गौरक्षा के लिए इंदौर के कुछ युवाओं की शानदार पहल

Written by मंगलवार, 14 फरवरी 2017 12:47

होली के डांडे गढ़ चुके हैं... महीने भर बाद इंदौर में छोटी-बड़ी 20 हजार से ज्यादा होलियां जलेंगी। इस दिन यदि लकड़ियों के बजाय गोबर के कंडों की होली जलाई जाए तो शहर की 150 गौशालाओं में पल रही लगभग 50 हजार गाएं अपना सालभर का खर्च खुद निकाल लेंगी।

गौशालाओं को चलाने के लिए सरकार को न लंबी-चौड़ी सबसिडी देनी पड़ेगी, न ही गौ सेवा के नाम पर बड़े-बड़े दान मांगने की जरूरत होगी। इस नई पहल में होलकरकालीन सरकारी होली भी योगदान देने जा रही है। इस बार गाय के गोबर के कंडो से जलेगी होली ...

कुछ तथाकथित पर्यावरणविदों द्वारा होली में लकड़ी बचाने, धुएं से पर्यावरण खराब होने और कई दिनों तक जलती लकड़ी के ताप से सड़कें खराब होने जैसी दलीलें लंबे समय से दी जा रही हैं, लेकिन इंदौर के 50 व्यापारियों और कारोबारियों ने मिलकर ऐसी पहल की है, जिसमें सीख बाद में, फायदे का सौदा पहले है। दो साल के ट्रायल में नफा-नुकसान को कसौटी पर परखने के बाद अब वे घर, बाजार, मंडी, दफ्तरों में जाकर इसका गणित समझा रहे हैं। मध्यप्रदेश गौपालन एवं पशुसंवर्धन बोर्ड ने भी इसे तकनीकी रूप से सही ठहराया है।

कंडे और होली का बही_खाता

- इंदौर की 30 किमी की सीमा में छोटी-बड़ी 150 गौशालाएं है, जिनमें लगभग 50 हजार गाएं हैं। जबकि प्रदेश में अनुदान प्राप्त 664 गौशालाएं हैं। इनमें लगभग 1 लाख 20 हजार गाएं रहती हैं।

- एक गाय रोज 10 किलो गोबर देती है। इस तरह इंदौर सहित प्रदेशभर में रोज 12 लाख किलो गोबर निकलता है। 10 किलो गोबर को सुखाकर 5 कंडे बनाए जा सकते हैं।

- होली पर इंदौर में 15-20 लाख कंडों की जरूरत होती है, जिसके पर्याप्त इंतजाम हैं।

...तो कंडे से ही आ जाएंगे 2 करोड़

गोबर से गाय अपना खर्च कैसे निकालेगी? अभियान से शुरू से जुड़े कारोबारी मनोज तिवारी, राजेश गुप्ता और गोपाल अग्रवाल बताते हैं एक कंडे की कीमत 10 रुपए है। इसमें 2 रुपए कंडे बनाने वाले को, 2 रुपए ट्रांसपोर्टर को और 6 रुपए गौशाला को मिलेंगे। यदि शहर में होली पर 20 लाख कंडे भी जलाए जाते हैं तो 2 करोड़ रुपए कमाए जा सकते हैं। औसतन एक गौशाला के हिस्से में बगैर किसी अनुदान के 13 लाख रुपए तक आ जाएंगे। लकड़ी की तुलना में लोगों को कंडे सस्ते भी पड़ेंगे। गौ सेवा से जुड़े अखिल भारतीय गो सेवा प्रमुख शंकरलाल जी का कहना है, यह अभियान कोलकाता के कुछ हिस्सों में शुरू हुआ था, लेकिन बड़े पैमाने पर हो तो इसका व्यापक असर देखा जा सकता है।

40 रुपए खर्च और मिलते हैं 6 रुपए

एक गाय का हरा चारा, भूसा और दाना समेत खर्च रोजाना 40 से 50 रुपए होता है। जबकि सरकार प्रति गाय रोज लगभग 6 रुपए का अनुदान दे पाती है। कंडे की होली और गोबर खाद खरीदकर समाज गौशालाओं को स्वाबलंबी बनाया जा सकता है। इसी प्रकार इंदौर के राजबाड़ा की सरकारी होली में भी इस बार सिर्फ एक बड़ी लकड़ी होगी. होलकरवंश से जुड़े उदयराव होलकर ने भी इस पर सहमति दे दी है। सरकारी होली में अभी तक आधी लकड़ी और आधे कंडे का इस्तेमाल होता था, लेकिन मान्यता के अनुसार होली जलने के बाद शहरवासी सरकारी होली की आग ले जाते हैं, इसलिए इस बार बीच में केवल एक बड़ी लकड़ी रखेंगे। यह लकड़ी पांच दिन तक जलती रहेगी। शेष होली के लिए कंडों का इस्तेमाल होगा। केवल 2 किलो सूखा गोबर जलाने से 300 ग्राम ऑक्सीजन निकलती है. एक गाय रोज 10 किलो गोबर देती है। इसकी राख से 60 फीसदी यानी 300 ग्राम ऑक्सीजन निकलती है।

क्या आप भी अपने गाँव नगर स्तर पर कुछ ऐसा कर सकते हैं?? सोचिये... सच्चे भूमिपुत्र बनें, असली पर्यावरणवादी बनें... होली के लिए केवल गाय के गोबर से बने कंडे उपयोग में लाएँ... 

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