सनातन संस्कृति : एक मुस्लिम देश में है अग्नि मंदिर

Written by गुरुवार, 21 दिसम्बर 2017 07:13

मिडिल ईस्ट एशिया में कैस्पियन सागर के तट पर बसा हुआ एक देश है अजरबैजान (Azerbaijan), बाकू (Baku) इसकी राजधानी है. यह एक इस्लामिक राष्ट्र है और यहाँ की 95 प्रतिशत से अधिक जनता मुस्लिम मत को मानने वाली है। बाकू शहर अपनी तूफानी हवाओं के लिए भी प्रसिद्ध है यहाँ कभी-कभी तो हवायें इतनी तीव्र गति से चलती हैं कि इसमें मवेशी भेड़-बकरियाँ तक उड़ जाती हैं।

अधिकांश हिंदू जानते तक नहीं कि इस इस्लामिक देश अजरबैजान की राजधानी बाकू में एक अत्यन्त प्राचीन अग्नि मंदिर (Ancient Fire Temple) है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह हिमाँचल प्रदेश में काँगडा स्थित श्री ज्वालामुखी मंदिर की ही एक शाखा है। इस तथ्य को कोई झुठला नही सकता कि पूर्वकाल में भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन और समृद्धिशाली रही है (Indic Culture and Traditions)। इस अग्नि मंदिर को पूर्व काल से ही आतेशगाह के नाम से भी जाना जाता है। आतेशगाह एक फारसी शब्द है जिसका मतलब होता है अग्नि का घर। आतिश या आतेश माने अग्नि और गाह माने घर।

Fire Temple in Night

(अजरबैजान का अग्नि मंदिर रात्रि में ऐसा दिखता है)

Fire Temple

(अग्नि मंदिर का वर्तमान चित्र)

प्राचीन समय से ही हिंदू धर्म में अग्नि को विशिष्ट स्थान दिया गया है। अग्नि को देव माना गया है और कहा जाता है कि अग्नि ही वह माध्यम है जिसके द्वारा यज्ञ भाग देवताओं तक पहुँचता है। इसीलिए यज्ञ को देवताओं का मुख भी कहा गया है, इदं अग्न्ये इदं न मम , यह अग्नि देव का मंत्र है। अग्नि देव का वाहन भेंड़ और इसका आयुध तलवार है। अग्नि पवित्र मानी गयी है इसी से इसका एक नाम पावक भी कहा गया है। अग्नि मृत देहको भी (जिसे अत्यन्त नकारात्मक माना जाता है)भस्मीभूत कर पवित्र करने की क्षमता रखती है। अग्नि की महत्ता बहुत प्राचीन समय से ही रही है। हो सकता है जोराष्ट्रियन मत (पारसी मत ) जिसमें अग्निपूजा का विधान प्रमुख है यह भी वैदिक सनातन मत से ही निकली हुई एक शाखा हो। इसका अध्ययन और इस विषय पर शोध की अत्यन्त आवश्यकता है। अजरबैजान के बाकू का प्राचीन अग्नि मंदिर अत्यन्त प्राचीन है किंतु इसके विषय में स्पष्टतः समयानुकूल साक्ष्य नही है। सनातन मतावलम्बियों में यह सबसे बड़ा दुर्गुण है कि उन्हें अपने धर्म और संस्कृति के मानबिन्दुओं की रक्षा करना, उन पर गर्व करना, उन्हें सहेजकर रखना और सबसे प्रमुख बात यह है कि उन्हें अपनी श्रेष्ठता पर तब तक विश्वास नहीं होता जब तक पश्चिम हमें इसकी श्रेष्ठता का सर्टिफिकेट इश्यू न करे।

Atashgah inscription

(अग्नि मंदिर की दीवार पर लगा शिलालेख, जिसमें श्रीगणेशाय नमः स्पष्ट दिखाई देता है)

बाकू के अग्नि मंदिर के विषय में हाल फिलहाल तक वहाँ के लोगों में यह भ्राँति थी कि यह जोराष्ट्रियन धर्म से संबंधित पूजा स्थल है माना यह गया था कि छठीं शताब्दी से पूर्व तक ईरान में खूब फले फूले जोराष्ट्रियन मत जिसे पारसी मत भी कहा जाता है उसी की किसी शाखा के मानने वालों ने यह अग्नि मंदिर बनाया होगा। किंतु न तो स्थानीय लोगों को ही यह ज्ञात था और न ही अजरबैजान की सरकार को कि यह पूजनीय अग्नि मंदिर सनातन हिंदू धर्म का ही एक विस्मृत मंदिर है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और सरकार के संस्कृति विभाग को इसके विषय में पता होना तो दूर की कौड़ी है। यह पूरी बात तब प्रकाश में आई जब अजरबैजान के संस्कृति मंत्रालय ने इसे विश्व धरोहर केन्द्र के रूप में घोषित करने के लिए पत्र लिखा । उस पत्र में भी इसे पारसी यानि जोराष्ट्रियन पूजास्थल के रूप में ही इंगित किया गया था किंतु जब जोराष्ट्रियन शैक्षणिक संस्थान ने इस तथ्य के विषय में जब अपने विस्तृत विचार और साक्ष्य निरपेक्ष ढंग से प्रस्तुत किए तब जाकर यह बात प्रमाणित हुई कि यह एक हिंदू धर्मस्थल है।

दैवयोग से अब्राहम वैलेन्टाइन विलियम्स जैक्सन नामक पारसी विद्वान ने इस प्राचीन हिंदू धर्मस्थल को अपना बताकर हड़प जाने की अपेक्षा अत्यन्त निरपेक्ष और स्पष्ट तार्किक प्रमाणों और व्याख्याओं द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि यह एक हिंदू धर्मस्थल है। अपने प्रमाण में उन्होंने तर्क दिया कि इस अग्नि मंदिर का प्राचीन या मध्यकालीन ग्रीक ,रोमन ,आर्मीनियन ,अरबी तथा फारसी ग्रन्थों में कोई विवरण नही है। और न ही अठारहवीं शताब्दी के ब्रिटिश यात्रियों के यात्रा विवरण में इसका कोई जिक्र है. मार्कोपोलो के यात्रा वृत्तान्तों में भी इसका कोई जिक्र नही है। किन्तु यह कोई पैरामीटर नही है कि यदि किसी पुरातात्विक या धार्मिक स्थल के निर्माण के समय, उसकी निर्मिति के कारण,निर्माणकर्ता आदि के विषय में यदि कोई लिखित विवरण उपलब्ध न हो तो उसे अपनी रूचि या मान्यता विशेष के अनुरूप परिभाषित कर लिया जाये। हो न हो यह प्राचीन अग्नि मंदिर वैदिक कालीन कोई हिंदू धर्मस्थल रहा होगा और इसी कारण इसके वास्तविक निर्माण का समय ठीक ठीक ज्ञात नही है। किंतु मंदिर में तथा इस के बाहरी परकोटे की दीवार के साथ लगी कोठरियों के शीर्ष पर लगे देवनागरी, गुरूमुखी तथा फारसी शिलापट्टों तथा अन्य पुष्ट प्रमाणों के द्वारा यह स्पष्ट प्रमाणित हो जाता है कि यह हिंदू तीर्थ स्थल है।

FireTemple stamp

(अजरबैजान सरकार द्वारा अग्नि मंदिर पर जारी किया हुआ डाक टिकट)

सौभाग्यवश मंदिर से लगे संग्रहालय में भी हिंदू धर्म से जुड़े कुछ अन्य प्रतीक इस बात को स्वतः सिद्ध कर देते हैं। मंदिर के शिखर में लगा त्रिशूल दूर से ही इसके सनातन धर्म के धर्मस्थल होने का प्रमाण सिद्ध कर देता है। इस हिंदू मंदिर के विषय में सबसे पुराना लिखित उल्लेख जोंस हैनवे का लिखा हुआ है यद्यपि उसने बाकू में रहते हुए भी कभी इसका दर्शन नही किया फिर भी उसने जो विवरण दिया है वह इस मंदिर से पूर्णतः मेल खाता है। हैनवे ने लिखा है कि यह एक हिंदू अग्नि मंदिर है और भारतीयों में इस मंदिर के प्रति अत्यन्त आस्था है। हैनवे के पश्चात एस• जी• गैमेलिन ने भी इस मंदिर के विषय में काफी कुछ लिखा है उसने लिखा है कि उसने यहाँ पर पुजारियों, हिंदू तीर्थयात्रियों के साथ-साथ संतों, तांत्रिकों और हठयोगियों को साधनारत देखा है। सन् 1771 में गैमेलिन यहाँ आए थे उन्होंने इस मंदिर में हठयोग में साधनारत एक ऐसे सन्यासी का जिक्र किया है जो सात वर्ष से अपना एक हाथ ऊपर किए हुए था और जिस कारण उसका वह हाथ लकड़ी के समान सूखकर ठोस एवं कठोर हो चुका था। इचवाल्ड (1825-26) ने तो इस मंदिर में भगवान राम ,कृष्ण,हनुमान जी,तथा देवी दुर्गा आदि की पूजा के विषय में भी लिखा है । इसके अतिरिक्त उन्होंने इस अग्नि मंदिर का सम्बन्ध काँगड़ा की देवी ज्वालामुखी से बताया है। जर्मन कवि फ्रैडरिश बौडेनस्टेड्ट ने भी 1847 के अपने रूस तथा मिडिल ईस्ट एशिया के प्रवास के दौरान इसे हिंदु मंदिर के रूप में मान्यता दी है। इस आतेशगाह के हिंदू मंदिर होने का सबसे बड़ा प्रमाण ब्रिटिश विद्वान उशेर द्वारा लिखित विवरण है जिसमें उन्होंने लिखा है कि उन्होंने 18 सितंबर 1863 को इस हिंदू मंदिर का दर्शन किया और पाया कि यहाँ पारंपरिक ब्राह्मण वेशभूषा में धोती पहने तिलक लगाये दो शिखा सूत्रधारी हिंदू ब्राह्मण पुजारी नियुक्त थे जिनमें से एक दिल्ली और एक कलकत्ता का निवासी था। जैसा विवरण उन्होंने दिया है उससे यह प्रमाणित होता है कि यह अग्नि मंदिर हिंदू तीर्थस्थल ही है

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(इस मंदिर में अग्नि की अखंड ज्योति के दर्शन करने कई विदेशी पर्यटक आते हैं)

अक्टूबर 1872 में जर्मन सामंत थीलमान ने भी यहाँ होने वाली पूजा पद्धति के आधार पर अपने विवरणों में इसके हिंदू स्थल होने की पुष्टि की है। उसने स्पष्ट कहा है कि यह जोराष्ट्रियन नही अपितु हिंदू तीर्थस्थल है। सन 1866 में कर्नल स्टीवर्थ ने अपने लेख "बाकू के पवित्र अग्नि मंदिर का विवरण" के द्वारा इस मंदिर विषयक काफी कुछ विवरण दिया है। कर्नल स्टीवर्थ ने लिखा है कि उसने यहाँ एक ऐसे तीर्थयात्री से भी भेंट की जो हिमाँचल प्रदेश के काँगड़ा स्थित ज्वालामुखी देवी के दर्शन के उपरांत यहाँ बाकू में पवित्र अग्नि के दर्शनार्थ पहुँचा था। उसके विवरण में यहाँ एक हिंदू पुजारी की उपस्थिति की बात प्रमाणित होती है और उसने यह भी लिखा है कि पहले यहाँ तीन ब्राह्मण पुजारी थे जिनमें से एक पुजारी की धन के लालच में किसी लुटेरे ने लूटकर हत्या कर दी जिससे डरकर एक पुजारी वापस भारत भाग गया और अब यहाँ केवल एक ही पुजारी बच गया है। कर्नल स्टीवर्थ को एक यात्रा के दौरान अफगानिस्तान सीमा के पास हिंदू तीर्थयात्री मिले थे जो बाकू के प्रसिद्ध अग्नि मंदिर जा रहे थे। जब वह वापस इंग्लैंड लौट रहे तो उस समय भी मध्य एशिया में उनकी मुलाकात हिंदू व्यापारियों से हुई जिनका मुख्य उद्देश्य बाकू के अग्नि मंदिर के दर्शन करना था। बाकू का यह प्रसिद्ध अग्नि मंदिर मध्य एशिया को भारत वर्ष से जोड़ने वाले प्रसिद्ध व्यापारिक मार्ग "सिल्क रूट" के अन्तर्गत आने वाले मार्ग का एक अहम पड़ाव था।

इन सारे तथ्यों के अतिरिक्त बहुत से अन्य प्रमाण भी हैं जो इसके हिंदू तीर्थ होने की बात पर मुहर लगाते हैं। यह मंदिर बाकू शहर के सुराखानी गाँव में एक विशाल परकोटे या दालान जैसे दीवारनुमा किले के भीतर स्थित है। इन परकोटे के चारों तरफ बहुत सी कोठरियाँ बनी है जिनमें संग्रहालय बना हुआ है। पूर्व में इन कोठरियों का इस्तेमाल दर्शनार्थियों,व्यापारियों और पुजारियों के रहने व गोदाम के रूप में इस्तेमाल होता रहा होगा। कोठरियों के ऊपर कहीं कहीं श्रीगणेशाय नमः लिखा हुआ है संवत कालगणनानुसार तिथियाँ (इनके निर्माण या जीर्णोद्धार की चाहे जो हो) भी लिखी हुईं हैं। यह तिथियाँ संवत 1745 से संवत 1840 तक की हैं। इस संग्रहालय के एक कक्ष में गणेशजी की अतिप्राचीन मूर्ति स्थापित है। एक अन्य कक्ष में तिलक लगाये धोती पहने जटाधारी हिंदु अग्निकुण्ड के सामने साधनारत है। अन्य कक्षों में से किसी में एक हाथ ऊपर किए हठयोगी का दृश्य है तो दूसरे कक्षों में हिंदू व्यापारियों का दृश्य प्रदर्शित है। एक अन्य कोठरी में बंधनयुक्त चोर का भी दृश्य है। पुराने चित्रों,मानचित्रों,दस्तावेजों और मूर्तियों के माध्यम से संग्रहालय को दर्शनीय बना दिया गया है।

दस्तावेजों से यह भी पता लगता है कि राजस्थान और पंजाब के व्यापारियों की प्राचीन काल से ही इस अग्नि मंदिर में अत्यन्त आस्था रही थी। और यही लोग इसका समय समय पर जीर्णोद्धार कराते आए थे। अठारहवीं शताब्दी में आत्मजन्मा नाम के हिंदू व्यापारी ने अग्नि मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। अग्नि मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर शिलापट्ट पर•• ॐ श्रीगणेशाय नमः••लिखा है तथा यह भी लिखा है कि उत्तमचंद तथा शोभाचंद ने पवित्र अग्नि मंदिर के इस प्रवेश द्वार को बनवाया ••संवत 1883-1887•• इस अग्नि मंदिर की पवित्र अग्नि स्वयंभू है जिसका पवित्र ज्वालायें अत्यन्त रहस्यमय प्रतीत होती है जो इस बात को प्रमाणित करती हैं कि यह अग्नि अपने अतीत में एक समृद्ध भरीपूरी और गौरवशाली हिंदू संस्कृति के चिरंतन गौरव को निरंतर प्रज्ज्वलित किए हुए है। मंदिर का पवित्र अग्निकुण्ड चार- चार फीट लंबाई चौड़ाई वाला है जिसमें पवित्र अग्नि निरंतर जलती रहती है। मंदिर के शिखर पर चार बुर्जियाँ भी हैं जिनमें रात्रि के समय अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है। मंदिर के ऊपर शिखर पर भगवान शिव के प्रतीक चिन्ह के रूप मे प्राचीन त्रिशूल भी लगा हुआ है। इस अग्नि मंदिर के प्रति स्थानीय मुसलमानों में भी गहरी आस्था है और विवाह के पश्चात वर वधू दोनों को इसकी यज्ञ वेदी के चारों ओर फेरे लगाने होते हैं अन्य शुभ अवसरों पर भी स्थानीय मुसलमान यहाँ आकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं और यथासंभव पुष्प उपहार आदि भेंटस्वरूप चढाते हैं। यह लोग मानते हैं कि इस मंदिर में मन्नत माँगने से मन्नत पूरी होती है और कष्ट निवारण होता है। 

भारतीय सनातन संस्कृति से सम्बंधित कुछ और लेखों की लिंक इस प्रकार है... 

१) भारत ही एकमात्र स्वाभाविक राष्ट्र है, बाकी फर्जी हैं... http://desicnn.com/news/indian-ancient-history-shows-that-bharat-is-the-only-natural-nation-state-others-are-fake-nations 

२) ताजमहल नहीं हम्पी-एलोरा हैं असली भारतीय विरासत... http://desicnn.com/blog/tajmahal-is-not-indian-heritage-its-ellora-brihadishvara-hampi-and-vijaynagram-empire 

३) बारामूला, ऋषि कश्यप और कश्मीर का इतिहास... http://desicnn.com/news/kashmir-is-an-integral-part-of-indian-culture-history-and-vedic-scriptures 

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