भंसाली का संस्कृति अज्ञान, और पब्लिसिटी स्टंट...

Written by मंगलवार, 31 जनवरी 2017 19:04

संजय भंसाली के समर्थन आये लोग उसके विरोध को पूर्वाग्रह से किया हुआ बता रहे है और उसके समर्थन में दो तरह के तर्क दे रहे है। एक यह की लोगो ने पद्मावती की पठकथा बिना देखे विरोध कर रहे है और दूसरा संजय भंसाली भारत के एक श्रेष्ट निर्देशक है जो बड़ी फिल्म बनाने में सिद्धस्त है, इस लिए उनको पूरी स्वतंत्रता है कि वह अपनी कला की किसी भी तरीके से अभिव्यक्त करे। मैं यह पहले तो एक बात साफ़ कर दूँ की संजय भंसाली का पद्मावती को लेकर फिल्म बनाने का विरोध भारतियों ने किया है न की किसी विचारधारा के अंतर्गत यह हुआ है। यहां लोग यह भूल जाते है की जिस करणी सेना ने भंसाली को झापड़ मारा है वह सेक्युलर कांग्रेस समर्थित है, उसका बीजेपी से कोई मतलब भी नही है इसलिए राजनीति इसमें नही घुसेडनी चाहिए। अब चलिए मुद्दे पर आते है।

वैसे तो फेसबुक पर मैं 2013 से लिख रहा हूँ लेकिन फिल्मो का शौकीन होने कारण, उससे पहले फिल्म के ब्लोग्स पर, अंग्रेजी में लिखता था। मैंने आज से करीब 9 साल पहले, जब संजय भंसाली की 'सांवरिया', 2007 में आयी थी तब संजय भंसाली की एक फिल्मकार के रूप में उसकी एक आलोचना लिखी थी। आज जब संजय भंसाली के पक्ष में दलीले दी जा रही है तब मैं अपने उसी लेख को आधार बना कर व पिछले 9 सालो में भंसाली की सनीमा यात्रा को देखते हुए उन दलीलों को निरस्त करता हूँ।
संजय भंसाली, मुम्बई मसाला फिल्म की पैदाइश है जो बड़े कैनवास पर, सितारों को लेकर, फिल्म बनाते आये है। इसमें कोई शक नही है की उनकी फिल्म में फोटोग्राफी और संगीत बड़े प्रभावी होते है। इसमें भी कोई शक नही है की वो अपने निर्देशन में कैमरे के एंगेल को बड़ी सिद्धस्तता के साथ प्रयोग करते है और भव्य सेटों को रंगों से भर देते है। संजय भंसाली हमेशा से कुछ अपना बनाने में दुसरो से प्रेरणा लेते रहे है और आर्टिस्टिक क्रिएटिविटी के नाम पर मूल श्रोत में परिवर्तन करते रहे है। उनकी यह सर्जनात्मकता, कपोल कल्पित कहानी के लिए तो ठीक है लेकिन इतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनने वाली फिल्म के लिए यह सर्जनात्मकता खतरनाक है।

भंसाली की एक निर्देशक के तौर पर पहली फिल्म, 'ख़ामोशी ए म्यूसिकल' थी। यह फिल्म चर्च और ईसाइयत की पृष्टभूमि पर थी जिसमे सलमान खान के राज के चरित्र को छोड़ कर सब ईसाई थे। यह फिल्म तकनिकी और संगीत के रूप में तो काबिले तारीफ थी लेकिन भंसाली की एक निर्देशक के तौर पर उनकी ही लिखी पठकथा पर पकड़ ढीली थी। कहानी और पठकथा को लेकर अपनी इसी कमजोरी को छुपाने के लिए संजय भंसाली ने अगली फिल्मो के लिए दूसरे श्रोतो से प्रेरणा ली है और उसमे अपनी क्रिएटिविटी दिखाने के लिए बराबर छेड़ छाड़ की है।
उनकी अगली फिल्म, 'हम दिल दे चुके सनम' , जो की अनिल कपूर, नसीरुद्दीन शाह की 'वो सात दिन की नकल थी'। भंसाली ने फिल्म का कैनवास बड़ा करने के लिए कहानी को मुम्बई के उपनगर से उठा कर राजस्थान की हवेली पर बैठा दिया था। फिल्म का क्लाइमैक्स इटली में किया गया जहाँ कहानी के मूल चरित्र से अलग, बिना कारण के उन्होंने चर्च को पृष्टभूमि में डाल दिया था।

इसके बाद उनकी 'देवदास' आयी जो भंसाली ने ओपरा स्टाइल में बनाई थी। फिल्म का काल वही रखते हुए भी भंसाली ने आर्टिस्टिक क्रिएटिविटी के नाम पर शर्तचन्द्र के उपन्यास की आत्मा की हत्या करने से कोई गुरेज़ नही रक्खा था। फिल्म भव्य थी, लेकिन शरतचन्द्र के पात्रों में जीवन्तता का अभाव था। 1900 की कहानी का हर पात्र 2000 में जीता हुआ, नकली था।

इसके बाद भंसाली ने अमिताभ बच्चन को लेकर 'ब्लैक' बनाई यह फिल्म हॉलीवुड की फिल्म 'The Miracle Worker' की नकल थी। हॉलीवुड की फिल्म हेलेन केलर की जीवनी पर आधारित थी जहाँ मूक बधिर अध्यापक ऐनी सुल्लिवन एक महिला होती है जिसे ब्लैक में पुरुष(अमिताभ बच्चन) बना दिया गया था। यह फिल्म भी भव्य थी और उसके कई द्र्श्य ओपेरा स्टाइल ही शूट किये गए थे। उसके क्लाइमैक्स में भी नर्सेगिकता की जगह उसने ओपेरा की कल्पनाशीलता का ही आलिंगन किया था। इस फिल्म में रानी मुखर्जी ईसाई ही दिखाई गयी थी और पठकथा में पूरा वातावरण चर्च और कान्वेंट का ही लिया गया था।

उसके बाद भंसाली ने 'सावरिया' बनाई जो रुसी लेखक फ्योदोर दॉस्तोएव्स्की की लघु कहानी,'वाइट नाइट्स' पर आधारित थी। उस एक छोटी कहानी पर भंसाली ने एक बार फिर पूरी तरह से ओपेरा स्टाइल में बड़ी सी फिल्म बनाई। इस फिल्म में हर सेट नाटक के लिए सजाये गया स्टेज जैसा था। इस में हीरो का नाम राज था लेकिन उसको जो पनाह देती है वह लिल्लीअन एक बूढी औरत होती है जो ईसाई दिखाई गयी है। राज जिस लड़की से मुहब्बत कर बैठता है वह सकीना होती है जो अपने प्रेमी ईमान का इंतज़ार कर रही होती है जिसने ईद के दिन आने का वादा किया था। भंसाली की एक पठकथा लेखक के रूप में मुसीबत यही है की उसको एकाकी में हिन्दू चरित्र समझ में नही आता है उसके लिए मुस्लिम या ईसाई चरित्र कहानी की मांग नही होती है बल्कि वह उसे हिस्सा बनाता है। यह हिन्दू ईसाई मुस्लिम का कॉकटेल कहानी की जरूरत नही होती बल्कि संजय भंसाली की खुद की जरूरत होती है। यही वह बईमान हो जाते है।

उसके बाद उसने बनाई,'गुजारिश', जो की एक स्पेनिश फिल्म,'The Sea Inside' पर आधारित थी। इस फिल्म में भी हीरो हीरोइन(ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय) ईसाई ही है और जो चरित्र, ऋतिक का शिष्य बनता है वह ओमर सिद्दीकी एक मुस्लिम को ही दिखाया गया है।
अब तक तो आप समझ ही गए होंगे की संजय भंसाली फिल्मकार के रूप में जैसे भी हों उनमे हिन्दू चरित्रों और वातावरण को समझने की काबिलियत और संवेदनशीलता बिलकुल भी नही है। मैं यह नही समझता हूँ की संजय भंसाली ने जो भी किया वह किसी सोची समझी रणनीति के कारण किया है बल्कि मैं यह कहूंगा की नर्सेगिक रूप से, उनकी अंतरात्मा हिन्दू चरित्रों और उसके वातावरण को समझने के लायक नही है। इसी का कारण है की जब वह 'गलियों की रासलीला राम लीला' या 'बाजीराव मस्तानी' बनाता है तो राम और लीला के किरदार भौड़े हो जाते है और बाजीराव एक महान सेनापति से अपनी मुस्लिम रखैल के लिए कमजोर प्रेमविह्ल प्रेमी बनजाता है।

अब संजय भंसाली अपनी आर्टिस्टिक क्रिएटिविटी 'पद्मावती' में दिखाएंगे जहाँ वह इस पद्मावती को बनाने के लिए न इतिहास का सहारा ले रहे है और न ही किसी भारतीय श्रोत को ले रहे है बल्कि वह इसके लिए 1923 में अल्बर्ट रोसल द्वारा रचित बैले 'पद्मावती' को आधार बना रहे है। संजय भंसाली ने 1998 में पेरिस में इस बैले के आधार पर 'पद्मावती' ओपेरा का निर्देशन किया हुआ है, जिसके लिए उन्हें अंतरष्ट्रीय रूप से ख्याति भी मिली थी।

आज मैं संजय भंसाली के समर्थको से कहूंगा की मुझे 'पद्मावती' की पठकथा देखने की जरुरत नही है क्योंकि संजय भंसाली को हिन्दू चरित्रों और उनकी संवेदनशीलता को समझने की काबिलियत बिलकुल भी नही है। 'पद्मावती' ओपेरा में खिलजी को एक दिल जले आशिक के रूप में पेश किया गया है जो रानी पद्मावती की अद्वितीय सुंदरता के बारे में जानकार मोहित हो गया है और जो दिन रात उसको पाने के लिए कामाग्नि में जल रहा है। अंत में उसकी हवस से बचने के लिए जब पद्मावती अग्निकुंड में कूद कर जब जान देती है तब पश्चाताप की आग में जलता हुआ खिलजी दिखाया गया है। अब ऐसा दरिंदा, अलाउद्दीन खिलजी, जिसके नाम से हिंदुओं में घृणा की अग्नि प्रज्वलित हो जाती हो,उस ऐसे चरित्र से संजय भंसाली कैसे न्याय कर सकता है, जिसमें हिन्दू संवेदनाओ को छूने का सामर्थ्य नही है? यह करने में आज तक संजय भंसाली, किसी भी फिल्म की पठकथा में में असफल रहे है। उन्होंने हमेशा से चर्च ईसाई या मुस्लिम चरित्रों को गढ़ कर अपनी इस कमजोरी को छुपाया है। भंसाली, ओपेरा स्टाइल फिल्म बनाने के आदि है जहाँ अतिशयोक्तियों और कल्पनाशीलता का पूरा परवाह रहता है। उनकी यह सर्जनात्मकता इतिहासिक विषय पर फिल्म बनाने के बिलकुल भी सुयोग्य नही है। उस ऐसे व्यक्ति को 'पद्मावती' ऐसे विषय पर, जो भारत के इतिहास की त्रासदी का हिस्सा है, कोई छूट नही दी जासकती है।

संजय भंसाली न भारत को जानता है और न ही भारत को जानना ही चाहता है। वह सेक्युलर कॉकटेल है जो भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए अभिशापित...

लेखक :- पुष्कर अवस्थी...

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