निराश कार्यकर्ताओं के जरिए कैसे लगे बेड़ा पार (भाग-१)

Written by गुरुवार, 20 दिसम्बर 2018 21:08

करीब दो साल पहले की बात है। भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं की प्रधानमंत्री निवास पर बैठक हुई। उसमें पार्टी के केंद्रीय पदाधिकारी शामिल हुए। उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फीडबैक मांगी। तब एक महासचिव ने कहा था कि कार्यकर्ता निराश हो रहे हैं। उन्हें हमें संभालना होगा। तब प्रधानमंत्री ने उनसे पूछा था कि आखिर क्या वजह है कि कार्यकर्ता निराश हो रहे हैं तो उस महासचिव का जवाब था कि कार्यकर्ताओं ने अपनी बेहतरी की अपेक्षा हमसे लगा रखी थी, लेकिन वह अपेक्षा पूरी नहीं हो पा रही है। इसलिए वे निराश हैं। तब प्रधानमंत्री का जवाब था कि आप कार्यकर्ताओं को समझाओ कि सरकार उन्हें कुछ नहीं दे सकती। प्रधानमंत्री का जवाब सुनकर वहां मौजूद सभी केंद्रीय पदाधिकारी अवाक रह गए थे।

इसी तरह की एक और घटना है। भारतीय जनता पार्टी के एक निष्ठावान कार्यकर्ता कोई प्रकाशन चलाते हैं। उन प्रकाशनों को लेकर पार्टी के एक आला नेता से मिले। उन्होंने आला नेता के सामने अपनी पत्रिकाएं रख दीं और उनसे अर्ज किया कि अब तो बीस राज्यों और केंद्र में अपनी सरकारें हैं। उन्हें इन राज्यों से विज्ञापन जुटाने में सरकार मदद करे। यह वह दौर था, जब पार्टी एक पर एक चुनावों में जीत दर्ज करती जा रही थी। अपना प्रकाशन चला रहे कार्यकर्ता दूसरी पीढ़ी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता हैं। उन्हें उम्मीद थी कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता उनकी बात सुनेंगे और कुछ मदद जरूर करेंगे। लेकिन वरिष्ठ नेता ने जो कहा, उससे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। नेताजी ने कहा, “ आपको किसने कहा था कि अपना प्रकाशन चलाओ..क्या भाजपा ने कहा था या किसी नेता ने...तो फिर मदद की उम्मीद क्यों पाल रखे हैं।”

तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की हार की मीमांसाओं के बीच एक कारण खो गया है। उसकी कोई चर्चा नहीं कर रहा है। लेकिन यह बाकी कारणों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण तो है ही, मारक भी है। कैडर आधारित पार्टी के नेताओं से जुड़े ये किस्से सार्वजनिक नहीं हुए। लेकिन दोनों किस्से बिल्कुल सच हैं और पार्टी की अंदरूनी हालत बताने के लिए काफी हैं। तीन राज्यों में हुई हार की कहानी में ऐसे अनगिनत कहानियों की भी अपनी भूमिका है। पार्टी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता, जिन्हें संघ का भी आशीर्वाद प्राप्त है और अपने जेब से उन्होंने 2013 से लेकर 2014 तक पार्टी के पक्ष में गंभीर अभियान चलाया था, जो सरकार बनने के बाद भी पैदल ही हैं, अब कहते हैं कि इन हारों से पार्टी के अंदर कार्यकर्ताओं को उपेक्षित करने की प्रक्रिया पर रोक लगे तो पार्टी के हित में होगा। उनका साफ कहना है कि कार्यर्ता निराश हैं और नेतृत्व में एक हद तक अहंकार हो गया है। लेकिन तीन राज्यों की हार ने नेतृत्व को चेता दिया है। तभी तो पार्टी की बैठक में अमित शाह को कहना पड़ा कि अगर हमने मेहनत नहीं की तो पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद जो हाल मराठा साम्राज्य का हुआ, वही हमारा भी होगा।

लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में यह मुद्दा खो गया है। छतीसगढ़ की हार को छोड़ दें तो बाकी दोनों राज्यों में हार की एक बड़ी वजह भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं में व्याप्त गहरी निराशा का भी हाथ है। इस निराशा को पैदा करने में भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा नेतृत्व की बड़ी भूमिका है। उसकी निचले स्तर के नेताओं, कार्यकर्ताओं और जमीनी लोगों से संवादहीनता बढ़ी है। भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ताओं की पार्टी मानी जाती है, कैडर पर भरोसे की बात की जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच दूरी बढ़ी है। इसलिए आम जनता की ओर से जो फीडबैक कार्यकर्ताओं को मिलता है, वह बड़े नेताओं तक नहीं जा पा रहा है। इसकी वजह से नेतृत्व के स्तर पर जो परसेप्शन बनना चाहिए, नहीं बन पा रहा है।

जब देश में एक परिपाटी चल पड़ी है कि जिस पार्टी की सरकार आती है, वह अपने कार्यकर्ताओं का ध्यान रखती है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी का भी कार्यकर्ता अगर यह उम्मीद लगा रखा है तो उसकी गलती नहीं है। बस अंतर यह हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व उन्हें कांग्रेस और दूसरी प्राइवेट लिमिटेड पार्टियों की तरह भ्रष्टाचारी स्तर पर जाकर काम ना दें। लेकिन जो जेनुइन लोग हैं, जिनकी जेनुइन योग्यता है, जो जिस योग्य है, उसे काम तो मिलना ही चाहिए। आखिर कार्यकर्ता जब अपना पेट नहीं पालेगा, अपने घर परिवार के लिए न्यूनतम रोटी और इज्जत की गारंटी नहीं देगा, फिर वह भारतीय जनता पार्टी के साथ क्यों नाता रखेगा। जब उसे मजदूरी ही करनी है तो फिर वह मजदूरी करेगा, अपने लिए रोटी-पानी जुटाने और बच्चों की फीस भरने के जुगाड़ में जुटेगा और काम करेगा। फिर उसके लिए वह कथन ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि "कोउ नृप होउं हमें का हानी"।

संघ के निष्ठावान प्रभावी लोग हों या भारतीय जनता पार्टी के, उनकी एक कमी है कि अपने कार्यकर्ताओं को योग्यता के मुताबिक काम नहीं दिया। तमाम विभागों में रिक्तियां पड़ी हैं। उन जगहों पर वे चाहते तो अपनी विचारधारा के लोगों को भर सकते थे। लेकिन उनकी जगह लोगों को काम नहीं दिया। अगर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र या प्रसार भारती में किसी को दिया भी तो छह महीने या एक साल के कांट्रैक्ट पर। अपने कार्यकर्ताओं की इज्जत भाजपा सरकार के नीचे अफसरशाही उतारती रही। कुछ हजार रूपए महीने पर उन्हें छह महीने या आठ महीने के अनुकंपा टाइप नौकरियां दी गईं। जब उनका कांट्रैक्ट बढ़ाने का वक्त आया तो अफसरों ने उन्हें लटकाकर उन कार्यकर्ताओं की औकात बता दी। जो कार्यकर्ता सरकार में अपनी ताकत देख रहे थे, देखते ही देखते वे कौड़ी के तीन हो गए। यही हाल दूसरे विभागों में भी रहा। लेकिन इसी सरकार में उन पार्टियों के कार्यकर्ताओं की ताकत भाजपा कार्यकर्ताओं की तुलना में कुछ ज्यादा रही, जो सहयोगी पार्टियों के मंत्रियों के साथ काम करते रहे।

क्रमश: - इस लेख का दूसरा भाग भी जल्दी ही प्रकाशित किया जाएगा. 

(लेखिका - सुश्री गीता सी., एक केन्द्रीय मंत्रालय में कार्यरत हैं... और यह लेख उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है).

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