इज़राईल की आज़ादी में भारतीय वीरों की भूमिका

Written by मंगलवार, 14 फरवरी 2017 17:33

22-23 सितम्बर 1918 को हाईफा का युद्ध मानव इतिहास के सबसे बड़े युद्धों में से एक है. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जोधपुर और मैसूर के महाराजाओं द्वारा भेजे गए भारतीय सैनिकों ने बड़ी संख्या में इजराईल (पश्चिम एशिया) में अपने जीवन का बलिदान दिया. भारतीय वीरों ने तुर्की, जर्मनी और ऑस्ट्रिया की संयुक्त सेनाओं को पराजित किया था

एवं सितम्बर 1918 में हाईफा के इजराईली बंदरगाह को मुक्त करवाया. उस समय इज़राईल फिलीस्तीन के रूप में जाना जाता था और उस इलाके में 1516 ईस्वी के बाद से 402 वर्ष तक तुर्की साम्राज्य का शासन था.

इस युद्ध के बाद भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के सैनिकों के साथ मिलकर पूरे इज़राईल को मुक्त करवाने के लिए कुछ और लड़ाईयाँ लड़ीं. 900 से अधिक साहसी भारतीय सैनिकों का इज़राईल के विभिन्न युद्धों में निधन हो गया, उनकी समाधियाँ आज भी वहाँ सरक्षित हैं और इज़राईल सरकार द्वारा उनके सम्मान स्वरूप उनकी देखभाल भी की जाती है. हर साल 23 सितम्बर को इज़राईल सरकार द्वारा इन भारतीय सैनिकों को उनके नाम सहित याद किया जाता है और वे स्कूल के पाठ्यक्रमों में शामिल किए गए हैं.

यह युद्ध कुछ उल्लेखनीय तथ्यों के कारण मानव इतिहास के सबसे बड़े युद्धों में याद किया जाता है. दुश्मनों में शामिल तुर्क, जर्मनी और ऑस्ट्रिया के सैनिक अपने क्षेत्र में तोप, बन्दूक, राईफल सहित एकदम सुरक्षित थे, जबकि दूसरी तरफ जोधपुर और मैसूर महाराजा के भेजे हुए सैनिक पैदल और घोड़ों पर सवार थे. उनके पास केवल तलवार और भाले थे. इतिहास में यह अंतिम घटना है जहाँ भाले और तलवारों वाले घुडसवारों ने तोपों- बंदूकों वाले सैनिकों से लड़ाई जीती हो.

विभिन्न विदेशी शासकों ने लगभग 2000 वर्ष तक इज़राईल पर शासन किया. मध्यकाल में इज़राईल 1516 ईस्वी के बाद से 400 वर्ष के लिए मुस्लिम तुर्की के अधीन था. 2000 वर्षों की लंबी अवधि के दौरान यहूदी दुर्व्यवहार और अमानवीय यातनाओं के शिकार हुए. उन्हें यूरोप के विभिन्न हिस्सों में गुलाम के रूप में पहुँचाया गया. जब यहूदियों ने यूरोप और अन्य स्थानों पर हाईफा की मुक्ति के बारे में सुना तो वे खुशी से झूम उठे और 1919 से हाईफा पहुंचना शुरू कर दिया. वे लोग इज़राईल में आकर बसने लगे, जबकि पश्चिम एशिया में प्रथम विश्व युद्ध चल ही रहा था. धीरे-धीरे यहूदियों की संख्या बढ़ती चली गई और अंततः 1948 में उन्होंने आधुनिक इज़राईल राज्य की स्थापना कर ली.

इज़राईल में इस समय लगभग 8000 भारतीय यहूदी रहते हैं, वे 1948 में आधुनिक इज़राईल बनने के बाद वहाँ चले गए थे. ये भारतीय यहूदी मुख्यतः दिमोना शहर में रहते हैं, जिसे वहाँ "मिनी इण्डिया" के नाम से भी जाना जाता है. 40,000 से अधिक इजराईली युवा अपनी सैन्य सेवाओं को समाप्त करने के बाद प्रतिवर्ष छुट्टी मनाने भारत जरूर आते हैं. कुल्लू घाटी में कई दुकानों, रेस्त्राँ और परिवहन साधनों पर हिब्रू भाषा के बोर्ड भी देखे जा सकते हैं. आज भारत इज़राईल का दूसरा सबसे बड़ा एशियाई आर्थिक भागीदार है. भारत इज़राईल के सैन्य उपकरणों का सबसे बड़ा ग्राहक भी है.

Read 2131 times