्ध बिजनेसमैन अपना परिवार व्यापार सभी साधन सुविधायें छोड़कर इस तरह सड़क पर भटकते हुए, अपने गुरु के आदेशरूपी संकल्प को, क्षण प्रतिक्षण पूर्ण करने के लिए अपना जीवन ही इस भक्ति मार्ग की तप्त भट्टी में होम कर देगा? किंतु श्रील प्रभुपाद हमारे सामने एक प्रत्यक्ष उदाहरण है, यह उदाहरण है एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का, जो ईश्वर की कृपा पाने हेतु इस लौकिक जीवन के समस्त सुखों को तिरस्कृत कर दे। सन् १९५९ में श्रील प्रभुपाद ने गृहस्थाश्रम का पूर्ण त्याग कर नैष्ठिक संन्यासी के जीवन में प्रवेश किया। जहाँ उन्होंने श्री वृन्दावन धाम के मध्यकालीन राधा दामोदर मंदिर में श्री मद्भागवतम के तीन खण्डों की अंग्रेजी में टीका लिखी। किंतु उनके हृदय में गुरू द्वारा दिए गए आदेश की पूर्ति का संकल्प प्रतिक्षण स्मरण हो आता था। मथुरा के एक व्यापारी श्री अग्रवाल जी ने कुछ समय तक अमेरिका के पेंसिलवीनीया में अपने पुत्र के यहाँ ठहराने और वहाँ खर्चे की व्यवस्था का वचन दिया और अब उन्हें विदेश मंत्रालय से वीजा भी प्राप्त हो चुका था। इतना होने के बाद अब उन्हें एक टिकट की आवश्यकता थी। जबकि पास में एक धेला तक नहीं था। उनकी एक उद्योगपति भक्त श्रीमती सुमति मोरारजी अत्यन्त दयालु महिला थीं। श्रील प्रभुपाद को एकमात्र उनसे ही अमेरिका जाने हेतु मदद की उम्मीद थी। क्योंकि उन्होंने पूर्व में भी श्रील प्रभुपाद की श्रीमद्भागवतम के तीनों खण्ड के प्रकाशन में पर्याप्त धन देकर सहायता की थी। उनके कारोबारी शिप अक्सर अमेरिका जाते रहते थे।

श्रील प्रभुपाद ने उनसे अमेरिका जाने हेतु टिकट की जिद की। किंतु सुमति मोरारजी ने उन्हें उनकी आयु को देखते हुए मना कर दिया। किंतु तीसरी बार जब उन्होंने आग्रहपूर्वक जिद की, तो उन्हें उनके कारोबारी शिप में अमेरिका जाने की जगह मिल गई। ७० वर्ष की वृद्ध आयु में वह, गुरू द्वारा दशकों पहले दिये गए आदेश की पूर्ति का दृढ़ संकल्प हृदय में धारण कर १३ अगस्त १९६५ को कलकत्ता से मात्र सात डालर, कुछ बक्से पुस्तकें ,एक छतरी, अटैची और कुछ सूखी खाद्य सामग्री लेकर पाश्चात्य देश की इस कठिन यात्रा पर अकेला निकला था।  वर्ष १९६५ में यह वृद्ध सन्यासी श्रील प्रभुपाद "सिंधिया नेविगेशन कंपनी" के "जलदूत" नामक कारगो शिप के एकमात्र यात्री कम्पार्टमेंट में सामुद्रिक व्याधियों की असह्य पीड़ा भोग रहा था। उल्टी, चक्कर ,सरदर्द, अपच जैसी सामुद्रिक व्याधियों के बीच स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन खराब होता चला गया। यहाँ तक कि उन्हें दो दिन के भीतर दो हृदयाघात की असह्य पीड़ा से गुजरना पड़ा। जीवित रहने की आशा भी नही बची थी। किंतु रात्रि स्वप्न में उन्हें भगवान विष्णु के सभी अवतार, एक भीषण तूफान में फँसी नौका को बारी बारी से खेते दिखाई दिये, मानो यह मात्र एक स्वप्न ही नहीं ईश्वर से एक प्रत्यक्ष वार्तालाप था। कभी उन्हें भगवान कृष्ण अपनी अलौकिक छवि में नाव खेते नजर आये कभी नृसिंह भगवान अपने दिव्य मनोहारी स्वरूप में। सम्पूर्ण रात्रि उन्हें भगवान श्री हरि के विविध अवतारों ने स्वप्न में दर्शन दिए।

wallpaper iskcon radha krishna temple

उन्होंने देखा कि वह स्वयं, चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद,एवं अन्य वैष्णव संतों की दिव्य प्रतिमूर्ति के साथ हजारों की संख्या में गैरिक वस्त्र पहने सिर मुडाँये, वैष्णव तिलक लगाए हुए पाश्चात्य भक्तों के साथ ढोल, मृदंग, मँजीरे आदि बजाते हुए भगवान श्री कृष्ण के नाम संकीर्तन में आनंदित होकर नाच रहे हैं। यह आगामी भविष्य के घटनाक्रम का स्पष्ट चित्र उन्होंने देख लिया था। मानो भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कह रहे हों कि चिंता मत करो तुम जिस ध्येय और संकल्प को मन में रखकर इस सुदूर देश में गुरू के आदेशरूपी व्रत को लेकर, बिना साधन सामग्री के इस कार्य को पूर्ण करने निकले हो, यह कार्य शीघ्र ही फलीभूत होगा। प्रातः काल श्रील प्रभुपाद ने अपने स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक रूप से सुधार का अनुभव किया। भगवान श्री कृष्ण की अलौकिक अहैतुकी कृपा को प्रत्येक क्षण याद करते हुए उनकी आँखों से निरन्तर अश्रुपात होता रहा। उस दृढ़व्रती, कृष्ण की शुद्धाभक्ति में अहर्निश लीन संन्यासी की काँपती लड़खड़ाती जिह्वा पुनः भगवान चैतन्य महाप्रभु के बताये गये तारक महामंत्र का निरंतर उच्चारण करने लगी।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

लगातार पैंतीस दिन की कठिन यात्रा के पश्चात वह बोस्टन पहुँचे तत्पश्चात न्यूयार्क शहर में अपने गन्तव्य पर १७ सितंबर १९६५ में पहुँच गए। जहाँ दो महीने पेंसिलवीनीया में रहने के पश्चात वे न्यूयार्क में "लोअर ईस्ट साईड" नामक स्थान पर आ गए। वहीं न्यूयार्क में पार्क में जप करते हुए उन देवतुल्य संत की ईश्वरनिष्ठा को देखकर वहाँ के अमेरिकी युवा इतने प्रभावित हुए कि उनके शिष्य बन गए। श्रील प्रभुपाद के श्रीमद्भगवद्गीता और अन्य शास्त्र विषयक प्रवचन इतने प्रभावी थे कि उन्हें सुनकर पतित जीवन जी रहे हजारों अमेरिकी नागरिक सिर मुँडाकर गैरिक वस्त्र पहनकर शुद्ध वैष्णव बन गए। अब श्री चैतन्य महाप्रभु के द्वारा सैकड़ो वर्ष पूर्व की गई भविष्यवाणी, सत्य की कसौटी पर खरी उतर रही थी।

सन १९६६ में न्यूयार्क में श्रील प्रभुपाद जी ने ISKCON यानि अन्तर्राष्ट्रीय श्री कृष्ण भावनामृत संघ की स्थापना कर दी। सम्पूर्ण यूरोप के देशों में लोग भौतिकवादी जीवन के दुःखों से दुखी थे, श्रील प्रभुपाद ने उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से बताया कि कैसे भगवान श्रीकृष्ण की अनुपम भक्ति सिद्धांत द्वारा समस्त दुःखों से मुक्ति पायी जा सकती है। १९६८ में श्रील प्रभुपाद ने वर्जीनिया की पहाडियों में दो हजार एकड़ में नव वृन्दावन की स्थापना की। जिसके कृषि समुदाय से प्रभावित होकर उनके पाश्चात्य भक्तों ने अन्य स्थानों पर भी इसी प्रकार के कृषि समुदाय बनाये गये। सन् १९७२ में उन्होनें प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा की पुरातन वैदिक प्रणाली का पुनः सूत्रपात किया। उन्होंने टैक्सास के डल्लास में गुरूकुल की स्थापना की। सन् १९६६ से १९७७ तक श्रील प्रभुपाद ने सम्पूर्ण विश्व के छः महाद्वीपों के १४ चक्कर लगाकर श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रतिपादित इस अनुपम हरे कृष्ण आंदोलन को सफलतापूर्वक संचालित किया। मात्र दस वर्षों में ही श्रील प्रभुपाद ने पूरे विश्व में १०८ श्री कृष्ण राधिका के भव्य मंदिर बनवाये। करोड़ों लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के माध्यम से हिंदुत्व की पतित पावनी सरिता में डुबकी लगाकर पवित्र हो गए।

श्री कृष्ण भक्ति को संपूर्ण विश्व में प्रसारित प्रसारित करने हेतु श्रील प्रभुपाद ने अमेरिका में स्वयं का प्रकाशन कार्य प्रारंभ किया।उन्होंने आध्यात्मिक पुस्तकों के प्रकाशन हेतु भक्ति वेदान्त बुक ट्रस्ट की स्थापना की जो विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक पब्लिकेशन हाउस है। आज हमारी अनुपम ज्ञान संपदा विविध भाषाओं में छपी आध्यात्मिक पुस्तकों के द्वारा संपूर्ण विश्व भर में पहुँच रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रील प्रभुपाद ने सन्यासी जीवन अपनाने के बाद अपने घर व परिवार से संपर्क रखा ही नहीं क्योंकि अब सारी सृष्टि ही उनका अपना परिवार था। श्रील प्रभुपाद के चरित्र से प्रत्येक व्यक्ति प्रेरणा प्राप्त करता है। कैसे वृद्धावस्था में भी व्यक्ति अपने आत्मविश्वास और आत्मबल के द्वारा ऐसे असंभव व कठिन अतिमानवीय कार्य भी कर सकता है,जो कार्य व्यक्ति अपनी युवावस्था में भी करने से घबराता है।

श्रील प्रभुपाद के द्वारा पूरी दुनिया में स्थापित श्री कृष्ण के मन्दिर आज संपूर्ण विश्व के लोगों को श्री चैतन्य महाप्रभु के सैकड़ो वर्ष पूर्व दी गयी भविष्यवाणी के सच सिद्ध होने का स्पष्ट प्रमाण दे रहे हैं। आज पूरी दुनिया में इस्कॉन के ६०० से ज्यादा केंद्र हैं जो सनातन धर्म के ध्वजवाहक बनकर हमारे तत्वज्ञान के सर्वश्रेष्ठ होने का स्पष्ट प्रमाण दे रहे हैं। श्रील प्रभुपाद ने अपनी मृत्यु से पूर्व भविष्य में इस विश्वव्यापी संगठन की कमान अपने किसी परिवारजन को नहीं सौंपी। अमूमन देखा जाता है कि चाहे राजनीतिक दल हो या आध्यात्मिक अखाड़ा यहाँ नेता या गुरु जो भी प्रधान हो वह अपनी संतान पत्नी आदि को संगठन की पूरी कमान सौंप देता है। किंतु श्रील प्रभुपाद की यह महानता है कि उन्होंने सन् १९५५ में संन्यास लेने के बाद से घर की ओर मुड़कर भी नहीं देखा। यहाँ तक कि किसी भी प्रकार का संपर्क घर से नहीं रखा।

अपनी मृत्यु से पूर्व श्रील प्रभुपाद ने इस अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वृहद् संगठन को चलाने हेतु जीबीसी यानि गवर्निंग बाडी कमीशन नामक तन्त्र की संरचना की, जिसमें सभी देशों के सदस्य होते हैं। यह श्रील प्रभुपाद जैसे महान संत की दूरदृष्टि की ही सोच थी। १४ नवम्बर सन् १९७७ में भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की शताब्दियों पुरानी भविष्यवाणी को अक्षरशः सत्य सिद्ध करने वाले युगदृष्टा श्रील प्रभुपाद का शरीर श्री वृन्दावन धाम में पूर्ण तत्व में लीन हो गया। बहुत दुर्भाग्यजनक है कि बहुत से लोग चैतन्य महाप्रभु की नामकीर्तन परम्परा को आगे बढाने वाली इस संस्था को बदनाम करते हैं वह यह आरोप लगाते हैं कि इस्कॉन विदेशी संगठन है और यह विदेश पैसा भेजता है, जबकि यह बात सिरे से गलत है कि यह संगठन विदेशी है। यह संगठन अन्तर्राष्ट्रीय श्री कृष्ण भावनामृत संघ यानि ISKCON विश्वव्यापी संगठन है। केवल इसकी स्थापना न्यूयार्क में होने मात्र से ही यह विदेशी संगठन नहीं हो जाता।

जहाँ तक सवाल है विदेश धन भेजने का तो वह सिरे से ही गलत है। इस्कॉन का कोई भी मंदिर स्वयं में एक इकाई होती है जो केवल और केवल अपने सामाजिक कार्यों के अलावा मंदिर के ही कार्यों में पूरा धन खर्चता है। इस्कॉन बहुत से स्थानों पर सरकारी स्कूलों में मिड डे मील देकर मदद करता है। लगभग बारह लाख उच्च गुणवत्तापूर्ण मिड डे मील इस्कॉन बच्चों को बाँटता है। भारत में सनातन धर्म की बहुत सी विरोधी शक्तियाँ जो भारत में धर्मांतरण के सवाल पर चुप रहती हैं वह नहीं चाहतीं हैं कि इस्कॉन भारत में तथा विदेशों में अन्यान्य मत वालों को वैदिक धर्म की ओर लाए। किंतु विगत पचास वर्ष में श्रील प्रभुपाद के चमत्कारिक कार्यों द्वारा लाखों अन्यान्य मत पद्धति वाले विदेशी इस संस्था के माध्यम से लाभान्वित हुए हैं, और यह संस्था बहुत अच्छा कार्य कर रही है।

बहुत से लोग श्रील प्रभुपाद के जीवन के दौरान ही इस्कॉन के इन भव्य मंदिरों की उपादेयता पर सवाल उठाते रहे हैं। एक बार एक व्यक्ति ने श्रील प्रभुपाद को पूछा कि इतने सारे मंदिर पहले से ही मौजूद हैं फिर इतना पैसा खर्च करके नये मंदिर बनाने की क्या आवश्यकता? इन मंदिरों के स्थान पर हास्पिटल,पुस्तकालय या स्कूल बनाये जाए तो समाज को ज्यादा लाभ होगा। श्रील प्रभुपाद ने उससे प्रतिप्रश्न पूछा कि संसार में इतने अनाथ बच्चे और इतने अनाथालय हैं, आपने उन अनाथ बच्चों मे से ही किसी एक को गोद क्यों नहीं लिया ? आखिर आपने अपने स्वयं की संतान ही क्यों पैदा की? प्रश्न कर्ता निरूत्तर हो गया, तब श्रील प्रभुपाद ने उसे बताया कि हमारे ये मंदिर, स्कूल, पुस्तकालय या हास्पिटल ही नहीं हैं, अपितु उससे भी महत्वपूर्ण हैं। यदि इन मंदिरों का उद्देश्य केवल भगवान के विग्रह के आगे प्रणाम करना और घंटी बजाना होता तो इन मंदिरों का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता। हमारे इन मंदिरों में सूत्र बद्ध रीति से जीवन के अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न जैसे हम कौन है? ईश्वर क्या है? जीव क्या है? ब्रह्म क्या है? हम इस संसार में क्यों आए हैं? हमारे जीवन का क्या उद्देश्य है? ईश्वर को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? इस संसार में इतना दुःख क्यों है? इन सारे जटिल व आवश्यक प्रश्नों का उत्तर सूत्रबद्ध रीति से श्रीमद्भगवद्गीता और अन्य सनातन शास्त्रों के माध्यम से दिया जाता है।  श्रील प्रभुपाद यह भी बताते थे कि भौतिक रोगों से पीड़ित व्यक्ति तो समाज का इतना नुकसान नहीं करता है जितना मनः रोगों से पीड़ित व्यक्ति करता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर (ईर्ष्या) आदि मनः रोगों से पीड़ित व्यक्ति का उपचार ज्यादा आवश्यक है। इन इस्कॉन मंदिरों के माध्यम से हमारे भीतर स्थान बना चुके इन भव रोगों से मुक्ति का उपाय बताया जाता है। श्रेष्ठ और लोकोपकारी जीवन का पाठ इन पढाया जाता है। अतः यह मंदिर एक तरह से हास्पिटल और विद्यालय से भी ज्यादा उपयोगिता रखते हैं।

एक बार लंदन में प्रवचन हेतु गए श्रील प्रभुपाद को एक ब्रिटिश पत्रकार ने सवाल पूछा कि आप यहाँ क्यों आए हैं? श्रील प्रभुपाद जी ने उसे उत्तर दिया कि आप ब्रिटिश भारत में ढाई तीन सौ साल के राज में भारत से सब कुछ ले गए हीरा, मोती, सोना-चांदी, पत्थर, लोहा जवाहरात हर वस्तु आप भारत से दोहन कर के ले गए, केवल एक चीज आप वहाँ से ले जाना भूल गए थे। वही चीज आप को मैं खुद देने आया हूँ… पत्रकार चौंक गया और बोला कि क्या?? तब श्रील प्रभुपाद ने श्रीमद्भगवद्गीता निकाली और कहा कि आप भारत से इसे ले जाना भूल गए थे, अतः मैं स्वयं यह देने यहाँ तक आया हूँ। वास्तव में श्रील प्रभुपाद जी के माध्यम से श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ग्रंथ का और सनातन-धर्म का मान सारे विश्व मे बढा है।

श्रील प्रभुपाद का संपूर्ण जीवन त्याग, तपश्चर्या, पुरूषार्थ और अनन्य भक्ति का एक अनुपम उदाहरण है। अपनी ईश्वरनिष्ठा और भक्ति को आधार बनाकर श्रील प्रभुपाद ने सारे संसार को श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य संदेश देकर कृतार्थ कर दिया है।

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