“छुईमुई सम्मान” वाले माननीयों, खुद की गिरेबान तो देखिये

Written by शुक्रवार, 24 फरवरी 2017 14:01

अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री स्वर्गीय कलिखो पुल ने आत्महत्या करने से पहले 60 पृष्ठ का एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने काँग्रेस के कई केन्द्रीय और प्रदेश स्तर के नेताओं, सुप्रीम कोर्ट के दो वर्तमान जजों, सुप्रीम कोर्ट के ही कुछ वकीलों और प्रशासनिक अधिकारियों पर गम्भीर आरोप लगाये थे.

कलिखो पुल पिछले वर्ष काँग्रेस से विद्रोह कर भाजपा के समर्थन से अरुणाचल के मुख्यमन्त्री बने थे. उनके मुख्यमन्त्री बनने से पहले राष्ट्रपति शासन लगा जिस पर काँग्रेस सुप्रीम कोर्ट चली गई और सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ फैसला दिया था. यह बड़ा अजीब मामला था जिसमें बहुमत होने के बाद भी कलिखो की सरकार को अवैध ठहरा दिया गया और अल्पमत की काँग्रेसी सरकार को पुनर्स्थापित कर दिया गया था. इस फैसले के बाद से ही कलिखो पुल अवसाद में चले गये थे और अंततः उन्होंने आत्महत्या कर ली थी. लेकिन आत्महत्या से पहले जो लम्बा पत्र उन्होंने लिखा था, वह सार्वजनिक होने के बाद किसी भी चैनल या अख़बार ने उसे महत्व नहीं दिया, या यूँ कहें कि जानबूझकर उपेक्षित किया क्योंकि सभी लोग “न्यायपालिका की अवमानना” नामक छुईमुई नैतिकता से घबराते हैं. खबर वही है जिसे छिपाया जाए, बाकी सब तो विज्ञापन है, तो इस मामले में भी खबर छुपा ली गई.

लेकिन अब इस पत्र को Zee News ने न केवल सार्वजनिक किया है, बल्कि अपने प्राइम टाइम कार्यक्रम डीएनए में इसका विश्लेषण भी किया है. इस पत्र में नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार के साथ जो सबसे गम्भीर बात सामने आई है, वह यह है कि करोड़ों की रिश्वत के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों पर गम्भीर आरोप लगाया गया है. कलिखो पुल ने अपने सुसाईड नोट में लिखा है कि जब उनकी बहुमत की सरकार के खिलाफ कोर्ट में केस चल ही रहा था, तभी उनसे 86 करोड़ रूपये की रिश्वत माँगी गयी थी. सुनवाई के दौरान ही 9 करोड़ रूपये अग्रिम मांगे गये थे, जिसके बदले मुकदमे का फैसला एकाध महीने टालने का आश्वासन दिया गया था (स्थगन आदेश के मामलों में अक्सर यही सुनने में आता है कि जजों ने पैसा खाकर स्थगन आदेश दे दिया अथवा तारीख लंबी आगे बढ़ा दी). मुकदमे के अगले प्रक्रमों पर बाकी के 77 करोड़ का भुगतान भी माँगा गया था. बकौल कलिखो, उन्होने यह भ्रष्ट शर्तें मानने से इनकार कर दिया जिसके बाद उनकी सरकार के खिलाफ फैसला आया. अब आप सोचिए, लोग नेताओं और प्रशासन से निराश होकर बड़ी आस के साथ न्यायपालिका की शरण में आते हैं लेकिन वहाँ भी अगर चीजें पैसे और प्रभाव से ही तय होने लगें तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती हैं. मौत से पहले कलिखो का आखिरी बयान इसी ओर इशारा कर रहा है. कलिखो की विधवा पत्नी ने इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसे जजों ने याचिका के तौर पर मान्यता देते हुए, उसे सुनवाई के लिए लिस्ट कर दिया जिस पर सुनवाई भी होनी थी. लेकिन आज कलिखो की पत्नी ने अपनी चिट्ठी वापस ले ली. उनका कहना है कि उन्होंने यह चिट्ठी प्रशासनिक कार्यवाही/जाँच(शायद उन दोनों जजों की) के लिए लिखा था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने याचिका के तौर पर ट्रीट करते हुए मुकदमा शुरू कर दिया और इसकी सुनवाई जूनियर जजों को सौंप दी. अब आगे वो क्या करेंगी, यह देखने वाली बात होगी.

Karnan

बहरहाल, मीडिया द्वारा कलिखो पुल के पत्र को इरादतन उपेक्षित रखना देश में मीडिया, नेताओं, अफसरों, वकीलों आदि की मजबूत गिरोहबन्दी को दिखाता है. Zee News ने इस पर सार्वजनिक चर्चा कर बड़ी हिम्मत का काम किया है क्योंकि इसमें सुप्रीम कोर्ट के जजों का नाम भी होने से Zee News को मुश्किल हो सकती है. अगर सुप्रीम कोर्ट इस कार्यक्रम का संज्ञान अवमानना के तौर पर कर ले तो चैनल बन्द करने की नौबत आ जाएगी. मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा होने के कारण केन्द्र सरकार भी कोई मदद नहीं कर पाएगी. शायद इसलिए इस मुद्दे पर सारे चैनल और अख़बार चुप हैं. लेकिन Zee News पहले से भी ऐसी बोल्ड पत्रकारिता करता आ रहा है. जब पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून छपने पर फ़्रांस में शार्लि हेब्दो पर जघन्य आतंकी हमला कर कई पत्रकारों की हत्या कर दी गयी और देश-दुनिया में अभिव्यक्ति की आजादी के तमाम सूरमा जिहादियों के डर से बिल में छुप गये तब भारत में Zee News ही एकमात्र चैनल था जिसने पैगम्बर का वह कार्टून अपने चैनल पर दिखाने की हिम्मत की. इस्लाम, आतंक और जिहाद से जुड़े तमाम मुद्दे जिन पर मुख्यधारा का मीडिया अपनी जबान सिल लेता है, उन पर अपने 'फतेह का फतवा' कार्यक्रम के माध्यम खुलेआम बहस करवाने की हिम्मत केवल Zee News ही कर रहा है. अभिव्यक्ति के वास्तविक खतरे तो यह चैनल ही उठा रहा है. Zee News को इस साहस के लिए बधाई.

अब कलिखो मामले पर इसकी खबर का कितना असर होगा यह देखने वाली बात है। लेकिन इस भ्रष्ट व्यवस्था ने एक ईमानदार युवा नेता को घेरकर मार डाला, यह तो इस पत्र से साफ दिख रहा है। एक दिलचस्प बात यह है कि कलिखो के मुख्यमन्त्री बनने से पहले राष्ट्रपति शासन के विरुद्ध काँग्रेस सुप्रीम कोर्ट गयी और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने अरुणाचल के राज्यपाल को ही अपना पक्ष रखने का नोटिस जारी कर दिया जोकि संविधान के अनुच्छेद 361 के विरुद्ध था. तब अटॉर्नी जनरल ने जजों को याद दिलाया कि आप राज्यपाल या राष्ट्रपति को कोर्ट में नहीं बुला सकते क्योंकि यह संविधान के खिलाफ है. तब जजों ने अपनी गलती मानते हुए नोटिस वापस ले ली. इस पूरी घटना पर बड़े सवाल उठे कि यह कैसी संवैधानिक पीठ है जिसे संविधान के ही बुनियादी प्रावधानों की जानकारी नहीं है. इतना तो LL.B. के छात्रों को भी पता होता है.

अलबत्ता पिछले कई वर्षों से न्यायपालिका के क्षेत्र में भ्रष्टाचार की सड़ांध भरी बदबू बाहर आने लगी है. शान्ति भूषण ने भी उच्च स्तर पर सुप्रीम कोर्ट में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी जिसका कोई नतीजा नहीं निकला. हाल ही में कोलकाता हाईकोर्ट के जज कर्णन ने बाकायदा नाम लेकर एक सूची जारी की थी, जिसमें भ्रष्ट जजों के खिलाफ जाँच करने की माँग की गई थी, लेकिन जाँच तो दूर की बात जस्टिस कर्णन को ही हाजिर होने का नोटिस दे दिया गया. यही हाल जस्टिस काटजू का हुआ और उन्हें भी कठघरे में खड़े होकर खुद अपनी सफाई देनी पड़ी. एक अच्छा संकेत यह है कि अब न्यायपालिका के भीतर से ही “सफाई” की आवाज़ें उठनी शुरू हो गई हैं और अब इसे अधिक दिनों तक दबाया नहीं जा सकेगा. मोदी सरकार “कॉलेजियम” के मुद्दे को लेकर जिस प्रकार न्यायपालिका से भिड़ी और अपना रुख मजबूती से बनाए रखा, उसने कम से कम न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद और अपने परिवार वाले अपात्र-अक्षम मनमाने न्यायाधीशों की नियुक्ति के रास्ते तो कुछ बन्द किए ही हैं.

मूल सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका को अपने गिरेबान में नहीं झाँकना चाहिए? न्यायपालिका की अवमानना के बहाने यह “संवैधानिक दादागिरी” कब तक चलती रहेगी?

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