गर्भावस्था के दो सुन्दर, सपनीले, मधुर गीत....

Written by गुरुवार, 16 अगस्त 2007 20:41
हिन्दी फ़िल्मों ने हमें कई-कई अविस्मरणीय गीत दिये हैं। फ़िल्म संगीतप्रेमी सोते-जागते, उठते-बैठते इन गीतों को गुनगुनाते रहते हैं। हमारे महान गीतकारों और फ़िल्मकारों ने जीवन के हरेक मौके, अवसर और उत्सव के लिये गीत लिखे हैं और खूब लिखे हैं। जन्म, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रेम, विवाह, बिदाई, बच्चे, बुढापा, मौत... सभी-सभी के लिये गीत हमें मिल जायेंगे। जो दो गीत मैंने आज चुने हैं, वे जीवन के एक विशेष कालखंड अर्थात गर्भावस्था और मातृत्व प्राप्त करने के बीच का स्वप्निल समय। जैसे मातृत्व स्त्रियों के लिये जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है, ठीक वैसे ही पुरुषों के लिये पितृत्व भी एक गौरवशाली क्षण होता है। हालांकि माँ बनने के दौरान और प्रसूति के बाद स्त्री का योगदान तो अतुलनीय होता ही है, लेकिन इस भागमभाग में लोग “बाप” को भूल जाते हैं, दवाईयों के लिये भागदौड़ करता, रक्त की बोतलों की जुगाड़ में लगा बदहवास सा, बेचैनी से अस्पताल के बरामदे में टहलता बाप लोग अक्सर नजर-अंदाज कर जाते हैं, और वह भी “मर्द” होने के नाते अपनी व्यथा किसी से कहता नहीं। बहरहाल... प्रस्तुत दोनों गीत गर्भावस्था के उस सपनीले दौर के हैं, जब पति-पत्नी सपने देखने में मगन होते हैं, और यह दौर लगभग हरेक के जीवन में आता है, जब वह अपने होने वाले बच्चे के लिये न जाने क्या-क्या सोचा करता है। यह गीत खास इसीलिये हैं कि इनमें माता-पिता दोनों की भावनाओं को बराबरी से व्यक्त किया गया है। पहला गीत है फ़िल्म “मन-मन्दिर” का, जो सन १९७१ में आई थी, लिखा है राजेन्द्र कृष्ण ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने, गीत गाया है मुकेश और लता मंगेशकर ने.... गीत के बोल हैं “ऐ मेरी आँखों के पहले सपने...”, गीत क्या है, चार पंक्तियों की मधुर कविता है, ध्यान से सुनें तो दो लाईन लता के लिये और दो लाईन मुकेश के लिये, बस... इतने में ही लक्ष्मी-प्यारे ने पूरा गीत बाँध दिया है-

लता - ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे...
(१) एक-एक पल गिनूँ, उस घड़ी के लिये
जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये (२)
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने....

इस अंतरे के बाद मुकेश कमान संभाल लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई दौड़ के दौरान अपने 'पार्टनर' को हौले से “बेटन” थमाता है...

ऐ मेरी आँखों के पहले सपने...
(२) मैं अभी से तेरी सुन रहा हूँ सदा,
दूर जैसे कहीं साज हो बज रहा (२)
फ़िर दोनों गाते हैं
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे...

एक विशिष्ट भावना में छोड़ जाता है यह मधुर गीत आपको..... इसे सुनने के लिये आप नीचे दिये विजेट में “प्ले” पर चटकायें...


AYE MERI AANKHON K...



दूसरा गीत भी कालजयी है, लिखा है कवि नीरज ने, धुन बनाई है सचिन देव बर्मन ने, गाया है किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने, फ़िल्म है तेरे-मेरे सपने और बोल हैं, “जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी...”। पूरा गीत पति-पत्नी के आपसी सामंजस्य, उनके सपनों, आने वाले बच्चे के बारे में उनकी कल्पनाओं में डूबा हुआ है। इस गीत में सचिन दा और नीरज ने मिलकर अनोखा संसार रचा है। इस गीत के बोल इस प्रकार हैं -

जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी
खुशियों की कलियाँ, झूमेंगी, झूलेंगी, फ़ूलेंगी
जीवन की बगिया....
वो मेरा होगा, वो सपना तेरा होगा
मिलजुल के माँगा, वो तेरा-मेरा होगा
जब-जब वो मुस्कुरायेगा, अपना सवेरा होगा
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...
हम और बँधेंगे, हम तुम कुछ और बँधेंगे
होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे
बाँधेगा धागा कच्चा, हम तुम तब और बँधेंगे
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...
मेरा राजदुलारा, वो जीवन प्राण हमारा
फ़ूलेगा एक फ़ूल, खिलेगा प्यार हमारा
दिन का वो सूरज होगा, रातों का चाँद सितारा...
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...

जैसे पहले गीत में एक पंक्ति “एक-एक पल गिनूँ उस घड़ी के लिये, जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये” है वैसे ही इस गीत में “हम और बँधेंगे, हम-तुम कुछ और बँधेंगे, बाँधेगा धागा कच्चा... होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे..” ये पंक्तियाँ कितने गूढ़ार्थ लिये हुए है, क्या खूब शब्द हैं। यही है हमारे पुराने फ़िल्मी गीतों का जादू... एक बार दिल लगाकर ध्यान से सुन लिया तो फ़िर व्यक्ति दूसरी दुनिया में खो जाता है। इस गीत को नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी सुन सकते हैं, और यदि तेजगति इंटरनेट के मालिक हैं तो “यू-ट्यूब” पर इसका बेहतरीन वीडियो भी देख सकते हैं, जिसमें देव आनन्द और मुमताज एक शोख लेकिन परिपक्व अन्दाज में दिखाई देंगे। आनन्द लीजिये, मुझे उम्मीद है कि हमारे कुँवारे पाठक भी इसका भरपूर रसास्वादन करेंगे, क्योंकि कल नहीं तो परसों उन्हें भी इस क्षण से गुज़रना ही होगा। यही तो जीवन है....


Jeevan Ki Bagia Ma...




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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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