अलाउद्दीन खिलजी का इतिहास और तथ्य एवं भंसाली से अपेक्षा

Written by शनिवार, 14 अक्टूबर 2017 20:30

संजय लीला भंसाली की फ़िल्म पदमावती के कारण आज अल्लाउद्दीन खिलजी पुनः चर्चित हो चुका है, जो मध्यकाल के दुर्दांत शासकों में से एक था.

इस हेतु हमें अल्लाउद्दीन के चरित्र के बारे में जानना जरूरी है वह भी तब जब यह फ़िल्म गलत कारणों से चर्चा में है, तो आइए अब हम बात करते है अल्लाउद्दीन खिलजी के बारे में जो वाकई में अल्लाह की मेहर और अपनी छलनीति तथा क्रूरता के कारण ही दिल्ली की गद्दी तक पहुँचा था, जिसने 1296 से लेकर 1316 तक भारत के एक हिस्से पर शासन किया.

इसका लालन-पालन चाचा सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने किया था, गद्दी पर बैठते ही जलाल ने इसकी शादी अपनी बेटी से कर दी, तथा प्रतापगढ़ के पास स्थित कड़ा का जागीरदार नियुक्त किया. इस की सास इसको कतई पसंद नही करती थी क्योंकि वह इस की महत्त्वाकांक्षा से परिचित थी, लेकिन इस की पत्नी इसे सुल्तान के रूप में देखना चाहती थी. अपने महत्वाकांक्षी इरादों के चलते खिलजी ने 1292 में मालवा पर आक्रमण कर भिलसा को जीत लिया, जिससे खुश हो कर जलाल ने इस को अवध की रियासत भी इनाम में दे दी. उत्तर भारत की सबसे बड़ी रियासत के मालिक बनने के बाद इसकी महत्वाकांक्षा ओर बढ़ गई. इस के बाद इसने देवगिरी के राजा रामचंद्र को बुरी तरह परास्त कर भीषण नरसंहार किया, तथा खिलजी ने रामचंद्र की बेटी सत्यपली से शादी कर हर साल एक निश्चित रकम नज़राने के रूप में दिल्ली भेजने की शर्त पर उनको उनका राज्य वापस दे दिया.

दक्षिण में मिली इस जीत से खिलजी का प्रभुत्व विंध्याचल तक फैल गया, जिससे उसमे सुल्तान बनने की लालसा जागी. जलाल का खास अहमद चाप इस की नीयत को पहले ही भाँप गया, तथा सुल्तान को इसकी जानकारी दी लेकिन जलाल ने चाप की सलाह नही मानी और कड़ा जाते हुए नदी पर नाव में खिलजी द्वारा धोखे से मारा गया। आपने चाचा तथा ससुर जलाल को मार कर खिलजी ने खुद को सुल्तान घोषित कर दिया. लेकिन चाप के जिंदा रहते दिल्ली दूर थी, इसलिए खिलजी ने चाप औऱ मल्लिक जहान को छल पूर्वक लालमहल में बुला कर मार दिया. इसके बाद खिलजी के सिर पर भारत विजय तथा दारुल-इस्लाम की खुमारी चढ़ी. इसने 1297 में उलुग खान और नुसरत खान के साथ एक बड़ी सेना गुजरात के राजा कर्णदेव के खिलाफ भेजी, इन्होंने वहां भीषण नरसंहार किया, राजा वीरगति को प्राप्त हुआ तथा कर्णदेव की सुन्दर पत्नी को खिलजी के हरम में पहुँचा दिया गया. महारानी कमला देवी भी इस युद्ध का एक प्रमुख कारण थी. कर्णदेव की बेटी देवला देवी को उसने किसी प्रकार देवगिरी के राजा रामचंद्र के संरक्षण में उसने पहले ही पहुँचा दिया था इसलिए वो बच गई.

गुजरात की इस जीत से खिलजी को मलिक काफ़ूर नाम का एक “हिजड़ा” भी मिला, जो जल्दी ही उसका विश्वासपात्र बन गया. खिलजी ने उसको अपना मुख्य सेनापति बना दिया. खिलजी वंश के अंतिम दिनों में काफ़ूर सत्ता की धुरी बन गया था. खिलजी के काफ़ूर के साथ अंतरंग रिश्ते थे. उनके इस “होमोसेक्सुअल संबंधों” के कारण अल्लाउद्दीन आलोचना का शिकार भी होता था. यह काफ़ूर ही खिलजी वंश के ताबूत की आखिरी कील साबित हुआ.

गुजरात आक्रमण से सफलतापूर्वक लौटते समय राजस्थान के दो छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण राजपूती ठिकाने जालोर तथा सिवाना का भी खिलजी ने भयंकर विनाश किया तथा लूटपाट की, वहां के बहादुर शासक अपनी छोटी सेनाओं के साथ डटें रहे तथा अंत में केसरिया बाना पहन कर जन्मभूमि की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी. इन विजयों के बाद खिलजी का उत्साह और बढ़ा लेकिन वह नवीन मुस्लिमो (कन्वर्टेड) से भी चिंतित रहता था, इनका नेता मुहम्मदशाह रणथंभोर के राजा हम्मीर देव के पास शरणागत था, जिसको हम्मीर ने रक्षा का वचन दिया था. हम्मीर के बारे में प्रसिद्ध है कि '"त्रिया तेल, हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार". दिल्ली की गद्दी पर निष्कंटक शासन के लिए मुहम्मदशाह को मार्ग से हटाना आवश्यक था, इसलिए खिलजी ने रणथंभोर पर आक्रमण करने के लिए नुसरत खां के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी जो हम्मीर के नेतृत्व में राजपूती सेना से मुँह की खा कर उलटे पैर दिल्ली भाग आया, जिससे बौखला कर 1301 में एक बड़ी सेना लेकर स्वयं खिलजी हम्मीर के सामने आ पहुँचा, जबान का धनी हम्मीर केसरिया बाना पहन राष्ट्र हेतु युद्ध यज्ञ में आहूत हो गया तथा किले में रानी रंगदेवी के नेतृत्व में असंख्य स्त्रियों ने शील तथा धर्म की रक्षा हेतु जौहर कर लिया. भीषण नरसंहार, लूटपाट, स्थापत्य का ध्वंस हुआ तथा मुहम्मदशाह मारा गया.

इसके बाद बारी आती है खिलजी के जीवन के सबसे अधिक चर्चित तथा कठिन युद्ध रावल रतनसिंह के विरुद्ध चितौड़गढ़ अभियान की. चितौड़ की लड़ाई की दो प्रमुख वजहें थी पहली चितौड़ की भगौलिक स्थिति इसका मालवा, गुजरात तथा दक्षिण भारत के केंद्र में होना तथा दूसरी खिलजी की कामान्धता. रावल रतनसिंह के द्वारा अपमानित धोखेबाज, बाजीगर तथा जादूगर राघव चेतन के द्वारा चित्तौड़ की महारानी पदमावती के अनुपम सौंदर्य का वर्णन सुन, खिलजी ने रावल रतनसिंह के सामने पदमावती के दीदार की फरमाइश की, खिलजी के मन की इच्छा को जानते हुए भी रावल रतनसिंह उसको महारानी का दर्पण में चेहरा दिखाने के लिए तैयार हो गए. राजा के इस निर्णय से सेनापति गोरा उद्वेलित हो गया तथा चित्तौड़ छोड़ के निकल गया. खिलजी पदमावती के दर्शन के लिए चित्तौड़ आया, लेकिन जब रतनसिंह शिष्टाचार के चलते उसे गढ़ के बाहर तक छोड़ने गए तो उसने धोखेबाजी से रतनसिंह का अपहरण कर लिया और 15 दिन के अंदर पदमावती को खिलजी के पास लाने और राजा को छुड़ाने का संदेश किले में भिजवाया. इस आपत्ति के समय मे सबको सेनापति गोरा की आवश्यकता आन पड़ी.

महारानी खुद बादल के साथ, जो कि गोरा के चाचा थें गोरा को खोजने निकल पड़ी, 10 दिनों के बाद इनको गोरा मिल गया, महारानी मां को अपने सामने देख गोरा स्तंभित रह गया. उसने महारानी को वचन दिया कि उसका सिर कटने के बाद भी, उसका धड़ चित्तौड़ के लिए लड़ेगा, लेकिन रावलसा को कुछ नहीं होगा, और अंत में यही हुआ. गोरा की योजना के अनुसार खिलजी के पास सूचना पहुँचाई गई कि रानी अपनी 700 सहेलियों के साथ खिलजी के पास आ रही है. गोरा की योजना के अनुसार 4 कहार तथा 1 सवार के रूप में 3500 राजपूती वीर रावल को मुक्त कराने के लिए जाएंगे. इन राजपूत वीरों ने रावल को मुक्त करवा के सुरक्षित चित्तौड़ के मार्ग ओर रवाना कर दिया तथा गोरा एवं बादल के नेतृत्व में खिलजी की विशाल सेना से भिड़ गए, वहां रतनसिंह चित्तोड़ वापस पहुँच गए यहां गोरा तथा बादल के नेतृत्व में राजपूती वीर युद्ध में खेत हो गये.

राजपूतों के इस प्रत्याक्रमण से खीज कर खिलजी ने विशाल सेना के साथ ख़ुद 28 जनवरी 1303 को चित्तोड़ पर आक्रमण कर दिया. यह युद्ध सात महीनों तक चला, लेकिन खिलजी पीछे हटने को तैयार नहीं था, अंत में जब राजपूतों को लगा कि उनकी विजय असम्भव है तो उन्होंने ने केसरिया बाना कर लिया और रावल रतनसिंह के साथ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, तथा रानी पदमावती के नेतृत्व में किले की स्त्रियों ने जौहर (साका) कर लिया. चित्तौड़ में भीषण नरसंहार तथा लूटपाट के बाद खिलजी ने अपने पुत्र खिज्र खां को यहां का सूबेदार नियुक्त किया और चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रख दिया.

चित्तौड़ की विजय के बाद खिलजी ने सीधे मालवा की तरफ कूच किया, राजा महालकदेव और सेनापति कोका ने वीरता पूर्वक मुकाबला किया लेकिन दुर्दांत, बर्बर ख़िलजी से हार गए. इन आततायियों पूरे मालवा में भीषण नरसंहार, लूटपाट मचा दी. उज्जैन, धार, मांडू तथा चंदेरी को तहस-नहस कर दिया, आज भी उस भीषण अत्याचार की कहानी मांडू के किले में सुरक्षित विभिन्न मंदिरों के अवशेष सुनाते हैं. 1305 तक ख़िलजी का अधिकार पूरे मालवा प्रदेश पर हो गया था. अब ख़िलजी ने अपनी निग़ाहें दक्षिण भारत पर गड़ा ली. उसने 1307 में देवगिरी पर आक्रमण करने के लिए मलिक काफ़ूर के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी. अपने ससुर रामचंद्र पर आक्रमण के दो कारण थे, पहला रामचंद्र तीन साल से नजराना नहीं भेज रहा था, दूसरा गुजरात के राजा कर्णदेव की बेटी देवल देवी को उसने शरण दे रखी थी, जिससे खिज्र खां विवाह करना चाहता था.

काफूर के भीषण आक्रमण का सामना रामचंद्र नहीं कर पाया, देवगिरी की हार हुई और रामचंद्र को कैद कर के दिल्ली ले जाया गया, देवल देवी की शादी खिज्र खां से करवा दी गयी. छ महीने बाद रामचंद्र को इस शर्त पर छोड़ दिया गया, कि देवगिरी वार्षिकी नजराना देगा तथा दक्षिण के आक्रमणों में मदद भी करेगा. देवगिरी के बाद खिलजी की नजर वारंगल पर थी. 1303 में खिलजी काकतीय शासक प्रतापरूद्र देव से हार चुका था, लेकिन इस बार उसने रामचंद्र की सहायता से वारंगल में घेरा डाला. 1309 में काफूर के नेतृत्व में हुए भीषण युद्ध में प्रतापरूद्र देव को आत्मसमर्पण करना पड़ा, तथा वारंगल पर असंख्य अत्याचार किये गए. मार्च 1310 में प्रताप रूद्रदेव ने काफूर की शर्तों पर सन्धि कर ली और नजराने में उसे अत्यधिक धन-संपदा दे कर विदा किया. काफूर वारंगल से 18 नवंबर 1310 को ख्वाजा हाजी के साथ सीधे होयसल शासक, बल्लाल तृतीय के पास पहुँचा. अचानक शाही सेना को देख राजा का हौसला पस्त हो गया उसने सारा खजाना काफूर को देकर अपनी तथा प्रजा की जान बचाई. यहां से काफूर माबार गया, वहां से लूटपाट करते हुए वह रामेश्वरम तक पहुचा और दक्षिण से अपार धनसंपदा ले कर 14 अप्रैल 1311 को दिल्ली पहुँचा.

यह खिलजी के शासन काल की अन्तिम विजय थी. इसके बाद खिलजी का जीवन अत्यंत कष्टप्रद रहा, जलोदर रोग से ग्रसित अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपना अन्तिम समय अत्यन्त कठिनाईयों में व्यतीत किया और 2 जनवरी 1316 ई. को इसकी जीवन-लीला समाप्त हो गई. खिलजी द्वारा जीते गए अधिकांश राज्य जल्दी ही स्वतंत्र हो गए. इसके साम्राज्य के अधिकांश राज्य इसके शासनकाल में ही स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर चुके थे. जिनमे मेवाड़, रणथम्भोर, देवगिरी, तेलंगाना प्रमुख है. इसकी मौत के बाद खिलजी वंश ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया, और मात्र 5 वर्षों में खिलजी वंश के हाथों से दिल्ली की गद्दी फिसल के तुगलक वंश के पास चली गई.

अगर इस क्रूर, कामी, दुर्दांत शासक के वास्तविक चेहरे को संजय लीला भन्साली दिखाते हैं, साथ ही राजपूती वीरता तथा आन, बान, और शान का वास्तविक वर्णन करते हैं, तब तो उनकी इस फ़िल्म का स्वागत अवश्य करना चाहिए और यदि वे ऐसा नहीं करते हुए, ऐसे इस्लामिक शासकों और आक्रान्ताओं को प्रेमी या दयावान दिखाते हैं तो विरोध करना लाजमी है. संजय लीला भंसाली पहले भी देवदास फिल्म में अपनी “मनमानी” चला चुके हैं और शरतचंद्र के उपन्यास के साथ जमकर छेड़छाड़ की थी. लेकिन इस बार मामला दूसरा है, यह इस्लामिक आक्रान्ताओं के काले इतिहास, उनकी यौन पिपासा, क्रूरता, हत्यारी मानसिकता को दिखाने या छिपाने तथा राजपूती शौर्य को सही तरीके से दिखाने की चुनौती उनके सामने है. यदि फिल्म में समलैंगिक अलाउद्दीन खिलजी का ज़रा सा भी “महिमामंडन” दिखाई दिया, तो करणी सेना वालों को भी “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” वाली पूरी छूट दी जानी चाहिए. अब यही देखना है कि रानी पद्मावती के जौहर, गोरा-बादल की वीरता तथा खिलजी के खिलाफ लड़ने वाले प्रमुख राजाओं को इस फिल्म में किस प्रकार चित्रित किया गया है.... बाकी अलाउद्दीन खिलजी का वास्तविक रक्तरंजित इतिहास और तथ्य, तो आप लेख में पढ़ ही चुके हैं.

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