सरकारी लूट से मंदिरों को मुक्त करो (भाग-२)

Written by गुरुवार, 14 दिसम्बर 2017 19:27

राज्य सरकारें एक काले क़ानून (HRCE Act) द्वारा किस प्रकार से मंदिरों के माध्यम से “आधिकारिक और होलसेल” लूट कर रहे हैं, इस बारे में पिछले भाग में आप पढ़ चुके हैं (उस लेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें).

आगामी किसी भाग में इस लूट के बारे में और अधिक विस्तार से लिखा जाएगा. फिलहाल लेखमाला के इस भाग में हम देखेंगे कि मंदिरों की संपत्ति, दान और जमीन के इस घोटालों को रोकने के लिए वर्षों पूर्व एक जाँच आयोग (Ramaswami Ayyar Commission) बना था उसकी रिपोर्ट क्या है, उस आयोग की अनुशंसाएँ क्या थीं.

मंदिरों की संपत्ति, इसके मालकी अधिकार और करोड़ों-अरबों की संपत्ति को देखते हुए नेताओं-अधिकारियों की लार टपकना स्वाभाविक ही था. इस बड़े उलझे हुए मामले और मंदिरों की संपत्ति सुरक्षित रखने के लिए 1960 में केन्द्र सरकार ने जस्टिस रामास्वामी अय्यर की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया था. जी हाँ!!! 1960 में, यानी भारत का संविधान लागू होने के दस वर्ष के अंदर ही. क्योंकि मंदिरों से जुड़ी हुई जनता की भावनाओं को देखते हुए उसी समय यह महसूस किया गया था कि मंदिरों की संपत्ति, दान-दक्षिणा और जमीन इत्यादि का बेहतर प्रबंधन और व्यवस्थापन होना चाहिए. इस आयोग के समक्ष उत्तर और दक्षिण भारत से आम जनता के लगभग पाँच हजार पक्षकारों ने मंदिरों की व्यवस्था को बेहतर बनाने तथा इसे सरकारी नियंत्रण से बाहर करने के सम्बन्ध में अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए थे. रामास्वामी अय्यर आयोग ने दो वर्ष की कड़ी मेहनत और हजारों दस्तावेजों की ख़ाक छानने के बाद 1962 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें विस्तार से बताया गया था कि मंदिरों का प्रशासन कैसा हो? मंदिरों में आने वाले पैसे का खर्च किस प्रकार हो? मंदिरों से जुडी संपत्ति का संरक्षण किस प्रकार किया जाना चाहिए, इत्यादि... इत्यादि.

आयोग के सदस्यों ने मंदिरों, मठों एवं आश्रमों के बारे में लिखा है कि, “चूंकि हिन्दू मंदिरों के मामले में भावनाएँ एवं अनंत विश्वास जुड़ा हुआ है. इसलिए यह मामला न केवल संवेदनशील है, अपितु इसके लिए पूरी ईमानदारी से प्रयास किए जाने जरूरी हैं”. रामास्वामी आयोग के सदस्यों ने अपनी रिपोर्ट में 110 मुख्य सुझाव पेश किए थे. रिपोर्ट में लिखा है कि विभिन्नताओं से भरे इस देश के लाखों मंदिरों को एक साँचे में रखकर देखना कठिन है, परन्तु इनका प्रबंधन और व्यवस्थापन करने के लिए एक निश्चित रूपरेखा और एक संवैधानिक संस्था बनाना आवश्यक है.

 

government control of hindu temples 15 638

 

पहले ऊपर के चित्र पर एक निगाह डाल लीजिए कि "सरकारी नियंत्रण" वाले मंदिरों में होने वाले खर्च की पद्धति और "धर्मालुओं की समिति" द्वारा संचालित मंदिरों का खर्च किस प्रकार होता है... आप देखेंगे कि सरकार नियंत्रित मंदिरों में केवल 14% धन मंदिर के काम में वापस आता है, बाकी का पैसा अन्य कार्यों में लग जाता है, जबकि दूसरी व्यवस्था में 69% पैसा मंदिरों की व्यवस्था और भलाई के लिए खर्च होता है... अब आगे पढिए... 

रामास्वामी अय्यर आयोग रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु :-

आयोग की सिफारिशों के मुताबिक़ एक बहु-सदस्यीय स्वतन्त्र बोर्ड द्वारा देश के सभी मंदिरों में नियुक्त किए जाने वाले पुजारियों, पंडों, अर्चकों एवं सेवादारों की नियुक्ति, उनका लाईसेंस, उनका वेतन, वेतन का पुनरीक्षण, पुजारियों क आचरण और उनके कल्याण हेतु योजनाएँ बनाई जाएँ. अभी यह होता है कि कोई एक पुजारी अपने वंशवाद को आगे बढ़ाते हुए अपने बेटे को ही मंदिर की व्यवस्था सौंप जाता है, भले ही उसके बेटे को संस्कृत न आती हो अथवा वह दारूबाज हो. आयोग की अनुशंसा के अनुसार सभी पुजारियों की नियुक्ति कड़ी जाँच और सनातन धर्म की कठोर परीक्षा के बाद ही की जानी चाहिए. इसी प्रकार रामास्वामी आयोग की दूसरी महत्त्वपूर्ण सिफारिश मंदिर के लिए नियुक्त किए जाने वाले प्रशासकों, ट्रस्टियों और प्रबंधकों के लिए थीं. आयोग ने सुझाया है कि केन्द्र सरकार, राज्यों के सभी मंदिरों में इन अधिकारियों की नियुक्ति के लिए एक निश्चित प्रक्रिया अपनाए, जिसमें उस ट्रस्टी/सरकारी अधिकारी अथवा प्रबंधक की नियुक्ति इंटरव्यू अथवा किसी ऐसे ठोस माध्यम से की जाए जिसमें उस प्रशासक (या ट्रस्टी) की हिन्दू धर्म के प्रति भावनाओं का आकलन किया जा सके. आयोग ने केन्द्र सरकार से कहा है कि मंदिरों के कुप्रबंधन अथवा भ्रष्टाचार से सम्बन्धित शिकायतों के निपटारे के लिए अधिकार राज्य सरकारों के पास नहीं, बल्कि केन्द्र सरकार के सतर्कता आयोग (Vigilance Commission) के पास होने चाहिए.

अय्यर आयोग ने सभी मंदिरों का नियमित वार्षिक ऑडिट एवं बजट तथा अकाउंट्स की देखरेख करने का भी सुझाव दिया है. इसमें मंदिरों की दैनिक आवश्यक गतिविधियों से लेकर मंदिरों को मिलने वाली दान की जमीन, गहने इत्यादि को “धर्म से जुडी वस्तु” माना जाएगा तथा इनका प्रबंधन करने वाले ही इस में होने वाली किसी भी गडबड़ी के लिए जिम्मेदार होंगे. आयोग ने कहा है कि मंदिरों के धन का रखरखाव दो अलग-अलग मदों में किया जाए, जिसमें पहला है “अनिवार्य” और दूसरा मद है “वैकल्पिक”, इन दोनों मदों में घालमेल नहीं होना चाहिए. “अनिवार्य खर्च” के तहत मंदिर के रोजमर्रा की पूजा, प्रसाद, देव प्रतिमा के गहनों, कपड़ों, फूलमालाएँ, पुजारी का मानदेय इत्यादि रहेगा... जबकि “वैकल्पिक” मद में दान में मिलने वाली वस्तुओं की देखरेख, मंदिर द्वारा की जाने वाली समाजसेवा, धर्म के प्रचार हेतु चलने वाली गतिविधियों इत्यादि के लिए किया जाएगा. इसके अलावा रामास्वामी आयोग ने एक “सामान्य फण्ड” के गठन का भी सुझाव दिया है, जिसके द्वारा मंदिर का रखरखाव, पुनर्निर्माण एवं हिंदुत्व से सम्बन्धित कलाकृतियों, पेंटिंग्स, मूर्तियों इत्यादि के संरक्षण में काम आए. इन तीनों ही “फंड्स” (अर्थात अनिवार्य, वैकल्पिक एवं सामान्य) का ऑडिट तीन अलग-अलग फर्मों द्वारा प्रतिवर्ष किया जाएगा.

मंदिरों की संपत्ति बचाने एवं इसे सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखने के सम्बन्ध में रामास्वामी आयोग का एक महत्त्वपूर्ण सुझाव यह है कि हिन्दू धर्म, मंदिर एवं पूजा पद्धति के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार के विवाद अथवा समस्या आने पर मामले को एक विशेष ट्रिब्यूनल में दिया जाए जहाँ उसकी प्रतिदिन सुनवाई हो. मंदिरों से सम्बन्धित हिंदुओं के धार्मिक मामले सिविल कोर्ट में ले जाने को आयोग ने साफ़ नकार दिया था. आयोग ने सुझाव दिया है कि ऐसे ट्रिब्यूनल के गठन में एक सलाहकार समिति हो, जिसमें कुछ चुनिंदा साधु-संत, हिन्दू धर्म के जानकार, विभिन्न अखाड़ों-मठों के प्रतिनिधि को शामिल किया जाना चाहिए, ना कि कोई सरकारी अफसर.

 

revenues

(चित्र में प्रदर्शित किया गया है कि मंदिरों से होने वाली आय का कितना प्रतिशत आधिकारिक रूप से हज सब्सिडी और चर्चों को दिया गया)

जिस प्रकार सिख पंथ में समस्त गुरुद्वारों पर नियंत्रण एवं निगरानी के लिए “शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी” सर्वोच्च है, उसी प्रकार की एक नियामक संस्था मंदिरों के व्यवस्थापन एवं प्रबंधन के लिए भी होनी चाहिए, जिसे अखिल भारतीय मंदिर बोर्ड जैसा कोई नाम दिया जा सकता है. इस बोर्ड के गठन में सरकार की कोई भूमिका नहीं रहे एवं इसके सभी सदस्य एक त्रिवार्षिक आम चुनाव के तहत चुनकर आएँ. चुनाव लड़कर इस “मंदिर बोर्ड” का सदस्य बनने की शर्त यह भी होगी कि इच्छुक व्यक्ति कभी राजनीति में न रहा हो, किसी IAS अधिकारी का रिश्तेदार न हो तथा धार्मिक कर्मकाण्ड एवं सनातन धर्म की किसी महत्त्वपूर्ण विधा में पारंगत अथवा परीक्षा पास किया हुआ हो. मंदिर बोर्ड के आर्थिक अधिकारों की सबसे पहली शर्त यही होगी कि चढ़ावे में आने वाला पैसा, आभूषण एवं जमीन इत्यादि से होने वाली आय केवल और केवल हिन्दू धर्म की भलाई हेतु, सनातन प्रचार हेतु, धर्मशिक्षा हेतु, हिंदुओं में मौजूद दबे-कुचले वर्ग की शिक्षा-स्वास्थ्य एवं रोजगार हेतु तथा पुराने मंदिरों के रखरखाव के लिए ही किया जाएगा, सरकार की किसी भी अन्य “बाहरी” गतिविधि के लिए मंदिर बोर्ड से पैसा नहीं निकाला जा सकेगा.

हमारे यहाँ आयोग बनाए जाते हैं, केवल रिपोर्ट लेने के लिए एवं मामले को लटकाने के लिए. जस्टिस रामास्वामी आयोग की रिपोर्ट पेश हुए 55 वर्ष बीत चुके हैं. आज तक किसी भी सरकार ने इस पर चढ़ी धूल को साफ़ करने का कष्ट नहीं उठाया है, क्योंकि यदि इन सिफारिशों को लागू कर दिया जाएगा तो राज्य सरकार के विभिन्न नेताओं, IAS अफसरों तथा छुटभैये चमचों द्वारा मंदिरों में घुसपैठ का रास्ता बन्द हो जाएगा. हिंदुओं द्वारा दिए जाने वाले भारीभरकम दान से सरकार को मिलने वाला राजस्व गायब हो जाएगा. क्योंकि यही राजस्व विभिन्न घोटाले करने तथा “विधर्मियों” को पोसने वाली योजनाओं में पैसा लगाने के काम भी आता है. किसी प्रतिष्ठित मंदिर के ट्रस्टी बोर्ड में शामिल होने पर नेता-अफसर का रुतबा तो बढ़ता ही है, मंदिर के नाम पर होने वाले अनावश्यक और अनाप-शनाप खर्चों में से चोरी करने का स्कोप भी बना रहता है... तो भला ऐसे में रामास्वामी अय्यर जैसे दस और आयोग भी बन जाएँ तब भी कोई सरकार नहीं चाहेगी कि सोने के अंडे देने वाली मुर्गी (अर्थात हिन्दू मंदिरों पर उनका नियंत्रण) उनके हाथों से निकल जाए.    (इस काले क़ानून अर्थात HRCE Act की आधिकारिक प्रति इस लिंक पर उपलब्ध है... यहाँ क्लिक करें.)

इस लेखमाला के अगले भाग में वामी-कामी और नास्तिकों से भरे सरकारी नियंत्रण के कारण मंदिरों में स्थित भारतीय संस्कृति, कला, स्थापत्य, वास्तु के बर्बाद होने की कहानी...

साभार :- स्वराज्य, Kiran Bettadapur

इस सम्बन्ध में desicnn.com के यह लेख भी उल्लेखनीय हैं... 

मंदिरों की प्राचीन व्यवस्था और आधुनिक लूट का अंतर... http://www.desicnn.com/news/ancient-hindu-temples-managed-by-priests-and-king-now-mandir-board-is-a-demand-of-time 

मंदिरों की सेकुलर लूट का खुलासा... http://www.desicnn.com/blog/why-religious-endowment-act-must-be-reformed 

Read 988 times Last modified on शनिवार, 16 दिसम्बर 2017 07:55
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