केरल का सैनिक मणिपुर में हीरो बना : कैसे और क्यों??

Written by मंगलवार, 11 अप्रैल 2017 18:10

भारतीय सैनिकों की वीरगाथाओं के किस्से तो समूचे विश्व में प्रसिद्ध हैं, लेकिन भारतीय सैनिक एक सनातन धर्म परंपरा के वाहक भी हैं, यह वे गाहे-बगाहे सिद्ध करते रहते हैं.

यह सनातन धर्म उन्हें युद्ध में वीरता और बलिदान के साथ-साथ मानवता, दया, करुणा और सहायता करने के लिए भी प्रेरित करता है. ऐसी ही एक अनोखी और ह्रदय गर्व से भरने वाली एक सच्ची घटना घटी केरल के कैप्टन दिवाकरण पिल्लै के साथ, जिसने उन्हें न केवल उनकी सेना यूनिट में, बल्कि समूचे मणिपुर में हीरो बना दिया.

दिवाकरण के पिताजी अर्थात मेजर एवीडी पिल्लै भी एक सैनिक परिवार से थे और उनके पिता भी सेना में अपनी सेवाएं दे चुके थे. उनके पिता को लगता था कि उनका बेटा दिवाकरण भी अपनी जान की बाज़ी लगाने में नहीं चूकेगा. इस परिवार में हथियारों से खेलना एक मुख्य शगल रहा है, फिर चाहे भारतीय सेना हो या फिर पूर्व में केरल राज्य, उनके परिवार ने मातृभूमि के लिए हमेशा ही सर्वोच्च बलिदान दिया है. पिल्लै, नायर नामक एक योद्धा प्रजाति से आते हैं और उनसे यही करने की उम्मीद भी की जाती है. एक बार अपने स्कूल के एक नाटक में 12 वर्षीय दिवाकरण को एक नागा योद्धा की भूमिका निभाने का मौक़ा मिला. जब वे स्टेज पर गए तो कहीं से कहीं तक ऐसा नहीं लग रहा था, कि वे कोई सशक्त भूमिका कर रहे हैं. मेजर पिल्लै का बेटा तो एकदम अलग दिख रहा था, न तो वह नागा ही था और न ही वह नायर लग रहा था, ना ही वह मंच पर शेर की तरह दहाड़ रहा था. जिस परिवार में किशोर होते बच्चों से हथियार पकड़ने की उम्मीद की जाती है, उस परिवार में मेजर पिल्लै का बेटा कहीं पीछे तो नहीं छूट रहा था, इसलिए उस छोटे बच्चे दिवाकरण को सजा के रूप में एक पूरी रात एक कब्रिस्तान में बितानी पड़ी.

इस बारे में बताते हुए कर्नल दिवाकरण कहते हैं, “उस रात तो समझो मैं मर ही गया था... डर के मारे मैं कब्रिस्तान में इधर-उधर घूमता रहा, लेकिन मैंने हार नहीं मानी और डरना बन्द कर दिया. जब सुबह मेजर पिल्लै अपने बेटे छोटे से दिवाकरण को लेने के लिए कब्रिस्तान आए, तो उस छोटे लड़के में अन्दर तक सब कुछ बदल चुका था, अब वह बोलते समय लोगों की आँखों में आँखें डालकर बात करता था.

1994 की बात है... मणिपुर और बाकी के उत्तरपूर्व राज्यों में हिंसक झड़पें होने लगी. उग्रवादी संगठन नैशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागालैंड (NSCN) ने मणिपुर और नागालैंड का सीमावर्ती क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था, और वे वसूली और धन उगाही का धंधा कर रहे थे. जब शान्ति के हर उपाय असफल हो गए, और कई उग्रवादी संगठन जमकर अपने पैर पसारने लगे तो भारत को अपना अंतिम कदम उठाना पड़ा. क्योंकि उग्रवादी न केवल स्थानीय लोगों को भारत के खिलाफ भड़का रहे थे बल्कि वे लोगों को डरा और धमका भी रहे थे. भारत ने अपने हथियार के रूप में सेना को वहां भेजा.

कर्नल दिवाकरन के पास पूरी सूचना थी कि विद्रोही सुरक्षा बलों की गतिविधि को रोकने के लिए पुल उड़ा सकते हैं. अपनी टुकड़ी के लिए उनके पास आदेश स्पष्ट थे, खोजो, लड़ो और ख़त्म करो. चार दिनों तक घने जंगलों में भटकने के बाद अंतत: पांचवे दिन सुदूर घने जंगलों में स्थित तमेंग्लांग जिले के लॉन्गदिपबर्म में विद्रोहियों के साथ उनकी मुठभेड़ हो गयी. विद्रोहियों ने गोलाबारी शुरू कर दी. हालांकि कर्नल पिल्लै ने उनकी इस हिंसा का उत्तर दिया, मगर विद्रोहियों को फायदा इसलिए हो रहा था, क्योंकि वे जहां से चाहें वहां से और जहाँ चाहें वहाँ गोली चला सकते थे, क्योंकि वे भारतीय सेना का ज्यादा से ज्यादा नुकसान करना चाहते थे. भारत की सेना को विद्रोहियों का सामना करने में यह ध्यान रखना होता है, कि आम लोग न मारे जाएं, यह बहुत ही खतरनाक स्थिति होती है.

कैप्टन पिल्लै एक झोपड़ी में गए जहां पर आतंकवादियों ने शरण ले रखी थी. जैसे ही उन्होंने उस झोपडी में कदम रखा, उनका स्वागत एके 47 की गोलियों ने किया जो उनकी कोहनी और बांह में लगी. एक और गोली उनकी छाती में लगी. लेकिन इस बीच आतंकवादी की एके 47 जाम हो गयी. उसके बाद उसने एक ग्रेनेड कैप्टन पिल्लै पर फेंका. खून से लथपथ और कमजोर कैप्टन पिल्लै ने वह ग्रेनेड तुरंत ही अपने पैर से दूर उछाल दिया. इससे उनकी टांग का मांस भी निकल गया. तभी एक और आतंकवादी ने उनके कंधे और रीढ़ की हड्डी पर वार किया और दोनों ही टूट गईं, जब कैप्टन पिल्लै खून से लथपथ पड़े हुए मृत्यु की तरफ बढ़ रहे थे... तभी एनकाउन्टर शुरू हो गया और कई विद्रोही मारे गए. आतंकवादी पूरे गाँव को आग की भेंट चढ़ाना चाहते थे, लेकिन कैप्टन पिल्लै की बहादुरी देखकर भाग खड़े हुए. इस आपसी युद्ध के बीच दो बच्चे भी गंभीर रूप से घायल हो गए थे. कैप्टन पिल्लै को हैलिकोप्टर में लादकर अस्पताल ले जाने लगे. मगर हर काम को एकदम अलग हटकर करने वाले कैप्टन पिल्लै ने हैलिकोप्टर में जाते-जाते दो आर्डर और दिए, पहला तो यह कहना था कि इस जगह से दोनों बच्चों को हटा दिया जाए और दूसरा उन्होंने कहा कि यदि उन्हें कुछ हो भी जाता है तो कोई शोक नहीं मनाएगा. इस साहसिक कार्य के लिए कैप्टन दिवाकरण पिल्लै को कृतज्ञ राष्ट्र की तरफ से शौर्य चक्र भी प्रदान किया गया.

इस घटना के लगभग पन्द्रह वर्षों बाद 2010 में अब कर्नल बन चुके दिवाकरण पिल्लै ने अपने मित्र स्थानीय ब्रिगेड कमांडर की सहायता से उस गाँव का पता किया, जहां पर यह मुठभेड़ हुई थी. सेना की पेट्रोलिंग से ही गाँव वालों को पता चला, कि उन्हें आतंकवादियों से बचाने वाला मसीहा जिंदा है. तो उन्होंने उनसे मिलने की इच्छा जताई. और इस प्रकार कर्नल पिल्लै मणिपुर में छोटे गाँव में मिलने गए. यहाँ उनका स्वागत न केवल एक हीरो की तरह किया गया, बल्कि उन्हें गाँव के बड़े बुज़ुर्ग की तरह माना गया. अपनी वीरता के चलते केरल के एक नागरिक को मणिपुर में अपना घर मिला. वह लड़की जिसके पेट में गोली लगी थी, अब वह दो बच्चों की माँ बन चुकी थी और इसी तरह वह छोटा बच्चा एक युवा बन चुका था.

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है... मणिपुर की इस पुनर्मिलन यात्रा में कर्नल पिल्लै को एक और जाना पहचाना चेहरा दिखाई दिया. वह आदमी उन्हीं आतंकवादियों में से एक था, जिसने उन पर आक्रमण किया था, और लगभग मार ही डाला था. कर्नल पिल्लै ने उसे बुलाया और गले लगाकर माफ कर दिया. जैसे ही यह खबर मीडिया में पहुँची, कर्नल पिल्लै एक नायक बन गए. वे एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे, जो देश के उस भाग को बाकी हिस्से से जोड़ सकता था. चूंकि अब “कर्नल” पिल्लै का संपर्क सरकार के मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों से था तो उन्होंने अपने प्रभाव का प्रयोग कर राज्य रक्षा मंत्री से 23 किलोमीटर लम्बी सड़क बनाने का अनुरोध किया जो लॉन्गदिपाबर्म को तमंगलॉन्ग जिला मुख्यालय से जोड़ सकती थी. सीमा सड़क संस्थान ने इस सड़क को बनाया मगर कर्नल पिल्लै यहीं नहीं रुके, उन्हें पता था कि यह सड़क कुछ ही दिनों में टूटने लगेगी, क्योंकि सड़क की मरम्मत का काम सीमा सड़क संस्थान का नहीं है. कर्नल पिल्लै थके नहीं और उन्होंने दिल्ली के हर दरवाजे को खटखटाया. अब तक दो बच्चों को बचाने के लिए अपनी जान खतरे में डालने वाले कर्नल की कहानियाँ मीडिया की भी जुबां पर चढ़ गईं थी. हालांकि कई लोगों ने दरवाजा बंद कर लिया मगर अच्छी बातें अच्छे लोगों के साथ हमेशा होती हैं.

7 अक्टूबर 2016 को कर्नल पिल्लै को वह खुशी मिली जिसके लिए वे दिल्ली में संघर्ष कर रहे थे. केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने 100 किलोमीटर लम्बा ऐसा राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने की अनुमति दे दी, जो तामेंगलोंग को पेरेन से जोड़ेगा और लॉन्गदिपर्बम नामक वह गाँव इस राजमार्ग में एक मुख्य बिंदु होगा.” आज़ादी के सत्तर सालों के बाद पूर्वोत्तर के उस गाँव में सड़क जाने वाली है, जिसके बारे में किसी ने सुना भी नहीं था और आज वह राष्ट्रीय राजमार्ग का हिस्सा बनने जा रहा था.

कर्नल दिवाकरण पिल्लै के तीन बेटे हैं, और तीनों ही स्कूल जाने वाले हैं. उनके नाम भी उन्हीं की तरह खास हैं, विक्रमादित्य, सिद्धार्थ और हर्षवर्धन. उन्होंने बताया कि उनके पिता ने उन्हें केरल की पुरानी मार्शल आर्ट युद्धकला कलारियापट्टू सिखाई है. छोटे हर्षवर्धन को अभी से यह पता है कि आतंकवादियों के उनके घर पर हमला करने की स्थिति में उसे क्या करना है. ये लड़के अपने पिता के सही निर्देशों के अंतर्गत अपना आकार ले रहे हैं. उनके पास ऐसा पिता है जिसने दो अनजान बच्चों को बचाने के लिए अपनी जान खतरे में डाल दी थी. उनके पिता को यह भी पता है, कि शक्ति क्षमा करने में भी है. उन्होंने अपनी छवि का इस्तेमाल अजनबी लोगों की मदद करने में किया. अनजानों के लिए अपनी जान कुर्बान करने की यह कहानी केवल कैप्टन दिवाकरन पिल्लै की नहीं है, यह कहानी है भारतीय सेना के हर सैनिक की. यह कहानी है भारतीय सेना के शौर्य और साहस की, जो कश्मीर में पत्थर भी खाती है और दिल्ली में बैठे कथित बुद्धिजीवियों की गाली भी. यह कहानी उसी सेना की है जिस पर हर आपदा में विश्वास किया जाता है, मगर मौक़ा मिलते ही उसे कोसा भी जाता है, मगर इस कहानी में जो ख़ास बात है वह है सेना का अपने कर्तव्य से न डिगना, और वह कर्त्तव्य है मानवता का कर्तव्य. अपनी जान पर खेलकर दूसरों की जान बचाने का कर्तव्य.

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(Hero Image courtesy: Major Gaurav Arya)

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