फिल्म संगीत से लुप्त होती मधुरता और विविधता...

Written by सोमवार, 21 अगस्त 2017 07:33

स्मरण करने का प्रयास कीजिए, कि आपने पिछले दस वर्षों में हिन्दी फिल्मों में कितने भजन गीत देखे या सुने हैं? मस्तिष्क पर ज़ोर लगाना पड़ेगा ना!!! अच्छा उसे छोड़िये, यह याद करने का प्रयास कीजिये कि पिछले दस वर्षों में हिन्दी फिल्मों में आपने जन्माष्टमी, रामनवमी, महाशिवरात्रि से सम्बंधित कितने गीत सुने हैं??

अच्छा, इसे भी छोड़ दीजिए, याद कीजिए कि आपने मधुर कव्वालियाँ कितनी सुनी हैं, पिछले दस वर्षों में?? ओम शान्ति ओम में शाहरुख खान वाली कथित कव्वाली? या फिर रणबीर कपूर की किसी फिल्म में एक दरगाह पर चल रही कव्वाली? या इंदु सरकार फिल्म में “उधार” ली गयी पुराने जमाने की कव्वाली... यानी शायद दो-चार??

जी हाँ!!! मैं आपको अधिक परेशान करना नहीं चाहता. असल में हॉट डॉग और पिज्ज़ा जैसे “एकरस” खाद्य पदार्थ कुछ ही समय के लिए आपको आनंद दे सकते हैं, जबकि चटनी, अचार, पापड, दही, दाल-चावल से भरी-पूरी थाली कभी पुरानी नहीं होगी और भूख भी उसी से मिटेगी. पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी फिल्म संगीत काफी कुछ पिज्ज़ा की तरह “एकरस” होता जा रहा है. फिल्म संगीत से भजन, कीर्तन, कव्वाली, शास्त्रीय गीत, धार्मिक उत्सवों से सम्बंधित उत्साह जगाते हुए धमाकेदार गीत तेजी से ख़त्म होते जा रहे हैं. इनके स्थान पर वाद्य यंत्रों के शोर, अनावश्यक चीख-चिल्लाहट, नई धुनों का अभाव... गायकों की आवाज़ का एक जैसा मीटर... श्रोताओं के मन में खीझ उत्पन्न करने लगा है. 1950 में आई फिल्म “बैजू-बावरा” का गीत “तू गंगा की मौज, मैं जमना का धारा..” आज भी लोग बड़ी सरलता से पहचान लेते हैं, गुनगुना लेते हैं और यह गीत मन में संतोषजनक भाव के साथ निर्मल प्रेम उत्पन्न करता है... अर्थात आज से 67 वर्ष पहले आई फिल्म के गीत आज भी जुबान पर हैं. जो हिन्दी फिल्म संगीत पिछले कई वर्षों से एक से बढ़कर एक मधुर गीत देता आया है, उस पर ऐसी बुरी स्थिति आ गयी है कि थियेटर से निकलने के बाद याद ही नहीं रहता कि हमने इस फिल्म में कौन-कौन से गीत सुने (बल्कि “देखे” कहना उचित होगा) थे.

ऐसा भी नहीं है कि आजकल केवल खराब गीत या घटिया संगीत ही फिल्मों में पेश किया जा रहा है, परन्तु जिसे हम “मेलोडी” कहते हैं, उसकी मात्रा निरंतर घटती जा रही है. संगीत हमारी भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है. चूँकि आम जनता शास्त्रीय संगीत अधिक नहीं जानती, इसलिए फिल्मों के माध्यम से जो “सुगम संगीत” (सभी के लिए सुगम) उसे प्राप्त होता है, उसे वह अपने दैनंदिन जीवन में ग्रहण करता है. हमारी संस्कृति और कला विभिन्न संस्कृतियों की पोषक है. असल में भारतीय फिल्म संगीत बहुत बड़ा विषय है, और इसने विभिन्न शैलियों को जन्म भी दिया है. भारतीय संगीत में सुगम संगीत अत्यंत प्रचलित है क्योंकि यह जन सामान्य को जोड़ने में अधिक सहायक है. सुगम संगीत यानी एक तरह से फिल्म संगीत. यदि हम ऐसा कहें तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी, कि फिल्म संगीत ही भारतीय संगीत का अत्यंत प्रचलित स्वरुप है. चाय की गुमटी पर बैठा हुआ कोई छोटू यदि सरलता से सोनू निगम के गीत गुनगुना लेता है तो यह जनसामान्य की विधा ही हुई ना?? इसीलिए भारतीय चित्रपट संगीत मात्र एक नाम नहीं है. यह एक दीर्घकालीन यात्रा है. जिसने अपने कालखण्ड में अनेक बार उतार-चढाव देखे.

भारतीय फिल्म संगीत का आरंभ उस कालखण्ड से आरंभ हुआ, जब चित्रपट के नायक एवं नायिका स्वयं ही अपने गीत गाते और अभिनय करते. अशोक कुमार और देविका रानी उन दिनों सुपर-स्टार हुआ करते थे. शूटिंग के समय कैमरे के पीछे ही साजिन्दे बैठाए जाते और एक तरह से “लाईव रिकॉर्डिंग” की जाती थी. सोचिये कितना कठिन रहा होगा. कला के प्रति ऐसे निष्ठावान कलाकारों के आधार पर फिल्मी संगीत दुनिया की नींव रखी गई. इस श्रृखंला में आगे चलकर लता मंगेशकर जैसी कलाकार आईं, जिन्होंने उस परंपरा को तोड़ा जिसके अनुसार एलपी रिकॉर्ड पर फिल्म के नायक-नायिका का नाम छपा होता था. सबसे पहले “महल” फिल्म के रिकॉर्ड पर गायिका के रूप में मधुबाला की बजाय लता मंगेशकर का नाम छपा. ऐसे कई कलाकार हुए जिन्होंने अपने प्रारंभिक दिनों में अभिनय और गायन साथ किया, करना ही पड़ता था, ऐसा करना उस समय की माँग थी. इसीलिए पारसी थियेटर के ऊँची आवाज़ में बोलने वाले कलाकारों जैसे कि सोहराब मोदी और पृथ्वीराज कपूर जैसे बुलंद आवाज़ वाले नायकों की माँग रहती थी. मराठी नाटकों की परंपरा में बाल गन्धर्व ने स्त्री भूमिकाएँ करके एक नया इतिहास रचा, चूंकि पीछे बैठे हुए दर्शक तक आवाज़ पहुँचनी चाहिए, इसलिए उन दिनों ऐसे महान कलाकार पूरा ज़ोर लगाकर बिना माईक के “लाईव” गाते थे.

इसके पश्चात समय अपनी गति से चलता रहा और परिस्थितियां बदलती गईं, और स्वर्णिम काल आया पार्श्वगायन का. जिस प्रकार एक फिल्म बनाने के लिये एक कहानीकार, निर्देशक, संवाद लेखक, नायक-नायिका का होना आवश्यक है, उसी प्रकार संगीत निर्मित करते समय भी गीतकार, संगीतकार, गायक का होना भी आवश्यक है। हिन्दी फिल्म संगीत में “पहली बोलती फिल्म” आलम आरा की रिकॉर्डिंग 1931 में हुई थी. आज यह सब कुछ बदल चुका है. अब डिजीटल रिकॉर्डिंग का जमाना है. तकनीकों अधिकता से काम आसान भी हुए हैं. यदि युगल गीत हो, तो एक गायक पहले अपना गीत गाकर चला जाता है, फिर उस ट्रैक पर दूसरा गायक (जब उसे समय हो) आकर अपना गीत रिकॉर्ड करता है. इसके बाद संगीत निर्देशक अपने तकनीकी हथियार लेकर बैठता है और उसमें साज-सँवार करता है. इस प्रकार टुकड़ों-टुकड़ों में एक गीत तैयार होता है. अब वो ज़माना नहीं रहा कि फिल्म “बरसात की रात” वाली पूरे चौदह मिनट की ऐतिहासिक कव्वाली “ये इश्क, इश्क है, इश्क इश्क...” की रिकॉर्डिंग पूरे इक्कीस दिनों तक चली थी, जिसमें संगीतकार रौशन ने अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया. फिल्मी संगीत यात्रा के कई दशक बीत चुके हैं, फिर भी आज यह लोगों के दिलों पर छाया हुआ है. संगीत की दुनिया में इसने अपना वर्चस्व कायम रखा है. प्रत्येक दशक की अपनी एक पहचान अपनी एक महक, अपने सुर, अपना एक विस्तार तथा अपना एक इतिहास होता है.

iliaya raja

आजकल चिकित्सा विज्ञान भी यह मानने लगा है कि संगीत से कई रोगों का इलाज किया जा सकता है. मध्यप्रदेश में एक किसान ने एक अभिनव प्रयोग किया, उसने अपनी नर्सरी में विभिन्न पौधों के पास क्यारियों में छोटे-छोटे स्पीकर लगाकर दर्जनों पौधों को सुबह-शाम शास्त्रीय संगीत सुनवाया. उसका यह प्रयोग सफल रहा और यह परिणाम निकला कि जिन पौधों को मधुर फिल्म संगीत या शास्त्रीय संगीत सुनवाया गया उन पौधों की वृद्धि, स्वास्थ्य एवं फलों की उत्पत्ति दूसरे पौधों की अपेक्षा अधिक रही. प्रतिदिन 20 मिनट अपनी पसंद का संगीत सुनने से रोज़मर्रा की होने वाली बहुत सी बीमारियों से निजात पाई जा सकती है. जिस प्रकार हर रोग का संबंध किसी ना किसी “ग्रह-विशेष” से होता है, उसी प्रकार संगीत के हर सुर व राग का संबंध किसी ना किसी ग्रह से अवश्य होता है. यदि किसी व्यक्ति को किसी ग्रह विशेष से संबन्धित रोग हो और उसे उस ग्रह से संबन्धित राग, सुर अथवा गीत सुनाये जायें तो वह व्यक्ति जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है. यहाँ पर चन्द उदाहरण देना आवश्यक है...

यदि किसी व्यक्ति को हृदय रोग है, तो इस रोग मे राग दरबारी व राग सारंग से संबन्धित संगीत सुनना लाभदायक होता है. इन रागों से संबन्धित फिल्मी गीत इस प्रकार हैं - तोरा मन दर्पण कहलाए (काजल), राधिके तूने बंसरी चुराई (बेटी-बेटे), झनक झनक तोरी बाजे पायलिया (मेरे हुज़ूर), ओ दुनिया के रखवाले (बैजू बावरा), मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोये (मुगले आजम), इत्यादि. आजकल अनिद्रा हमारे सभी के जीवन मे होने वाले सबसे साधारण रोगों में से एक है. इस रोग के होने पर राग भैरवी व राग सोहनी सुनना लाभकारी होता है, इन रागों के प्रमुख गीत इस प्रकार से हैं - 1) रात भर आपकी याद आती रही (गमन), २) मीठे बोल बोले बोले पायलिया(सितारा), ३) तू गंगा की मौज मैं यमुना (बैजु बावरा), ४) साँवरे साँवरे (अंनुराधा), ५) चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम), छम छम बजे रे पायलिया (घूँघट) इत्यादि. उच्च रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) एक सामान्य बीमारी है, और अब तो लगभग 30% भारतीय इसकी चपेट में हैं. इस रोग में धीमी गति और निम्न रक्तचाप मे तीव्र गति का गीत संगीत लाभ देता है. उच्च रक्तचाप मे “चल उड जा रे पंछी कि अब ये देश (भाभी), ज्योति कलश छलके (भाभी की चूड़ियाँ), चलो दिलदार चलो (पाकीजा), नीले गगन के तले (हमराज़) जैसे गीत जबकि निम्न रक्तचाप मे “ओ नींद ना मुझको आए (पोस्ट बॉक्स न॰ 909), बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना (जिस देश मे गंगा बहती है), जहां डाल डाल पर (सिकंदरे आजम), पंख होते तो उड़ आती रे (सेहरा) इत्यादि सुनना लाभदायक होता है.

अल्लाह तेरो नाम... (हम दोनों), जैसे सूरज की गरमी से तपते हुए तन को (स्वामी), मन तड़पत हरि दर्शन को आज (बैजू बावरा), इंसाफ का मंदिर है ये भगवान का घर है (नया दौर) जैसे गीत बनते रहे, तो हमें लगता रहा कि फिल्म संगीत भी प्रार्थना का ही एक भाग है. हमारे फिल्म संगीत का कंप्यूटरीकरण होने से पहले तक हिंदी फिल्म संगीत में बमुश्किल पांच सौ संगीतकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई, इनमें से बीस फीसदी ही पहचान बना पाए... और पांच फीसदी ही ऐसे रहे जो हमारे दिलों में घर कर गए.. क्योंकि कड़ी मेहनत और प्रतिभा का कोई विकल्प नहीं होता. इसी प्रकार गायक गायिकाओं में तो ये आँकड़े और भी कम हैं. मुट्ठी भर नाम ही लगभग पचास वर्ष तक छाए रहे और इनमें से भी चार-छह नाम ऐसे उभरे, जिनकी आवाज सुने बिना दिन, दिन नहीं लगता... सुबह, सुबह नहीं लगती... शाम, शाम नहीं. रफी-लता-मुकेश-आशा-किशोर-मन्ना डे-महेंद्र कपूर इनकी सम्मिलित आवाजों को जोड़ दिया जाए तो शायद ये आवाजें हमारे अपने परिवार के सदस्यों की कुल जमा आवाजों से भी ज्यादा सुनी जाती रहीं.
फिर आया कंप्यूटरीकृत संगीत... इस ने सारे समीकरण गड़बड़ा दिए, युग सुधरा लेकिन संगीत बिगड़ने लगा. परन्तु कम्प्यूटर चाहे जितना ही उन्नत और प्रतिभाशाली क्यों न हो, वह अब कोई रफी नहीं पैदा कर सकता, कम्प्युटर लता मंगेशकर जैसा “स्वर सम्राज्ञी” की महापदवी नहीं पा सकता. बची-खुची कसर “रीमिक्स और फ्यूजन” नामक कूड़े ने पूरी कर दी.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह दौर बड़ा निराशाजनक है. यहाँ तक कि अन्नू मालिक जैसे स्थापित और दिग्गज संगीतकार, पार्श्व गायक-गायिकाएं टीवी रियलिटी शो में हाथ मलते बैठे हैं और इनके रहते नए नाम धूम मचा रहे हैं। कारण? नए युवा संगीतकार “टैक्नो-सैवी” हैं, कंप्यूटर ज्ञान से लबरेज हैं. फिल्म निर्माता के लिए ये लोग सस्ते और सुविधाजनक लोग हैं जो अपना काम “समय पर” पूरा करके देते हैं. सारी दिक्कत यही है कि आजकल फिल्म संगीत भी एक “काम” समझा जाने लगा है, जिसे तयशुदा समय पर पूरा करना होता है... अब फिल्म संगीत “कला” नहीं रही, कला अर्थात जो मुक्त हो... आकाश में गुम होकर, समुद्र किनारे टहलते हुए बड़े आराम से रूहानी अंदाज़ में जिस रचना को रचा जाए. इतना होने पर भी आजकल ढेरों फालतू गीतों के बीच कभीकभार कोई अच्छा गीत आ ही जाता है...

कहने का तात्पर्य यह है कि क्या पिछले दस-पंद्रह वर्षों की फिल्मों के संगीत को सुनकर आप यकीन से कह सकते हैं कि आपकी कोई बीमारी दूर होगी?? या आपको संदेह है कि यदि लगातार नई फिल्मों के गीत सुने जाएं तो कानों में विकार उत्पन्न हो सकता है? – खुद ही निर्णय कीजिए.

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