लोकसभा-विधानसभा के चुनाव एक साथ :- लाभ-हानि का गणित

Written by रविवार, 21 जनवरी 2018 21:04

भारत में क्या लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव (Parliament Elections in India) एक साथ होने चाहिए। इस सवाल को अब फिर से हवा मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में इस बात को और भी साफ़ कर दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि चुनावों को त्योहार खासकर होली की तरह होना चाहिए।

यानी आप उस दिन किसी पर रंग या कीचड़ फेंके और अगली बार तक के लिए भूल जाएं। देश हमेशा इलेक्शन मोड में रहता है। एक चुनाव खत्म होता है तो दूसरा शुरू हो जाता है। मेरा विचार है कि देश में एकसाथ यानी 5 साल में एक बार संसदीय, विधानसभा (Assembly Elections), सिविक और पंचायत चुनाव होने चाहिए। एक महीने में ही सारे चुनाव निपटा लिए जाएं। इससे पैसा, संसाधन, मैनपावर तो बचेगा ही, साथ ही सिक्युरिटी फोर्स, ब्यूरोक्रेसी और पॉलिटिकल मशीनरी को हर साल चुनाव के लिए 100-200 दिन के लिए इधर से उधर नहीं भेजना पड़ेगा। एक साथ चुनाव करा लिए जाते हैं तो देश एक बड़े बोझ से मुक्त हो जाएगा। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते तो ज्यादा से ज्यादा संसाधन और पैसा खर्च होता रहेगा। 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद देश में उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव हुए। 2018 में 8 राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं जबकि 2019 में लोकसभा इलेक्शन होने हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या आप एक साथ चुनाव कराने का लक्ष्य हासिल कर लेंगे, प्रधानमंत्री ने कहा कि ये किसी एक पार्टी या एक व्यक्ति का एजेंडा नहीं है। देश के फायदे के लिए सबको मिलकर काम करना होगा। इसके लिए चर्चा होनी चाहिए।

इससे पहले नीति आयोग में इस विषय को बढ़ा चुके है। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (Election Commission of India) पहले ही साफ़ कर चुके हैं कि चुनाव आयोग इसके लिए तैयार है बशर्ते राजनीतिक दलों में एक राय बन जाए। सवाल उठता है कि आखिर ये कॉन्सेप्ट कितना व्यावहारिक है। कहीं ये कोशिश संसदीय लोकतन्त्र के खिलाफ तो नहीं होगी, और क्या वाकई भारत की बहुदलीय प्रणाली में इस पर एक राय बन पाएगी। तर्क दिए जाते हैं कि ऐसा करने से चुनावों का खर्च आधा हो जाएगा। जो पहली नजर में ठीक लगता है मगर सवाल ये भी है कि अगर ऐसा किया गया तो इसके लिए संसाधन कहां से आएंगे। हालांकि देश में 1952 से 1967 तक एक साथ चुनाव हुए हैं लेकिन इसे इंदिरा गांधी सरकार ने भंग कर दिया। अब मोदी सरकार ने पहल की है कि फिर से राज्य और केंद्र के चुनाव 5 साल में एक बार, एक साथ कराएं जाए। तर्क है कि इससे देश का समय और पैसा बचेगा और सत्ता में राजनीतिक पार्टियां चुनावी मशीन की तरह काम नही करेंगी।

 

Parliament black white

 

प्रधानमंत्री शुरू से ही कहते रहे है कि अलग-अलग चुनाव से विकास थम जाता है। साथ ही आचार संहिता लागू होने से विकास पर असर होने की उम्मीद है। अलग-अलग चुनाव से ब्यूरोक्रेसी पर असर पड़ेगा और बार-बार चुनाव से लोकलुभावन नीतियों का दबाव होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक देश,एक चुनाव के विचार पर उसी समय से विपक्ष में दलीलें शुरु हुई है।विपक्ष का कहना है कि सभी चुनाव एक साथ कराना व्यावहारिक नहीं होगा। साथ ही एक साथ चुनाव के लिए सरकार के पास पर्याप्त मशीनरी नहीं है। विपक्ष ने यहां तक दलीलें दे दी है कि एक साथ चुनाव कराने में संवैधानिक दिक्कतों का भी सामना करना पड़ सकता है। संविधान में बड़े बदलाव करने होंगे। उत्तराखंड, अरुणाचल जैसे हालात होंगे तो क्या करेंगे। हालांकि स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों। लोकसभा, विधानसभा की 5 साल की तय अवधि हो। बीच में सदन भंग होने से सदस्य विकास कार्य नहीं कर पाते है। कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि एक साथ चुनाव से खर्च बचेगा और सामान्य जीवन में बाधाएं कम आएंगी। एक साथ चुनाव के लिए संविधान संशोधन करना पड़ेगा। जिसके चलते अनुच्छेद 83, 172, 85 और 174 में बदलाव करने होंगे। दूसरी तरफ एक देश,एक चुनाव पर कांग्रेस और सीपीआई ने प्रस्ताव की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इससे भारतीय लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है। टीएमसी ने प्रस्ताव पूरी तरह खारिज कर दिया है।

पिछले दिनों बीजेपी कार्यकारणी बैठक में एक देश, एक चुनाव पर सुझाव पेश किया गया था। पिछली बार भी बजट से पहले सर्वदलीय बैठक में भी पीएम ने इस पर सुझाव दिया था। 1967 तक लोकसभा, विधानसभा चुनाव साथ-साथ होते थे। कानून और कार्मिक मंत्रालय की स्टैंडिंग कमिटी ने सुझाव दिया था। जिस पर दिसंबर 2015 में रिपोर्ट संसद में पेश हुई थी। बीजेपी ने 2014 में अपने घोषणापत्र में एक साथ चुनाव का वादा किया। इससे पहले 2012 में लाल कृष्ण आडवाणी ने एक साथ चुनाव का सुझाव दिया था। चुनाव आयोग के अनुमान के मुताबिक लोकसभा, विधानसभा चुनावों पर करीब 4,500 करोड़ रुपये खर्च किए जाते है। 2014 लोकसभा चुनाव में करीब 30,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया है।

प्रारम्भ से ही प्रधानमंत्री की पहल

16वीं लोकसभा के चुनाव में जीत दर्ज़ करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी प्रक्रिया के समेकन की बहस प्रारंभ की थी। इसी राह पर कदम बढ़ाते हुए अब सरकार ने लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने की संभावनाओं को तलाशने का काम नीति आयोग को सौंपा है।चुनावी प्रक्रिया का समेकन एक गंभीर विषय है, जिसका संबंध समकालीन राजनीति से तो है ही, साथ ही देश की जीवंत संवैधानिक प्रक्रिया से भी है। क्या भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में एक साथ इतने बड़े पैमाने पर इन चुनावों को करवाया जा सकता है? इस राह में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है? विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं वाले देश में क्या यह योजना परवान चढ़ सकेगी?

देश में पहले भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए हैं। पहली चार लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव 1952, 1957, 1962 और 1967 में एक साथ हुए थे। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के अनुसार 1967 के बाद स्थिति ऐसी आई। चौथे आम चुनाव (1967) के बाद राज्यों में कांग्रेस के विकल्प के रूप में बनी संविद (संयुक्त विधायक दल) सरकारें जल्दी-जल्दी गिरने लगीं और 1971 तक आते-आते राज्यों में मध्यावधि चुनाव होने लगे। 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ और इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी, जबकि आम चुनाव एक वर्ष दूर था। इस प्रकार पहली बार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होने का सिलसिला पूर्णत: भंग हो गया।

जनवरी 2017 में ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का समर्थन करते हुए चुनाव आयोग से कहा था कि सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश करे, ताकि आम सहमति बनाई जा सके। बार-बार चुनाव कराने से सरकार का सामान्य कामकाज ठहर जाता है, क्योंकि चुनाव से पहले चुनावी आचार संहिता लागू हो जाती है। आज पूरे साल देश में कहीं-न-कहीं चुनाव होते रहते हैं और इसकी वज़ह से नियमित रूप से होने वाले काम ठप पड़ जाते हैं, क्योंकि वहाँ चुनाव की आचार संहिता लागू हो जाती है। इससे न केवल राज्य में काम रुकता है, बल्कि केंद्र सरकार का काम भी प्रभावित होता है।

दो चरणों में एक साथ कराए जाएँ चुनाव

नीति आयोग की मसौदा रिपोर्ट में राष्ट्रहित के मद्देनज़र 2024 से लोकसभा और विधानसभाओं के लिये एक साथ दो चरणों में चुनाव करवाने की बात कही गई है। पहला चरण 2019 में 17वें आम चुनाव के साथ तथा दूसरा 2021 में, 17वीं लोकसभा के मध्य में कुछ विधानसभाओं की अवधि को घटा कर तथा कुछ की अवधि को बढ़ा कर किया जा सकता है। चूँकि फिलहाल कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही, इसलिये नीति आयोग ने इसे 2024 से लागू करने का संकेत दिया है। नीति आयोग ने इन सिफारिशों का अध्ययन करने और इस संबंध में मार्च 2018 की समय सीमा तय करने के लिये चुनाव आयोग को नोडल एजेंसी बनाया है। राष्ट्रहित में इसे लागू करने के लिये संविधान और इस मामले पर विशेषज्ञों, थिंक टैंक, सरकारी अधिकारियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों सहित पक्षकारों का एक विशेष समूह गठित किया जाना चाहिये, जो इसे लागू करने संबंधी सिफारिशें करेगा। इसमें संवैधानिक और वैधानिक संशोधनों के लिये मसौदा तैयार करना, एक साथ चुनाव कराने के लिये संभव कार्ययोजना तैयार करना, पक्षकारों के साथ बातचीत के लिये योजना बनाना और अन्य जानकारियां जुटाना शामिल होगा।

भारत में विधायिकाओं का चुनाव पाँच साल के लिये होता है, लेकिन उनकी यह अवधि निश्चित नहीं है। जर्मनी और जापान में इस तरह की व्यवस्था लागू है, वहाँ निश्चित समयावधि से पहले चुनाव नहीं होते, उनका नेतृत्व ज़रूर बदल जाता है।

विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट

विधि आयोग ने वर्ष 1999 में दी गई अपनी 170वीं रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का समर्थन किया था। चुनाव सुधारों पर विधि आयोग की इस रिपोर्ट को देश में राजनीतिक प्रणाली के कामकाज पर अब तक के सबसे व्यापक दस्तावेज़ों में से एक माना जाता है। इस रिपोर्ट का एक पूरा अध्याय इसी पर केंद्रित है। राजनीतिक व चुनावी सुधारों से सम्बंधित इस रिपोर्ट में दलीय सुधारों पर भी काफी बल दिया गया है। राजनीतिक दलों के कोष, चंदा एकत्रित करने के तरीके और उसमें अनियमितताएं तथा इन सबका राजनीतिक प्रक्रियाओं पर प्रभाव आदि का भी इस रिपोर्ट में विश्लेषण किया गया है। आज ईवीएम में नोटा (NOTA) का जो विकल्प है, इसकी सिफारिश भी विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में ‘नकारात्मक मतदान की व्यवस्था लागू करने’ की बात कहकर की थी। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर यह विकल्प मतदाताओं को दिया गया।

एक साथ चुनाव के पक्ष में तर्क

एक साथ चुनाव कराने से न केवल मतदाताओं का उत्साह बना रहेगा, बल्कि इससे धन की बचत होगी और प्रशासनिक प्रयासों की पुनरावृति से भी बचा जा सकेगा। राजनीतिक दलों के खर्च पर भी नियंत्रण लगेगा, जिससे चुनावों में काला धन खपाने जैसी समस्या से भी बचाव होगा। बार-बार चुनावी आदर्श आचार संहिता भी लागू नहीं करनी पड़ेगी, जिससे जनहित के कार्य प्रभावित होते हैं। सरकारी अधिकारियों, शिक्षकों व कर्मचारियों की चुनावी ड्यूटी लगती है, जिससे बच्चों की पढ़ाई व प्रशासनिक कार्य प्रभावित होते हैं उस पर अंकुश लगेगा।एक साथ लोकसभा व विधानसभा के चुनाव होने पर सरकारी मशीनरी की कार्य क्षमता बढ़ेगी तथा आम लोगों को इससे फायदा होगा।

एक साथ चुनाव कराने के समर्थक इसके पक्ष में जो सबसे मज़बूत दलील देते हैं वह यह कि इससे सरकारी धन की भारी बचत होगी। 1952 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर 10 करोड़ रुपए खर्च हुए थे, जबकि 2014 के लोक सभा चुनावों में सरकार ने 4500 करोड़ रुपए खर्च किये । एक साथ चुनाव होने से राजनीतिक स्थिरता का दौर शुरू होगा, जिससे विकास-कार्यों में तेज़ी आएगी। एक मतदाता सूची होने के कारण सभी चुनावों में उसका इस्तेमाल किया जा सकेगा और सूची में नाम न होने की समस्या समाप्त हो जाएगी।

राह में आने वाली चुनौतियाँ

एक साथ चुनाव कराना अवधारणा की दृष्टि से ठीक हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की मूल भावना के मद्देनज़र यह अव्यावहारिक है।संसद या राज्य विधानसभा के लिये पाँच वर्ष की अवधि सुनिश्चित कर पाना वैधानिक रूप से असंभव है। केंद्र और राज्यों में एक साथ चुनाव कराने के विरोध में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि भारतीय मतदाता इतना परिपक्व नहीं हुआ है कि इनमें अंतर कर सके। इसके समर्थन में दिये गए आँकड़ों से पता चलता है कि 1999 से 2014 तक 16 बार ऐसा हुआ जब लोकसभा चुनावों के छह महीने के भीतर कुछ राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हुए और 77% मामलों में विजय एक ही पार्टी को मिली। लेकिन कुछ मामले ऐसे भी सामने आए जहाँ ऐसा नहीं हुआ। भारत के मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो केंद्र और राज्यों की वरीयताओं में अंतर करने में सक्षम नहीं है। वह नेताओं के प्रभामंडल से प्रभावित होकर मतदान करता है। अलग-अलग चुनाव कराने में मतदाताओं को आसानी रहती है और वे यह अंतर करने में सक्षम होते हैं कि कौन सी पार्टी केंद्र में सरकार बनाने के लिये ठीक है और कौन सी पार्टी राज्य में बेहतर शासन दे पाएगी।

एक साथ चुनाव कराने का विचार इसलिये भी उचित नहीं है क्योंकि यदि कोई सरकार अविश्वास प्रस्ताव में गिर जाती है या किसी राज्य में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता है तो वहाँ मध्यावधि चुनाव किस प्रकार हो पाएंगे। वैसे संविधान में यह कहीं नहीं कहा गया है कि केंद्र और राज्यों में चुनाव एक साथ नहीं कराए जा सकते, लेकिन कानून का सहारा लेकर राज्यों को इसके लिये बाध्य करना संघवाद की भावना से भी ठीक नहीं होगा। इसके लिये कानून बनाकर यह व्यवस्था की जा सकती है कि किसी भी राज्य में पाँच वर्षों में केवल दो बार चुनाव होंगे—एक बार लोकसभा के लिये और दूसरी बार राज्य विधानसभा के लिये।

लोकसभा और राज्य विधानसभा का चुनाव एक साथ कराने से राष्ट्रीय पार्टियों को लाभ होगा। छोटे क्षेत्रीय दलों की भूमिका कम हो जाएगी क्योंकि बड़े राजनीतिक नेताओं और पार्टियों से जुड़ा प्रभामंडल राज्य चुनावों के परिणाम को प्रभावित करता है।

 

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विशेषज्ञों की राय

देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले स्थानीय निकायों के चुनावों (पंचायत और जिला परिषद् चुनावों सहित) को भी उपरोक्त चुनावों के साथ मिलाकर देखें तो भारत में चुनाव वर्षभर चलने वाला उत्सव जैसा बन गए हैं। यही वज़ह है कि कई समितियों तथा आयोगों ने एक ऐसी सर्वसम्मत पद्धति की तलाश करने की बात की है, जिसमें चुनावों को एक साथ कराया जा सके। विधि आयोग ने भी बहुग्राही तथा व्यापक राजनीतिक, संस्थागत व चुनावी सुधारों की तथा ऐसी युक्तियों की अनुशंसा की है, जिससे लोकसभा तथा सभी विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ कराने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

प्रथम दृष्टया एक साथ चुनाव कराने का विचार अच्छा प्रतीत होता है पर यह व्यावहारिक है या नहीं, इस पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। बार-बार होने वाले चुनावों के कारण एक व्यवस्था और स्थायित्व की ज़रूरत महसूस होती है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने पर बहस करने का यह उपयुक्त समय है, लेकिन इसके लिये सबसे ज़रूरी काम है सभी राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति का होना, जिसे बनाना बेहद मुश्किल है। इसके बाद दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन की भी ज़रूरत पड़ेगी, जिसे आम सहमति के बिना नहीं किया जा सकता

संविधान के कार्य की समीक्षा के लिये राष्ट्रीय आयोग (वेंकटचलैया आयोग) की मसौदा समिति के पूर्व अध्यक्ष सुभाष कश्यप एक साथ चुनाव कराए जाने का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि इससे चुनाव पर होने वाला खर्च आधे से भी कम हो जाएगा, लेकिन इसके लिये संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद का कार्यकाल), अनुच्छेद 85 (संसदीय सत्र को स्थगित करना और खत्म करना), अनुच्छेद 172 (विधानसभा का कार्यकाल) और अनुच्छेद 174 (विधानसभा सत्र का स्थगित करना और खत्म करना) में संशोधन करना होगा; और इससे भी बड़ी चुनौती राजनीतिक दलों में सर्वसम्मति बनाने की है।

विसंगतियाँ एवं विषमताएँ भी

लगभग 81.6 करोड़ मतदाताओं (2014 के आम चुनाव में संख्या) वाला भारतीय लोकतंत्र विश्व का विशालतम लोकतंत्र है और समय के साथ यह परिपक्व भी हुआ है, लेकिन इसमें कई विसंगतियाँ एवं विषमताएँ भी देखने को मिलती हैं। वर्तमान चुनावी प्रक्रिया में जनप्रतिनिधियों को चुनने का काम देशभर में कहीं-न-कहीं चलता ही रहता है। इससे न केवल विकास प्रभावित होता है, बल्कि राजकोष पर अनावश्यक आर्थिक भार भी पड़ता है। इसलिये समयकी के अध्यक्षता वाली संसद की स्थायी समिति ने दिसंबर 2015 में अपनी एक रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया था, जिसके बाद सरकार ने चुनाव आयोग से राय मांगी थी।

संविधान संशोधन जरुरी

बेशक, एक साथ चुनाव कराने का विचार प्रथम दृष्टया बेहतर प्रतीत होता है, लेकिन इसकी अपनी चुनौतियाँ भी हैं। राजनीतिक दलों में आम सहमति बनाने के बाद ऐसा करने के लिये सर्वप्रथम संविधान संशोधन करना होगा। एक साथ चुनाव कराने की स्थिति में काफी अधिक संख्या में ईवीएम तथा वीवीपैट, मानव संसाधन और बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की ज़रूरत पड़ेगी, अतिरिक्त आर्थिक भार भी पड़ेगा। इसके अलावा और भी कई तरह की स्थानीय तथा तात्कालिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

धन की भारी बचत

चुनाव सुधार के संदर्भ में देखें तो एक साथ चुनाव कराने से धन की भारी बचत होगी, विकास योजनाओं की रफ्तार पर ब्रेक नहीं लगेगा, उम्मीदवारों द्वारा किये जाने वाले खर्च में भी कमी आएगी। एक साथ चुनाव कराने का समर्थन करते हुए नीति आयोग की मसौदा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सभी चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और समकालिक तरीके से होने चाहिये। ऐसा होने से शासन व्यवस्था में व्यवधान न्यूनतम होगा। 2024 के आम चुनावों से इस दिशा में शुरुआत हो सकती है।

सभी चुनाव एक साथ हों

सन् 1947 में अंग्रेजों से भारत को आजादी मिलने के बाद संसदीय लोकतंत्र को चुनना और अपना संविधान बनाना एक बड़ी घटना थी, जिसका देश साक्षी बना। आजादी के बाद तीन साल के अंदर संविधान बनाकर एक बड़ा काम किया गया था। उन्होंने कहा कि विविधता भारत की ताकत है और इसे पूरी तरह बनाए रखने में संविधान ने मदद की है। आजादी के बाद सांप्रदायिक सौहार्द्र एक बड़ी चुनौती थी। राष्ट्रपति ने आगे कहा कि विभाजन के कारण लोग परेशान थे, इसलिए सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हुए थे। यद्यपि हमारे राजनेता लोगों के बीच सौहार्द्र बनाए रखने में सफल रहे और भारत में धर्मनिरपेक्षवाद जीवन का एक हिस्सा है। हां, देश में आतंकी हमले हुए हैं, लेकिन शुक्र है कि यह (आतंक) देसी नहीं है। हम पर बाहर से हमले हुए हैं। हम सीमा पार आतंकवाद से पीडि़त हैं। आर्थिक पक्ष पर चर्चा करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि देश की आर्थिक प्रगति के लिए सामाजिक क्षेत्र में प्रदर्शन जरूरी है। सामाजिक क्षेत्र का समग्र विकास होना चाहिए, जिसमें अन्य चीजों के साथ स्वास्थ्य और सामाजिक बुनियादी ढांचा शामिल हैं। सामाजिक वितरण और समता के साथ विकास भी जरूरी है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने चाहिए। चुनाव आयोग भी एक साथ चुनाव कराने पर अपना विचार रख सकता है और चुनाव कराने का प्रयास कर सकता है।  

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