भारत को समझना है?? - दृष्टि बदलिए, पूर्वाग्रह छोड़िये

Written by शनिवार, 27 मई 2017 18:11

भारत के इतिहास पर, प्राचीन से लेकर आधुनिक तक, हजारों की संख्या में पुस्तकें मिल जाएंगी, हजारों विद्वान मिल जाएंगे, परंतु एक बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ये सारे विद्वान भारत को ठीक से समझते हैं या फिर क्या ये पुस्तकें भारत को ठीक से समझाती हैं?

इस सवाल को एक मंच मिला पिछले दिनों जब देश के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सूर्यकांत बाली की पुस्तक भारत को जानने की शर्तें तथा भारतगाथा का लोकार्पण हुआ। प्रश्न बड़ा ही समीचीन है, आखिर भारत को समझने की शर्तें क्या हैं? यह तो हम बड़ी ही सरलता से कह जाते हैं कि विदेशियों ने और उन विदेशियों के लिखे साहित्य के आधार पर भारत का पूरा चित्र प्रस्तुत करने वाले वामपंथी विद्वानों ने भारत को समझा ही नहीं, परंतु फिर प्रश्न खड़ा होता है कि यदि उन्होंने इसे नहीं समझा तो क्यों नहीं समझा और यदि हम समझना चाहें तो क्या करना होगा? चूंकि बाली जी की पुस्तक का शीर्षक ही यही है – भारत को समझने की शर्तें, स्वाभाविक रूप से अपेक्षा होती है कि उनकी पुस्तकें कम से कम भारत को समझने में हमारी सहायता करें। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं रहा है। कम से कम उनकी ये दोनों ही पुस्तकें जिस प्रश्न को उठा रही हैं, उस प्रश्न में स्वयं ही उलझ भी जा रही हैं। उन्हें पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक भारत के गौरव को तो बताना चाहता है, परंतु वह उन्हीं पाश्चात्यों में प्रतिष्ठित भी होना चाहता है, जिनका वह निरंतर खंडन करता रहता है। इसलिए इन पुस्तकों में हम परस्पर विरोधाभासी बातों का एक बड़ा जमावड़ा पाते हैं। बाली जी की भाषा बड़ी ही धारदार और ओजस्वी है और इस कारण वह एकाएक मन को अपनी ओर खींचती है, परंतु जैसे ही हम कथ्यों की ओर बढ़ते हैं, हमें बुरी तरह निराश होना पड़ता है। इतनी शानदार भाषा और इतना दयनीय कथ्य!!!

इस प्रश्न को हम प्रारंभ से ही समझना प्रारंभ करते हैं। सबसे पहला प्रश्न भारत की प्राचीनता का है। कितना प्राचीन है भारत? कितना प्राचीन है इसका इतिहास? यदि हम सूर्यकांत बाली जी की इन दो पुस्तकों का आधार लेते हैं, तो भारत का इतिहास कठिनाई से 7-8 हजार वर्ष पुराना मानना पड़ता है। परंतु बाली जी को भी इसमें थोड़ी असहजता महसूस हो रही थी। इसलिए पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर इसे खींच कर थोड़ा और पीछे ले जाते हुए कहा कि भारत का इतिहास केवल पाँच हजार वर्ष नहीं, बल्कि दस हजार वर्ष पुराना है। उन्होंने कहा कि वे प्रारंभ का जो दो-तीन हजार वर्ष बच रहे हैं, जिनमें मानव सभ्यता का विकास हुआ था, उसका इतिहास भी लिखने का प्रयास कर रहे हैं। यह कथन बड़ा ही आश्चर्यजनक है। सिंधु घाटी सभ्यता, हड़प्पा, मोहन जोदड़ो आदि का काल निकालते हुए भी वेदों का काल आज के सभी इतिहासकारों ने लगभग तीन से चार हजार ईसा पूर्व का मान लिया है। वेदों का काल मैक्समूल्लर ने 1500 ईसापूर्व माना था, परंतु उसके बाद तो गंगा में काफी पानी बह चुका है। मैक्समूल्लर को आज वेदों के काल के लिए कोई भी प्रामाणिक नहीं मानता। जर्मन विद्वान याकोबी ने 4500 वर्ष ईसापूर्व का काल स्वीकार किया है। ऐसे में भारत का इतिहास अपने आप 7-8 हजार वर्ष पहले चला जाता है। फिर भारत का इतिहास पाँच हजार वर्ष का नहीं है, कह कर बाली जी किसका खंडन करने का प्रयास कर रहे हैं? ऐसा कहने वाला आज तो कोई है ही नहीं। परंतु क्या वास्तव में भारतीय परंपरा के अनुसार भारत का इतिहास केवल 7-8 हजार या फिर बाली जी के शब्दों में केवल दस हजार वर्ष ही पुराना है?

यदि हम प्राचीनता की बात करें तो सबसे पहली बात आती है कि प्राचीनता को आंकने का हमारा स्रोत क्या होगा? स्रोतों के दो प्रकार पर तो सभी इतिहासकार एकमत हैं। पहला प्रकार है लिखित साहित्य और दूसरा है पुरातात्विक संदर्भ। आजकल एक नक्षत्राीय गणना भी की जाने लगी है। कुल मिलाकर यही तीन प्रमुख साक्ष्य हैं। भारत के इतिहास की बात करें तो लिखित साहित्य में सबसे प्रमुख संस्कृत साहित्य है। चारों वेद, वेदों के ब्राह्मण, आरण्यक, स्मृतियां, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, पुराण और ज्योतिषीय ग्रंथ। इतने विपुल साहित्य के आधार पर भारत का इतिहास निकालने का एक प्रयास किया जाता है। मैक्समूल्लर सरीखे पाश्चात्य इतिहासकारों से लेकर लोकमान्य तिलक, रमेशचंद्र मजुमदार, भगवद् दत्त, आर.एस. शर्मा, रोमिला थापर, भगवान सिंह आदि भारतीय इतिहासकार, सभी इस साहित्य को प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं। इसमें समस्या केवल एक है और उस समस्या का जन्म यूरोप में होता है। उस समस्या के जन्म लेने से पहले भारत में कम से कम किसी को भारत की प्राचीनता को लेकर कोई भ्रम नहीं रहा है। यह समस्या है बाइबिल की।

बाइबिल के अनुसार पृथिवी की रचना 4004 ईसापूर्व में हुई थी। यूरोप में ईसाइयत के उत्थान के बाद यूरोप में जो अंधकार युग प्रारंभ हुआ था, उस युग के अवसान के बाद भी यूरोपीय इतिहासकारों का इतिहास इसके इर्द-गिर्द ही घूमा करता था। हालांकि मिस्त्र और अरबों के माध्यम से भारतीय ज्ञान के संपर्क में आने के बाद से उन्हें यह तो पता चल गया था कि पृथिवी के रचनाकाल को काफी पीछे ले जाना होगा, परंतु वे सभ्यताओं के इतिहास को बाइबिल की इस गणना से पीछे ले जाने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हो पा रहे थे। जो कैलेंडर आज हम प्रयोग करते हैं, वह कैलेंडर ही इतिहास को संकीर्ण रूप से देखने का प्रमुख आधार है। यह कैलेंडर ईसा के मिथक के प्रादुर्भाव से शुरू होता है। स्वाभाविक ही है कि जब कैलेंडर ही छोटा होगा तो आप उससे कितना पुराना नाप पाएंगे? उन्होंने इतिहास को ईसा के पहले और ईसा के बाद में बाँट दिया। अब जब ईसा के बाद दो हजार साल ही बीते हैं तो उससे पहले का इतिहास वे लाखों वर्षों में कैसे देख पाएंगे? वह इतिहास भी उन्हें कुछेक हजार वर्षों में समेटना होता है। इसलिए साक्ष्यों को नजरअंदाज करके वे अपनी अटकलें पूरी दुनिया पर थोपते रहते हैं। इस समस्या की चपेट में वामपंथी इतिहासकार तो हैं ही, सूर्यकांत बाली सरीखे भारतीय इतिहास लेखक भी हैं।

प्रश्न है कि यदि हम भारतीय साहित्य को स्रोत के रूप में स्वीकार कर सकते हैं तो फिर भारतीय कालगणना को स्वीकार करने में बाधा क्या है? इसका उत्तर कोई नहीं देता। आखिर मनुस्मृति से लेकर सूर्य सिद्धांत तक में युगों की गणना का एकदम साफ वर्णन है। इस वर्णन के आधार पर हम सृष्टि संवत्, कलि संवत् और युग संवत् आदि मानते हैं। ये संवत् भारतीय परंपरा में इतने रचे बसे हैं कि पूरे देश में इन्हें उत्सव के रूप में मनाया जाता है। साफ बात है कि यूरोपीय ईसाइयों के भारत आने से पहले देश में एक सुस्पष्ट कालगणना की पद्धति थी और उसके आधार पर यहाँ का इतिहास भी वर्णित था। उदाहरण से लिए दशरथ के पुत्र श्रीराम के काल के बारे में साफ-साफ वर्णित है कि वे त्रोता युग में हुए थे। युगों की कालगणना मनुस्मृति और सूर्यसिद्धांत में ठीक से दी हुई है। इन दोनों ग्रंथों के अनुसार कलियुग चार लाख 32 हजार वर्ष, द्वापर युग आठ लाख 64 हजार वर्ष, त्रोता युग 12 लाख 96 हजार वर्ष और सत् युग 17 लाख 38 हजार वर्ष के होते हैं। इसी गणना के अनुसार कलियुग के 5109 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। इस अनुसार स्पष्ट है कि श्रीराम का काल कम से कम आठ लाख 75 हजार वर्ष पुराना तो है ही।

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समस्या यह थी कि ईसा के दो हजार आगे और दो हजार पीछे से अधिक नहीं देख पाने वाले इतिहासकारों को इतनी लंबे काल की बात सुन कर चक्कर आने लगते थे। यूरोपीय ईसाइयों का इतिहास कठिनाई से ईसा से दो हजार पीछे तक ही जा पाता था। उसमें भी उन्हें समस्या यह है कि ईसा से पाँच सौ वर्ष पहले का भी कुछ भी लिखित इतिहास अपने मूल स्वरूप में उपलब्ध ही नहीं है। ऐसे में उन्हें यह मानने में भारी कठिनाई हो रही थी कि भारत में महाभारत आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व लिखा जा सकता था, या फिर रामायण की रचना वाल्मीकि ने आज से कुछ लाख वर्ष पहले की होगी और वह आज तक सुरक्षित चली आ रही है। जब महाभारत और रामायण की प्राचीनता को स्वीकार करने में उन्हें इतनी अधिक समस्या आई तो स्वाभाविक ही है कि वेदों का काल तय करने में तो उनके पसीने छूट गए होंगे।

यदि हम ईसा और बाइबिल के संदर्भ को इतिहास के पटल से हटा दें और शुद्ध भारतीय शास्त्रों की गणना का आधार लें तो वेदों का काल समझने का प्रयास करें तो सभी भारतीय विद्वान एकमत हैं कि वेदों का काल सृष्टि के आदि का है। सृष्टि का आदि भी सभी मतभेदों के बाद भी लगभग एक अरब 95 लाख से एक अरब 97 लाख वर्ष पूर्व के बीच में आता है। प्रश्न है कि इतनी सुस्पष्ट गणना को लोकमान्य तिलक जैसे पुराने और सूर्यकांत बाली सरीखे आज के राष्ट्रवादी लेखक क्यों नहीं मानना चाहते? इसका एक बड़ा कारण जो समझ में आता है, वह यह है कि सभी इतिहासकार आज के तथाकथित वैज्ञानिक अनुसंधानों के साथ तालमेल बैठाना चाहते हैं। इन अनुसंधानों से वे मानव सभ्यता का इतिहास दस हजार वर्ष से पीछे नहीं ले जा पा रहे हैं। उससे पीछे उन्हें अविकसित मानवों की खोपड़ियां ही मिल रही हैं। और इसलिए राष्ट्रवादी से लेकर वामपंथी तक सारे इतिहासकार इस सीमा में ही भारत का इतिहास बांधने का प्रयास करते हैं। कुल मिला कर भारतीय गणनाओं को मानने में पहले बाइबिल की बाधा थी और आज विज्ञान की बाधा है। समझने की बात यह है कि पश्चिम का जो विज्ञान है, वह प्रकारांतर से ईसाई मान्यताओं की पुष्टि के लिए गढ़ा गया विज्ञान है। इसलिए वह बाइबिल से बहुत अधिक दाँए-बाँए नहीं जा सकता। हालाँकि पश्चिमी विज्ञान और बाइबिल में अनेक टकराव भी हमें दिखते हैं परंतु कुछेक मामलों में दोनों ही समान हैं। पहली समानता, स्वयं को ही एकमात्रा सत्य मानने की मानसिकता है। दूसरी समानता, अपनी अज्ञानता को पूरी दुनिया पर लाद देने की है। तीसरी समानता, क्षुद्र दृष्टि है। इस प्रकार भले ही कुछेक निष्कर्षों में दोनों भिन्न दिखते हों, अन्तिम परिणाम दोनों के समान ही आते हैं।

पाश्चात्य विज्ञान ने भारतीय कालगणना को मानने में सबसे बड़ी बाधा विकासवाद के रूप में खड़ी की है। इसके अनुसार आदमी पहले बंदर था, फिर वह थोड़ा विकसित हुआ तो आदिमानव बना और विकसित हुआ तो जंगली मानव बना, और विकसित हुआ तो ग्रामीण मानव बना, और विकसित हुआ तो शहरी मानव बना, और विकसित हुआ तो मैट्रो मानव बन गया है, और अधिक विकसित होगा, जिसकी कोशिश आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान कर रहा है तो वह अंतरिक्ष मानव बन जाएगा। इस विकासवाद के आधार पर ही पूरी दुनिया के इतिहास को वे तो लिख ही रहे हैं, भारत को भी समझने और समझाने का प्रयास कर रहे हैं, समस्या यह है कि हमारे देश के राष्ट्रवादी लेखक भी इस बाधा दौड़ में ठोकर खाकर गिर पड़े हैं।

पहली शर्त

तो हम भारत को कैसे समझें और उसे समझने की वास्तविक शर्तें क्या हैं? पहली शर्त है अपने शास्त्रों के आधार को समझना और उस पर विश्वास रखना। भारतीय इतिहास की घटनाओं के काल को समझने के लिए दूरदृष्टिदोषग्रस्त पाश्चात्यों मतों की बजाय भारत के अपने निर्भ्रांत और सुस्पष्ट आधारों का ग्रहण किया जाए। उदाहरण के लिए सूर्यसिद्धांत और मनुस्मृति में युगों की कालगणना दी हुई है। युगों का काल उसके अनुसार ही निकाला जाएगा। इसके आधार पर पंडित भगवद् दत्त और पंडित रघुनंदन शर्मा जैसे विद्वानों ने काफी पहले ही वेदों के काल पर मैक्समूलर से लेकर बालगंगाधर तिलक तक के मतों की समालोचना कर रखी है। उनकी सभी आपत्तियों का सप्रमाण उत्तर दे रखा है। उसे पढ़ना चाहिए। दूसरी शर्त है कि हमें आधुनिक विज्ञान के चश्मे से भारतीय परंपराओं और इतिहास को समझने का प्रयास बंद करना होगा। इसका एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा। जैविक वस्तुओं का काल नापने के लिए आज का विज्ञान कार्बन डेटिंग का प्रयोग करता है। इस प्रक्रिया में काफी कमियां हैं। इसमें पहला दोष तो यही है कि सही काल को मापना संभव ही नहीं है क्योंकि कार्बन 12 और कार्बन 14 के अनुपात और उसमें आने वाले परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारक बड़ी संख्या में हैं। कोई आवश्यक नहीं है कि कार्बन 14 और कार्बन 12 के अनुपात में परिवर्तन एक निश्चित गति और दर से ही होता हो। इसलिए इनसे निश्चित तो छोड़ ही दें, अनुमानित काल भी नहीं जाना जा सकता। यह एक हाइपोथिसीस पर आधारित है, किसी निश्चित जानकारी पर नहीं।

दूसरी शर्त

इसी प्रकार विकासवाद के आधार पर दुनिया के इतिहास को समझने का प्रयास भी उतना ही अवैज्ञानिक और त्राुटिपूर्ण होगा। विकासवाद की सबसे बड़ी कमी यह है कि एक योनी से दूसरी योनी में परिवर्तन आज तक कहीं भी देखा नहीं गया है। कोई भी गाय, हिप्पोपोटेमस और कोई भी हिप्पोपोटेमस, व्हेल में बदलता आज तक नहीं देखा गया। इसके चरणों का एक अनुमान ही लगाया जाता है। प्रश्न यह है कि इन सभी जीवों की स्वतंत्र उत्पत्ति मानने में समस्या क्या है? आखिर इन सभी जीवों को एक-दूसरे से ही क्यों विकसित होना चाहिए? विकासवाद पर भारतीय शास्त्रों का मत बहुत साफ है। भारतीय शास्त्र योनी-परिवर्तन को स्पष्ट रूप से असंभव मानते हैं। व्यावहारिक दृष्टि से आज तक के इसके सभी प्रयोग असफल भी रहे हैं। विकासवाद की समालोचना पंडित रघुनंदन शर्मा ने वैदिक संपत्ति में और वैद्य गुरूदत्त ने अपनी पुस्तक विज्ञान और विज्ञान तथा सृष्टि रचना में विस्तार से किया हुआ है। वैदिक संपत्ति में विकासवाद की समीक्षा में विकासवाद के पाँचों आधारों, जातिविभागशास्त्र (क्लासीफिकेशन), तुलनात्मक शरीररचना शास्त्र (कॉम्पॅरेटिव एनॉटॅमी), गर्भवृद्धिशास्त्र (एम्ब्रॉयलोजी), लुप्त जन्तु शास्त्र (पैलिओन्टोलोजी) और भौगोलिक विभागशास्त्र (जियोग्राफिकल डिस्ट्रीव्यूशन) का गहन विवेचन किया है। उन्होंने इन सभी आधारों पर जो प्रश्न उठाए हैं, वे आज तक के विज्ञान में अनुत्तरित ही हैं। इसी प्रकार गुरुदत्त ने अपनी पुस्तकों में विकासवाद पर आधुनिक वैज्ञानिकों ने जो प्रश्न उठाए हैं, उन्हें भी प्रस्तुत किया है। ऐसे में एक अपुष्ट सिद्धांत के आधार पर मानवों का पूरा इतिहास लिख डालना धृष्टता ही कही जाएगी। यहां हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि आज से केवल हजार वर्ष पहले जब भारतीय लोग पृथिवी और सूर्य की दूरी का वास्तविक आंकलन करने में सक्षम थे, यूरोपीय विद्वान सूर्य को पृथिवी से छोटा साबित करने के प्रयासों में लगे हुए थे। कॉसमास द मोंक की पुस्तक क्रिश्चियन टोपोग्राफी में इस पर काफी परिश्रम किया गया है। आज वे मानते हैं कि इस बारे में वे गलत थे और भारतीय सही। ठीक इसी प्रकार विकासवाद की अवधारणा कठिनाई से डेढ़ सौ वर्ष पुरानी ही है। बहुत संभावना है कि आने वाले दो-तीन सौ वर्षों में उन्हें अपनी भूल ज्ञात हो जाए और वे विकासवाद को अशुद्ध मान लें। इसलिए विकासवाद को आधार बनाकर जो भी इतिहास लिखा जा रहा है, वह अशुद्ध ही होगा। भारत को समझने की यह दूसरी शर्त है।

इन दोनों ही शर्तों पर बाली जी की दोनों ही पुस्तकें खरी नहीं उतरती। उन्होंने वेदों की रचना के काल को काफी आधुनिक यानी कि सात हजार वर्ष पहले का माना है साथ ही वे यह भी मानते हैं कि वेदों की रचना एक लंबे काल तक यानी कि आज से साढ़े तीन हजार वर्ष पहले तक होती रही है। इस प्रकार उन्होंने मैक्समूलर के मत को भी मान्यता दे ही दी है। भारतीय मत तो यही रहा है कि वेदों की रचना मनुष्यों ने नहीं की, परंतु बाली जी सीधे-सीधे कहते हैं कि अनेक दलितों और स्त्रिायों ने अनेक वेदमंत्रों की रचना की। समझने की बात यह है कि दलितों द्वारा वेदमंत्रों की रचना की बात कहना-सुनना आज के परिवेश में रणनीतिक रूप से भले ही अच्छा प्रतीत होता होगा, परंतु इससे वर्ण-व्यवस्था की भारतीय संकल्पना पर बड़ा आघात भी होता है। जाने-अनजाने में हम आज की जाति-व्यवस्था को वेदों के काल में खींच कर ले जाते हैं जो कि इतिहास के साथ एक बड़ा अन्याय ही है।

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यह तो सर्वमान्य तथ्य है कि वेदों ही नहीं, उसके पर्याप्त बाद महाभारत काल तक में भी जाति-व्यवस्था स्थान नहीं बना पाई थी। विद्वान और वेदाभ्यासी को ब्राह्मण ही कहा जाता था. चाहे वह किसी भी वर्ण में उत्पन्न हुआ हो। साथ ही ऋषियों को तो वर्ण-व्यवस्था से भी ऊपर माना गया है। ऋषि को किसी वर्ण में कभी भी बांधा ही नहीं गया। जैसे राजा को वर्णों से परे माना गया था, ठीक उसी प्रकार ऋषि भी किसी वर्ण में बंधे नहीं होते थे। इसका एक बड़ा उदाहरण ऋषि ऐतरेय महिदास का है। ऐतरेय महिदास को सूर्यकांत बाली जी साफ शब्दों में दलित बताते हैं, परंतु प्रश्न उठता है कि उनका लिखा ग्रंथ ब्राह्मण ग्रंथ कहा जा रहा है, तो उन्हें हम दलित कैसे कहें? स्पष्ट है कि हम यह तो कह सकते हैं कि जन्म से जाति की संकल्पना वैदिक संकल्पना नहीं रही है। इसके विपरीत हम आज की संकल्पनाओं को वैदिक ऋषियों पर घटा दें, यह तो उनके प्रति बड़ा अन्याय हो जाएगा।

तीसरी शर्त

इसलिए बाली जी की इस स्थापना से भारत को समझने की तीसरी शर्त पैदा होती है। भारत को आप पाश्चात्य शब्दावली से नहीं समझ सकते। हरेक शब्द की अपनी पृष्ठभूमि और परंपरा होती है। उस परंपरा को समझे बिना उसका उपयोग अर्थ का अनर्थ कर सकता है। उदाहरण के लिए सेक्युलर शब्द को ले सकते हैं। सेक्युलर शब्द का कोई भी भारतीय समानार्थी शब्द नहीं हो सकता, क्योंकि भारत में कभी भी यूरोप की भांति किसी भी मत-पंथ-संप्रदाय का शासन रहा ही नहीं है। सेक्युलर स्टेट क्रिश्चियन स्टेट का विपरीत होता है। जो राज्य पोप के शासन से मुक्त होता था, उसे ही सेक्युलर राज्य कहा जाता था। इस प्रकार यदि हम सेक्युलर शब्द का परंपरावाचक अर्थ करेंगे तो उसका अर्थ केवल इतना ही होगा। हालांकि पंथनिरपेक्ष राज्य के रूप में उसका विस्तार करने का एक प्रयास किया जाता है, परंतु वह प्रयास भी अंततः धर्मनिरपेक्षता के रूप में दम तोड़ देता है।

शब्दावलियों की बात करें तो भारतीय संदर्भों में दलित, पिछड़े, पितृसत्ता, मातृसत्ता, मजहब, मजहबी युद्ध, रिलीजियन, सेक्युलर आदि शब्द कोई अर्थ नहीं रखते। भारतीय इतिहास में इनका कोई स्थान कभी नहीं रहा है। शूद्र होते रहे हैं, परंतु वे समाज में कभी भी उपेक्षित नहीं रहे। शूद्रों के अलावा अवर्ण भी रहे हैं, परंतु उनकी भी कोई उपेक्षा या अपमान करने की भावना नहीं रही है। परिवार रहे हैं, परंतु परिवारों में कभी सत्ता की कोई अवधारणा नहीं रही है। विभिन्न मत-पंथ तथा राज्य रहे हैं, पंरतु मत-पंथों के गुरुओं ने यूरोप के विपरीत राज्यसत्ता का त्याग ही किया है, उस पर कब्जा कभी भी नहीं किया। बल्कि होता तो यह रहा है कि राजा एक निश्चित समय के बाद स्वयं ही राज्य छोड़ कर वानप्रस्थी या फिर सन्यासी हो जाया करते थे। विश्वामित्र, राजा भतृहरि आदि इसके उदाहरण हैं। राजा दशरथ भी राज्य त्यागने वाले थे और यदि श्रीरामचंद्र को वनवास न मिला होता तो वे भी वन जाने वाले थे। धृतराष्ट्र और कुंती आदि के वनगमन का तो उल्लेख मिलता ही है। इसलिए पाश्चात्य शब्दावलियां भारत को समझाने में असफल रहती हैं। उनका उपयोग घातक भी होता है। रणनीतिक रूप से यदि कुछ सही प्रतीत भी हो रहा हो, तब भी कालांतर में उसका गंभीर नुकसान होने के संभावना है, क्योंकि उससे हम ऐसी स्थापनाएं कर जाएंगे, जो वस्तुतः यहाँ रही ही नहीं है।

चौथी शर्त

भारत को समझने की चौथी शर्त यह होगी कि स्रोतों के प्रति अत्यधिक सावधानी रखें। उदाहरण के लिए आज हम भारतीय इतिहास के काल निर्धारण के लिए मेगास्थनीज को एक प्रमुख स्तंभ मानते हैं। परंतु वस्तुतः मेगास्थनीज की मूल पुस्तक ही उपलब्ध नहीं है। मेगास्थनीज ही नहीं, उसके काल के अधिकांश ग्रीक लेखकों की कोई मूल पुस्तक उपलब्ध नहीं है। समस्या यह है कि विलियम जोन्स ने जब मेगास्थनीज के सैंड्राकोटट्स के चंद्रगुप्त मौर्य होने की बात कही, तब किसी ने उस पर सवाल खड़ा नहीं किया। यदि मौर्यवंश के काल को इसके अनुसार 325 ईसापूर्व में मान लिया जाता है तो फिर शंकराचार्य का काल काफी बाद का यानी कि लगभग 788 ई. सन् का हो जाता है। वेदांत दर्शन के इतिहास में आचार्य उदयवीर शास्त्राी ने शंकराचार्यों की चारों पीठों में उपलब्ध आचार्यों के कालक्रम के आधार पर शंकराचार्य का काल 570 ईसा पूर्व का साबित किया है। यह सही भी प्रतीत होता है क्योंकि राजस्थान से लेकर हिमाचल प्रदेश तक देश के विभिन्न प्रांतों में राजा युधिष्ठिर से लेकर ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी और कुछ में तो आज तक के राजाओं की वंशावलियां पाई जाती हैं। इन वंशावलियों को ध्यान में रखें तो फिर मौर्य वंश को 325 ईसा पूर्व में मानना कठिन हो जाता है। यदि शंकराचार्य का काल बारह सौ वर्ष पीछे चला जाता है तो मौर्य वंश का काल भी लगभग इतना ही वर्ष पीछे चला जाएगा।
समस्या यह भी है कि जिन ग्रीक लेखकों के आधार पर भारतीय इतिहास को लिखा जा रहा है, वह अत्यंत भ्रामक और झूठ पर आधारित है। उदाहरण के लिए मेगास्थनीज का इंडिका उपलब्ध नहीं है, परंतु टसाइस की इंडिका तो उपलब्ध है। उसे पढ़िए, झूठ का पुलिंदा है। इसी प्रकार टोलेमी और अन्यों की हालत है। स्थिति तो यह है कि भारतयात्री के नाम से प्रसिद्ध कॉसमास अपने जीवन में कभी भारत नहीं पहुँचा। इसलिए ग्रीक और यूरोपीय स्रोतों को पढ़ने में कोई बुराई नहीं है, परंतु उन पर आँख मूंद कर विश्वास करने की बजाय अत्यंत सावधानीपूर्वक उनका निरीक्षण किया जाना चाहिए।

पाँचवीं शर्त

भारत को समझने की पाँचवीं शर्त यह होगी कि भारत को उसके मौलिक स्वरुप में पढ़ा, जाना और समझा जाए। संस्कृत की परंपरा को जाने बिना कोई संस्कृत ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद पढ़ कर उसके आधार पर भारत को समझना चाहेगा, तो वह बड़ी गलती करेगा। यही गलती रोमिला थापर वगैरह ने की है। इसी प्रकार वेदों में से इतिहास निकालने की परंपरा भारतीय परंपरा नहीं है। वेद इतिहास का आधार नहीं हैं, वे ज्ञान-विज्ञान का आधार तो हैं, परंतु इतिहास का नहीं। भारत को समझने की और भी कई शर्तें हो सकती हैं। परंतु यदि हम उपरोक्त चार बिंदुओं का ध्यान रखे बिना भारत को समझने का प्रयास करेंगे तो भटक जाएंगे। फिर हम सात हजार वर्ष पहले त्रोता युग बना बैठेंगे और वैदिक ऋषियों को दलित आदि बता बैठेंगे। इससे भारत को समझना तो कठिन हो ही जाएगा, वैदिक ऋषियों की परंपरा के साथ भी बड़ा अन्याय हो जाएगा। 

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साभार : भारतीय धरोहर 

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